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ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
This podcast is dedicated to some of the great poets from India. We are just trying to keep their work alive through our efforts of spreading their beautiful creations of all times.
Apple Podcast: https://podcasts.apple.com/in/podcast/bait-ul-ghazal-urdu-hindi-poetry/id1620009794
Tere Aane Ki Jab Khabar Mehke / तेरे आने की जब ख़बर महके ~ Nawaz Deobandi
तेरे आने की जब ख़बर महके
तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके
शाम महके तिरे तसव्वुर से
शाम के बाद फिर सहर महके
रात भर सोचता रहा तुझ को
ज़ेहन-ओ-दिल मेरे रात भर महके
याद आए तो दिल मुनव्वर हो
दीद हो जाए तो नज़र महके
वो घड़ी-दो-घड़ी जहाँ बैठे
वो ज़मीं महके वो शजर महके
नवाज़ देवबंदी
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नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं
जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उन को सुनाने के दिन आ रहे हैं
अभी से दिल ओ जां सर-ए-राह रख दो
कि लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं
सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं
चलो 'फ़ैज़' फिर से कहीं दिल लगाएं
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं
Faiz Ahmad Faiz
This podcast is dedicated to some of the great poets from India. We are just trying to keep their work alive through our efforts of spreading their beautiful creations of all times.
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ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें
सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें
दिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमें
याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से
रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें
हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें
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Apple Podcast: https://podcasts.apple.com/in/podcast/bait-ul-ghazal-urdu-hindi-poetry/id1620009794
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Tu Khud Ki Khoj Mein Nikal l तू खुद की खोज में निकल तू किस लिए हताश है l Motivational Poem in Hindi
Woh Bulaein Tu Kya Tamasha Ho - Saghar Siddiqui Urdu - Sad Poetry l वो बुलाएँ तो क्या तमाशा हो l وہ بُلائیں تو کیا تماشہ ہو
हम न जाएँ तो क्या तमाशा हो
ये किनारों से खेलने वाले
डूब जाएँ तो क्या तमाशा हो
बंदा-पर्वर जो हम पे गुज़री है
हम बताएँ तो क्या तमाशा हो
आज हम भी तिरी वफ़ाओं पर
मुस्कुराएँ तो क्या तमाशा हो
तेरी सूरत जो इत्तिफ़ाक़ से हम
भूल जाएँ तो क्या तमाशा हो
वक़्त की चंद साअ'तें 'साग़र'
लौट आएँ तो क्या तमाशा हो
ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है
हर एक फ़त्ह-ओ-ज़फ़र के दामन पे ख़ून-ए-इंसान का रंग क्यूँ है
ज़मीं भी तेरी है हम भी तेरे ये मिलकियत का सवाल क्या है
ये क़त्ल-ओ-ख़ूँ का रिवाज क्यूँ है ये रस्म-ए-जंग-ओ-जिदाल क्या है
जिन्हें तलब है जहान भर की उन्हीं का दिल इतना तंग क्यूँ है
ख़ुदा-ए-बर्तर तेरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है
ग़रीब माओं शरीफ़ बहनों को अम्न-ओ-इज़्ज़त की ज़िंदगी दे
जिन्हें अता की है तू ने ताक़त उन्हें हिदायत की रौशनी दे
सुरों में किब्र-ओ-ग़ुरूर क्यूँ है दिलों के शीशे ये रंग क्यूँ है
ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है
बस यही दो मसले, जिंदगी भर ना हल हुए!!!
ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए!!!
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