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नवंबर 1913 के मानगढ़ नरसंहार में भील जनजाति के लगभग 1,500 लोगों की मौत हुई थी। वे अंग्रेजों और क्षेत्र में रियासतों के शासकों द्वारा आदिवासी लोगों के शोषण के विरोध में वहां एकत्रित हुए थे। ब्रिटिश और भारतीय सेना ने प्रदर्शनकारियों पर हमला किया।
इस घटना को आमतौर पर 'आदिवासी जलियांवाला बाग' के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह उतना प्रसिद्ध नहीं है। हालाँकि, यह घटना राजस्थान में होने वाले आगामी चुनावों के चलते चर्चा का विषय बानी हुई हे। पिछले साल प्रधानमंत्री ने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया था। जबकि राज्य की कांग्रेस सरकार ने मानगढ़ धाम में आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय बनाया हे।
इस घटना के ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व को समझने के लिए बात मुलाकात के इस एपिसोड में होस्ट सूर्यतापा मुखर्जी ने डॉ. जितेंद्र मीणा से बात की। डॉ. जितेंद्र मीणा दिल्ली विश्वविद्यालय के श्याम लाल कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर हैं।
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Gambia में भारत में बने कफ सिरप पीने के बाद करीब 70 बच्चों की मौत हो गई | WHO ने अलर्ट जारी कर कहा है कि हरयाणा के Maiden Pharmaceuticals Limited में बने कफ सिरप की गुणवत्ता का स्तर काफी ख़राब था | इन samples के laboratory analysis से पता चला है कि चारों उत्पादों में दूषित पदार्थ diethylene glycol और ethylene glycol बहुत अधिक मात्रा में है |
भारत सरकार ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है और Maiden Pharmaceuticals Limited से सभी उत्पादन को रोक दिया है | ऐसा नहीं है कि इस तरह की यह घटना पहली बार हुई हो | जम्मू में 2020 में cough syrup पीने के बाद 19 बच्चों की मौत हो गई थी। बाद में पता चला कि हिमाचल प्रदेश में Digital Vision नामक कंपनी द्वारा बनाए गए इन सिरपों में Diethylene Glycol बहुत अधिक मात्रा में मौजूद था। 1986 में मुंबई के जेजे अस्पताल में भी ऐसी ही चूक देखने को मिली थी, जिसमें तब 14 मरीजों की मौत हो गई थी।
बात मुलाकात के इस एपिसोड में मेनका राव ने एस श्रीनिवासन से बात की। एस श्रीनिवासन गुजरात के वडोदरा में LOCOST, एक कम लागत वाली drug manufacturing कंपनी के सह-संस्थापक हैं। वह All India Drug Action Network से भी जुड़े हैं, यह NGOs का एक स्वतंत्र नेटवर्क है जो आवश्यक दवाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ाने की दिशा में काम करता है।
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नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ में, मितानिन कार्यक्रम नामक सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता कार्यक्रम ने राज्य के स्वास्थ्य स्तर में सुधार करने में मदद की। मितानिन कार्यक्रम की शुरुआत, पूरे देश में आशा कार्यकर्ताओं को रखने के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के फैसले से पहले की गई है।
बात मुलाकात के इस एपिसोड में मेनका राव ने राज्य के वरिष्ठ मितानिनों में से एक मितानिन मुक्ता कुजूर के साथ बातचीत की। वह छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में रहती हैं और उन्हें मितानिन के रूप में काम करते हुए लगभग 20 साल हो चुके हैं | उन्होंने अपने काम के बारे में विस्तार से बात की ,और बताया कि कैसे कार्यक्रम ने उनके जीवन को बदल दिया।
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कंपनियों व विशेषज्ञों का मानना है की इंटरनेट अग्ग्रेगेटर कंपनियों के "गिग वर्क" में "फ़्लेक्सिबिलिटी”, या अपनी मर्ज़ी के घंटे उपलब्ध होने के कारण, यह महिलाओं को ख़ास आकर्षित करेगा, और जो महिलायें पहले से घर का ज़्यादातर कार्यभार सम्भालती हों, वह भी इस से आमदनी कमाने के नए अवसर पाएँगी पुरुषों के मुताबिक आज भी महिलायें गिग वर्क में कम संख्या में हैं। जो महिलाएं "प्लाट्फ़ोर्म" या गिग वर्क में आ रही हैं, आज भी सब कार्य क्षेत्रों में बराबरी के बजाय, सफ़ाई, सलोन, ब्यूटी पार्लर आदि, कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित हैं।
"काम की ज़िंदगी" के तीसरी एपिसोड में अनुमेहा यादव ने पैंतीस वर्षीय सीमा सिंह से बातचीत की, जो एक अनुभवी ब्यूटिशन हैं जिन्होंने खुद सलोन का काम सीख कर, 8-10 साल सवंतंत्र काम कर के, अर्बन कम्पनी से एक पार्ट्नर की तरह जुड़ी।अर्बन कम्पनी आज भारत के सब से बड़े सर्विस प्लाट्फ़ोर्म में हैं। यह घर के काम की सुविधाएँ जैसे की सफ़ाई, बिजली का काम आदि, और घर आ कर सलोन जैसी सुविधा ग्राहकों को देती हैं।
October 2021 में सीमा और उनके साथ क़रीब सौ ब्यूटिशन व स्पा महिला वर्कर्स एक ऐतिहासिक सार्वजनिक प्रोटेस्ट का हिस्सा बनी। उन्होंने कम्पनी द्वारा 20 प्रतिषित से ज़्यादा कमीशन काटने का विरोध, महीने कुछ बुकिंग बिना किसी दंड के मना करने की आज़ादी, वह उनकी सुरक्षा वह स्वास्थ्य की बेहतर सुविधा की माँग ले कर अर्बन कम्पनी के हरियाणा में गुरुग्राम ऑफिस पर धरना दिया। सीमा पूछती हैं की “पार्ट्नर" नाम के इस्तेमाल के बावजूद कमिशन, फ़ीस, और कमाई आदि के नियम जब जब कम्पनी बदलती है, तो "पार्ट्नर" से कोई सहमति क्यूँ नहीं लेती? महिला गिग वर्कर्स द्वारा एक प्लाट्फ़ोर्म कंपनी की नीतियों पर सवाल, वह इस स्तर पर खुला विरोध, भारत के किसी शहर में शायद पहली बार दर्ज किया गया।
22 अगस्त 2022 को एक प्रश्नावली का ईमेल पर जवाब देते हुए अर्बन कम्पनी प्रवक्ता मोमिता मजूमदार ने "सुनो इंडिया" को बताया की पहले के मुताबिक़ कयी नियम जैसे की कमिशन, पेनल्टी, बीमा आदि पर सुधार वह बदलाव किए जा चुके हैं और इस वह अलग विषयों पर निम्न ब्लॉग साझा किए:
कंपनी द्वारा 29 अगस्त 2022 भेजे गए स्वास्थ्य पर किए गए खर्च राशि के विवरण में पार्ट्नर्ज़ को प्रदान किए – जिस में उन्होंने लिखा है रुपये 20 करोड़ के ब्याज-मुक्त उधार, रुपये 2 करोड़ "कोविड बीमा", रुपये 41 लाख कोविड बीमारी के कारण काम से छुट्टी के एवज में, 32 लाख रुपये कोविड में पार्ट्नर्ज़ की मृत्यु के वियोग में सहायता, वह 13 लाख रुपये आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा में पार्ट्नर्ज़ पर खर्च किए।
इस के अलावा:
Urban Company announces INR 150 Cr. Partner Stock Ownership Plan (PSOP)
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Partner Earnings up 11% q-o-q | UC Earnings Index (Q3 FY22)
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कुछ अनुमानों के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप के बंटवारे के दौरान 20 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ से जायदा विस्थापित हुए। इसे मानवता के इतिहास में सबसे बड़े शरणार्थी संकटों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है, केवल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही स्थिति इससे बदतर थी।
बात-मुलाक़ात के इस एपिसोड में, होस्ट सूर्यतपा मुखर्जी यूट्यूब चैनल पंजाबी लहर के पीछे नासिर ढिल्लों से बात करते हैं। नासिर पाकिस्तान के फैसलाबाद के रहने वाले हैं, लेकिन इनके वीडियो सीमा के दोनों ओर वायरल होते रहते है। वह अब तक विभाजन से अलग हुए 200 से अधिक परिवारों को फिर से मिला चुके हैं।
इस स्वतंत्रता दिवस पर, आइए उन सभी विभाजन परिवारों का जश्न मनाएं, जो इंटरनेट की शक्ति के कारण फिर से मिल पाए हैं।
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केंद्र सरकार आंगनवाड़ी सेवाओं के डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रही है। इसका मतलब है कि आंगनवाड़ी सेवाओं से लाभान्वित होने वाले 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को आधार कार्ड की आवश्यकता होगी या उनके माता-पिता को अपना आधार कार्ड प्रदान करना होगा।
बात मुलाकात की इस कड़ी में, हमारे रिपोर्टर सूर्यतापा मुखर्जी ने अंजलि भारद्वाज से इस बारे में बात की। अंजलि ने हमे बताया कि इससे बच्चों के भोजन के अधिकार में क्या बाधा आ सकती है। अंजलि सतर्क नागरिक संगठन की संस्थापक और भोजन के अधिकार अभियान की प्रमुख सदस्य हैं।
Additional read:
Centre focuses on access to anganwadi services for migrants | India News,The Indian Express
When Aadhaar-related problems lead to denial of rations and benefits: what the data show | Explained News,The Indian Express
Aadhaar Authentication for Govt Services Fails 12% of Time: UIDAI
Aadhaar Failures: A Tragedy of Errors | Economic and Political Weekly
UIDAI should review issue of Aadhaar to children below 5 years, mull alternates to establish unique ID: CAG – Times of India
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भारत में सब से पहले "गिग वर्क" शुरू करने वाले कम्पनियों में नाम आता है ऊबर, ओला का । यह “मोबिलिटी अग्गरेगटर” कम्पनी टैक्सी ऐप के माध्यम से एक टैक्सी चालक और एक यात्री को जोड़ती हैं, जिस में हर राइड के पैसे में से कंपनी एक कमिशन लेती है। ड्राइवर प्रति राइड कमा सकते हैं, और कम्पनी उन्हें अपना कर्मचारी नहीं बल्कि स्वनियोजित कारोबार , या आत्मनिर्भर फ़्रीलांसर का दर्जा देती है।
भारत सरकार के नीति आयोग के एक रिपोर्ट के मुताबिक प्लाट्फ़ोर्म कम्पनियों टैक्सी ऐप ने 2010 और 2018 के बीच राइड्ज़ द्वारा बीस लाख रोजगार के मौके उपलब्ध कराए हैं। लेकिन इस तेज़ी से तरक्की पर चलने वाले व्यापार में आज इन कंपनियों में ड्राइवर जिन्हें कम्पनी “ड्राइवर पार्ट्नर” या साथी कह के बुलाती है, खुद को इस काम से लाभ, इसके नियम, तरीकों में कितना सहभागी बन पाते हैं?
इन सब के अलावा एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल पे हम इस एपिसोड में चर्चा करेंगे की इन मोबाइल की इन मोबाइल टैक्सी अग्ग्रेगेटर में महिलाओं की भागीदारी कितनी है, उन्हें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उन्हें कम्पनी कितना सहयोग देती है?
“काम की ज़िंदगी" मिनी - सीरीज के दूसरे एपिसोड में होस्ट अनुमेहा यादव ने रुक्मिणी से बातचीत की, जो की ऊबर के साथ ड्राइवर साथी के तौर पर पिछले चार साल से दिल्ली में गाढ़ी चला रहीं हैं।
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आज के तकनीकीकरण के दौर में हम "Gig Work" या "Platform Work " जैसे नाम बहुत सुनते हैं। इस तरह का काम बहुत सारी एग्रीगेटर
कम्पनीज के द्वारा मोबाइल एप्लीकेशन की सहायता से संचालित किया जाता हे। इन् कम्पनीज में "फ़ूड या खाद्य एग्रीगेटर कम्पनी" जैसे की Zomato, Swiggy, Big Basket के नाम काफी प्रचलित हैं। इस तरह के "Gig Work" के तहत लोगों को लघु या दीर्घ अवधि के लिए काम दिया जाता हे और इन् लोगों का काम एक दिहाड़ी मजदूर के सामान ही होता हे।
इस तरह के कम्पनियों के आने से रोज़गार के अवसर तो बढ़ें हैं, लेकिन क्या तकनीकीकरण की इस दौड़ में पारदर्शिता या काम करने वाले श्रमिक के अधिकार भी बढ़े हैं? क्या श्रमिक इस तरह के रोज़गार में एक स्थायी नौकरी और एक अच्छा जीवन जीने की चाह को पूरा कर पाते हैं? क्या वह अपनी मज़दूरी या काम के हालात खुद सुधार पाते हैं? उनकी क्या अपेक्षायें हैं?
इन्ही प्रशनो के उत्तर और "Gig Work" या "Platform Work" के बारे में विस्तार से जानने के लिए हम लाये हैं "काम की ज़िंदगी" एक नयी मिनी - सीरीज। बात मुलाकात की इस नयी मिनी - सीरीज के पहले एपिसोड में होस्ट अनुमेहा यादव ने एक फ़ूड डिलीवरी वर्कर अहमद से बात की, जो कि यह काम पिछले दो साल से कर रहे हैं और करोना महामारी आने के बाद भी अपनी पढ़ाई के साथ साथ भी इन्होने ये काम जारी रखा हे।
सुनो इंडिया ने इन मुद्दों पर Zomato को 17 मई को ई मेल पर लिखित सवाल भेज कर और जानकारी माँगी। एपिसोड लाइव होने तक उनका इस पर कोई जवाब नहीं आया था।
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2016 में बिहार ने शराब के सेवन और वितरण दोनों को अपराध बनाते हुए शराब पर प्रतिबंध लगा दिया जिसका उल्लंघन करने पर जुर्माने से लेकर कठोर सजा तक का प्रावधान है। हालांकि शराबबंदी के बावजूद प्रदेश में अवैध रूप से अधिक कीमत पर शराब बेची जा रही है, जिससे उपभोक्ता को ज्यादा खतरा है। दूसरी ओर जहरीली शराब से होने वाली मौतों के सिलसिले ने कई लोगों को हैरान कर दिया है और ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि शराबबंदी कानून कितना सफल है।
बात मुलाकात की इस कड़ी में, होस्ट मनीष शांडिल्य ने शराब की लत से पीड़ित लोगों से बात की और ये जानने की कोशिश कि शराबबंदी ने उन्हें कैसे प्रभावित किया। उन्होंने राज्य में शराबबंदी के प्रभाव को समझने के लिए पटना में दिशा नशा मुक्ति और पुनर्वास केंद्र की सीईओ राखी शर्मा और क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट डॉ. बिंदा सिंह से भी बात की।
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दलित संघठनकर्ता शिव कुमार जिन्होंने बाल मज़दूरी करते हुए पढ़ाई पूरी की हरयाणा के औद्योगिक क्षेत्र् में मज़दूरी, और क़ानूनी व्यवस्था में मज़दूर हक़ों के संघर्ष के घटते दायरे का ज्वलंत विवरण करते है।
सोनीपत के देवरू गाँव के एक भूमिहीन परिवार में जन्मे शिव कुमार की नयी किताब मेहनतकश वर्ग द्वारा पिछले दो सालों में झेली गयी अनेको तरह की हिंसा का एक व्यक्तिगत खाता है – सामाजिक सुरक्षा का आभाव, जान बचाने के नाम पर लगाए गए सरकारी लाक्डाउन में इस क्षेत्र के दिहाड़ी मज़दूरों के परिवारों को दिनों तक भूखा छोढ़ दिया जाना, वह आठ से दस घंटे खड़े हो कर काम करने के बावजूद भी सामान्य हो चुकी न्यूनतम मज़दूरी की चोरी।
बात मुलाकात के इस एपिसोड में होस्ट अनुमेहा यादव ने शिव कुमार से उनकी किताब और उनके निजी जीवन के बारे में चर्चा की।
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जैसा की नाम से जाहिर हे, इस पॉडकास्ट सीरीज में होंगी बातें और मुलाकातें। बातें उन मुद्दों पे जो ज़रूरी हैं लेकिन जिस पर अक्सर बातें नहीं होती या होती हैं तो न के बराबर। बातें उन मुद्दों और विषयों पर भी जिनके बारें में आप जानना चाहते हैं, लेकिन आपको पता नहीं किससे पूछे और किससे बात करें।
सुनो इंडिया के इस सीरीज़ "बात-मुलाक़ात" में हम आपकी करवाएंगे मुलाकात ऐसे एक्सपर्ट्स और जानकारों से जो दे सकें आपके सवालों का जवाब और जिनके साथ हो सके ज्वलंत और ज़रूरी मुद्दों पर बातचीत।
(As the name suggests, this podcast series will feature conversations and meetings. Conversations on issues which are important but not discussed often. Conversations on topics that you want to know more about, but are not sure about whom/where to ask.
Do tune in to Baat MulaKaat, where you will get to meet and hear experts who can answer these questions and clarify your doubts.)

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