Koi Vikalp Nahi -Sarvajeet
इतना झुलस गया हूँ सहरओं में
इतनी नींद कभी मुझे आयी नही
उमंग भरता रहा, आस का एक पंछी
कैसी है यह प्यास ,गयी बुझाई नहीं
कभी एक था मैं, कभी दो बन जाता
कभी एक ना रहता, कहाँ जाने खो जाता
कभी लगता था मेरे कई हिस्से
कुछ अपने रहे ,कुछ बन गये किसके
एक क्षण तुम्हारा, मेरी कई रातें
एक शब्द तुम्हारा, कहे कितनी बातें
एक स्म्रती तुम ,उमड़े मेरा यौवन
एक प्रेरणा तुम, भर दे जो जीवन
कुछ अनकही बातें ,कभी कह न पाऊँ
जाने कितनी यादें ,अपना दिल बहलाऊँ
उमड़ गईं तुम, अंगड़ाई है मेरी
दिन ढलते जाएं, तन्हाई है मेरी
जाने कितने पल ऐसे, बीतते जाएं
जुड़ जायें जो शब्द ,गीत बनकर गाएं
तुम सामने आती हो तो यह लगता है
तुम्हें भूल ही जाऊँ तो अच्छा है
कट जाएं अगर खामोशी में रातें
हर रोज़ नया सूरज निकलता है
बरसता जाए बारिशों का मौसम
कश्ती डूब ही जाये तो अच्छा है
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