51 Shaktipeeth with Nishtha

51 Shaktipeeth with Nishtha

By HT Smartcast OriginalsReligion & SpiritualityHinduism
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51 Shaktipeeth with Nishtha episodes

  • देवी तालाब मंदिर | त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ - जालंधर, पंजाब
    इस स्थान पर देवी मां के बाएं वक्ष यानी बाएं स्तन का निपात हुआ हुआ था इसीलिए माना जाता है की मां त्रिपुर मालिनी संतान हीन दंपतियों को ममता का वरदान देती है। श्रीमद्देवी भागवत् पुराण में जलंधर की कथा है। उसके अनुसार भगवान शिव के क्रोध से जालंधर की उत्पति हुई वो भगवान शिव के समान ही सुंदर और बलशाली था लेकिन क्रोध से उत्पन्न होने के कारण वो नकारात्मकता से भरा हुआ था इसलिए वो राक्षस बन गया। साथ ही उसने अपने बल और बुद्धिमत्ता से जालंधर रक्षसो का राजा बन गया और देवताओं के साथ उसने कई युद्ध लड़े। आगे की कहानी सुनिए इसी एपिसोड में।

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    14 min
  • कामाख्या शक्तिपीठ - गुवाहाटी, असम
    कामाख्या मंदिर के गर्भ ग्रह में देवी की किसी प्रतिमा की पूजा नहीं होती बल्कि यहां माता सती की योनि की पूजा होती है जिसका सतयुग में भगवान विष्णु द्वारा माता सती को सुदर्शन से विभाजित करने के बाद गुवाहाटी में निपात हुआ था रहस्मयी बात है योनि पिंड से लगातार बहता झरना .. इसी के साथ जून के महीने में माता ३ दिन के लिए रजवाला होती है.. पुजारी द्वारा मां की योनि के चारों ओर एक साफ सूखा सूती कपड़ा बिछाया जाता है। जिसके बाद 3 दिन के लिए मंदिर के कपाट बंद हो जाते है बाद में जब मंदिर खोला जाता है तो वह वस्त्र गीला लाल रंग का हो जाता है उसी दौरान यहाँ 5 दिनों के लिए अंबुवाची मेला लगता है उन दिनों यहां पर ब्रह्मपुत्र नदी पानी भी लाल रंग का हो जाता है तंत्र साधना के लिए यह विश्व का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। कामाख्या मंदिर के प्रांगण में देवी मां 64 योगिनियों और दस महाविद्याओं के साथ विराजित है साथ ही सुनिए और भी रहस्य से भरी बातें और महिमा और जानिए की इस शक्तिपीठ को महाशक्तिपीठ का दर्जा क्यों दिया गया है।

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    27 min
  • सावित्री शक्तिपीठ। माँ भद्रकाली - कुरुक्षेत्र, हरियाणा
    मान्यता के अनुसार कुरुक्षेत्र के शक्तिपीठ श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर यानि सावित्री शक्तिपीठ में मां सती का दाहिना टखना का निपात हुआ था। किंवदंती है कि महाभारत युद्ध शुरू करने से पहले, भगवान कृष्ण के साथ पांडवों ने जीत हासिल करने की उत्कट आशा के साथ इस पवित्र स्थल पर आशीर्वाद मांगा और प्रार्थना की। अपनी भक्ति के एक संकेत के रूप में, उन्होंने अपने रथों से घोड़ों का दान किया, चांदी, मिट्टी या अन्य सामग्रियों से बने घोड़ों की भी पेशकश करने की एक कालातीत परंपरा की शुरुआत करी। इसके अतिरिक्त, शक्तिपीठ श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर में श्री कृष्ण और बलराम के सिर का ।मुंडन भी हुआ था तभी से यहाँ भक्त अपने शिशुओं का भी शुभ मुंडन समारोह में मुंडन करवाते है।

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    13 min
  • ललिता देवी मंदिर - प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
    उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर के दक्षिण दिशा में यमुना नदी के तट पर सती के हाथ की उंगली गिरने से भगवती ललिता का प्राकट्य हुआ था। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में मां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती मां ललिता के चरण छूकर ही बहती थी। इसलिए मां को प्रयाग की महारानी भी कहा जाता है।
    यहां मुख्य रूप से देवी के तीन स्वरूपों की पूजा होती है। मां ललिता देवी, कल्याणी देवी और अलोपी देवी के मंदिरों को शक्तिपीठ माना गया है। देवी की उंगलियां संभवतः तीनो स्थानों पर गिरी इसलिए तीनों में से कौन श्रेष्ठ कौन असली का प्रश्न ही नहीं उठता। तीनो एक दूसरे के आस पास ही स्थित है।

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    15 min
  • जय दुर्गा शक्तिपीठ | हृदय पीठ बैद्यनाथ धाम - देवघर, झारखंड
    शिव तथा सती के ऐक्य का प्रतीक है। शिव पुराण के अध्याय 38 में भी द्वादश ज्योर्तिलिंग की जो चर्चा की गई है, उसमें बैद्यनाथं चिताभूमौ का उल्लेख है। जो यह स्पष्ट करता है कि यहाँ सती का हृदय गिरा था। यहाँ की शक्ति 'जयदुर्गा' तथा शिव 'वैद्यनाथ' हैं। यह धाम सभी ज्योतिर्लिंगों से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इस स्थान पर ज्योतिर्लिंग के साथ शक्तिपीठ भी मौजूद है। इसी कारण से इस स्थान को ह्रदय पीठ या हार्द पीठ के नाम से भी जाना जाता है। जहां पर मंदिर स्थित है उस स्थान को देवघर यानी देवताओं का घर कहा गया है। बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग कामना लिंग के नाम से भी विख्यात है। मान्यता है कि यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामना विल्वपत्र के साथ जलार्पण से ही पूरी हो जाती है।

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    21 min
  • गायत्री देवी मणिबंध शक्तिपीठ - पुष्कर, राजस्थान
    ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
    इस गायत्री मंत्र को चार वेदो का सार बताया गया है और गायत्री माता सभी वेदो की माता है पहले गायत्री मंत्र की महिमा सिर्फ देवी देवताओं तक सीमित थी लेकिन महर्षि विश्वामित्र ने कठोर तपस्या करके इस मंत्र को प्राप्त किया और सृष्टि कल्याण हेतु आम जन तक पहुंचाया. राजस्थान के पुष्कर शहर में मणिबंध मणिवेदिका या गायत्री पर्वत पर स्थित है गायत्री देवी मणिबंध शक्तिपीठ। यहाँ देवी सती के दोनों मणिबंध या कलाई का निपात हुआ था कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि यहां देवी मां के दोनों कंगन गिरे थे। शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी है देवी गायत्री जो मां सरस्वती का ही स्वरूप है और यहां के भैरव यानी शिव को सर्वानंद के नाम से पूजा जाता है।

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    13 min
  • माँ बहुला शक्तिपीठ - केतुग्राम, पश्चिम बंगाल
    बाई भुजा से माता रानी असुर, दैत्य, नकारात्मकता और भक्तों के संकटों को नष्ट कर देती हैं और दाहिनी भुजा से अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं और उनका कल्याण करती हैं। इस एपिसोड में जानिए पश्चिम बंगाल के केतुग्राम में अजोय नदी के किनारे स्थित माँ बहुला शक्तिपीठ की कहानी. जहां माता सती की बाई भुजा का निपात हुआ था। जिसके दर्शन मात्र से आपके जीवन के सभी नकारात्मकताएं, कष्ट आपके ऊपर किए हुए काले जादू, भूत प्रेत बाधा, तंत्र मंत्र उपचार सब नष्ट हो जाते हैं।यहां की शक्ति है मां बहुला और भैरव यानी शिव को भीरूक कहते हैं।

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    11 min
  • मानस शक्तिपीठ | दक्षायनी - कैलाश पर्वत, मानसरोवर, तिब्बत
    इस एपिसोड में हम बात करेंगे दक्षायणी देवी मानस शक्तिपीठ की। कैलाश पर्वत के निचले भाग में स्थित मान सरोवर के किनारे स्थित यह शक्तिपीठ है जहां की अधिष्ठात्री देवी हैं माता दक्षायनी, जिन्हें कुमुदा के नाम से भी जानते हैं। मान सरोवर यानी मन का सरोवर के किनारे होने से इस जगह नाम मानस शक्तिपीठ हुआ। माता के दाहिने हाथ का निपात इसी स्थान पर हुआ था। वही दाहिना हाथ जिसे वरद हस्त यानी आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

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    12 min
  • जानकी मन्दिर | मिथिला शक्तिपीठ - जनकपुर, नेपाल
    इस एपिसोड में हम माता सती के उस शक्तिपीठ की बात करेंगे जो राजा जनक और सुनैना माता की पुत्री सीता माता की जन्मस्थली के साथ-साथ भगवन राम और माता सीता की पहली मुलाकात का साक्षी रहा जो जगह आज सीता महल के नाम से प्रसिद्ध है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से लगभग 225 किलोमीटर और भारतीय सीमा क्षेत्र से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर धनुषा जिले के जनकपुर मंडल में स्थित है जानकी देवी मंदिर और मथिला शक्तिपीठ। बहुत ही कम लोगों को पता है कि यह स्थान देवी मां का शक्ति पीठ भी है। जहाँ माता सती के बाये कंधे का निपात हुआ था।

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    15 min
  • रत्नावली शक्तिपीठ - खानाकुल, आरामबाग, पश्चिम बंगाल
    ऋषि राजा सूरत को बताते हैं कि राजन जब ब्रह्मा जी ने वहां मधु और कैटव को मारने के उद्देश्य से भगवान विष्णु को जगाने के लिए तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा कि इस प्रकार स्तुति की तभी भगवान के नेत्र मुख कमल नासिका और वक्ष स्थल से निकलकर अव्यक्त जन्में ब्रह्मा जी की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो गई योग निद्रा से मुक्त होने पर स्वामी भगवान जनार्दन निद्रा से जाग उठे फिर उन्होंने उन दोनों को देखा दोनों मधु और कैटव अत्यंत बलवान और पराक्रमी थे और क्रोध से लाल आंखें किए ब्रह्मा जी को खा जाने के लिए उनकी और तेजी से बढ़ रहे थे तब भगवान श्रीहरि ने क्या किया और ये कथा नवरात्री के पवन पर्व से कैसे जुड़ी है जानने के लिए सुनिए पूरा एपिसोड।

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    16 min

About 51 Shaktipeeth with Nishtha

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आदि शक्ति स्वरूपा शिव की अर्धांगिनी बनी माता सती के शव के 51 भाग ही 51 शक्तिपीठ कहलाएं। सतयुग में जब ब्रह्म देव के पुत्र दक्ष ने द्वेष और घृणा भाव में पुत्री सती और दामाद महादेव को अपमानित किया, जिस कारण माता सती ने अपनी योग अग्नि से स्वयं को भस्म किया। इस पॉडकास्ट सीरीज में हम जानेंगे महादेव और सती की प्रेम कहानी। साथ ही जानेंगे मानव कल्याण के लिए बने ये शक्तिपीठ कहाँ पर स्थित है और उनकी मान्यताएं क्या है।