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हम अक्सर ज़िंदगी की भागदौड़ में उसमें छुपी ख़ूबसूरती को निहारना, उसे सराहना भूल जाते हैं। तो थोड़ा रुकिए। ये प्यारी-सी कविता जिसकी लेखिका हैं पारोमीता गोस्वामी।
दोस्तों आपने छोटे बच्चों को तो देखा ही होगा। वैसे तो उनकी सारी बातें हमें प्यारी लगती हैं। लेकिन, उनकी वो कौनसी बात है जो हमारा तुरंत मन जीत लेती है?– उनकी मुस्कुराहट। कितनी सच्ची और भोली होती है ना उनकी मुस्कुराहट?! उनको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो कहाँ हैं, उनके इर्द-गिर्द कौन है। वो बस मुस्कुराते रहते हैं, और अपनी मुस्कुराहट से दूसरों को ख़ुश करते हैं। हम भी, कभी ऐसे ही थे। लेकिन फिर पता नहीं, कब हम दूसरों को ज़्यादा importance देने लगे।
कई साल पहले psychologist Fritz Strack ने facial feedback hypothesis के बारे में बताते हुए कहा कि केवल बनावटी हावभाव से भी हमारे emotions बदलते हैं। उन्होंने एक experiment किया जिसमें उन्होंने कुछ participants को पेन दिया और उस पेन को होठों की मदद से पकड़ कर रखने को कहा। ऐसा करते समय उनको हँसने में problem हो रही थी, इसी की opposite फिर उन्होंने participants को जब दातों से पकड़ने को कहा तब उनके चेहरे पर मुस्कुराहट के भाव थे। आप भी चाहे तो अभी इस एपिसोड को pause करके ये experiment कर के देख सकते हैं। फिर उन्होंने participants को एक cartoon पढ़ने के लिए कहा। देखा गया कि जिन लोगों ने दातों से पेन को पकड़ा था उन्हें cartoons ज़्यादा मज़ेदार लगे। इससे ये समझमे आता है की अगर चेहरे पर मुस्कुराहट हो तो हम चीज़ों कि ज़्यादा enjoy करते हैं।
वैसे तो हम ख़ुशी के पलों में हमेशा मुस्कुराते ही रहते हैं, लेकिन कठिन समय में भी अगर चेहरे पर मुस्कुराहट रखना सीख जाएँ तो वो हमारी तरफ़ से ख़ुद को दिया हुआ best और specil
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दोस्तों, अभी हाल ही में मैने अमिताभ बच्चन की एक speech सुनी।और उसमें उन्होंने, उनके पिताजी यानी श्री हरिवंश राय बच्चन जी की कविता की एक line दोहरायीं थी। शायद आपको इस speech के बारे में पहले से ही पता होगा या आप भी मेरी तरह ही इस line को पहली बार सुन रहे हो होंगे। तो ये line कुछ ऐसी है- मन का हो तो अच्छा, और मन का ना हो तो और भी अच्छा . सुनने में, ये बहुत मामूली लगती हैं लेकिन इनमें बहुत गहराई है। आज के एपिसोड के लिए मैंने सोचा कि आपसे इसमें छूपी गहराई के बारे में बात की जाए जो मुझे समझ में आई है।
अपने नज़रिए को ऐसा बनाने की कोशिश करते हैं, जिससे थोड़े समय के लिए बुरा लगेगा, मगर फिर, हम ख़ुद से ये भी कहेंगे की अच्छा ही हुआ, शायद कल की सुबह एक नयी
कल एक झलक ज़िंदगी को देखा,
वो राहों में मरी गुनगुना रही थी।
फिर ढूँड़ा उसे इधर उधर,
वो आँख मिचोली कर मुस्कुरा रही थी।
एक अरसे की बाद आया मुझे क़रार,
वो सहला के मुझे सुला रही थी।
हम दोनों, क्यों ख़फ़ा हैं एक-दूसरे से,
मैं उसे, और वो मुझे समझा रही थी।
मैंने पूछ लिए, क्यों इतना दर्द दिया कमबख़्त तूने?
वो हँसी और बोली- मैं ज़िंदगी हूँ पगले, तुझे जीना सिखा रही थी।
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हमारा दिन हमेशा सकारात्मकता से भरा रहे। हम जो भी काम करें वो हम पूरे दिल से करें, हमें उसमें मज़ा आए। कठिन समय में भी हम हौसला ना खोए। This sounds too good to be true। correct? लेकिन, ये हो सकता है। मैं सच कह रही हूँ। हम अपने जीवन में जब चाहें तब सकारात्मकता ला सकते हैं।
कई बार हमारे मन में द्वेष की भावना आ जाती है, दूसरों के प्रति ग़ुस्सा भी आता है। ठीक है। कोई बात नहीं। हमारे अंदर इन भावनाओं का आना naturalहै। ये भावनाएँ ही हमें इंसान बनाती हैं। लेकिन उन भावनाओं को स्वीकार करना ये भी ज़रूरी है। सवाल ये है कि ऐसे विचारों के होते हुए भी सकारात्मकता के लिए जगह कैसे बनाए?
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क्या आप ज़िंदगी में ठहराव की ख़्वाइश रखते हैं?
कैसे करे ख़ुद को तेरे प्यार के क़ाबिल?
जब हम बदलते हैं, तुम शर्तें बदल देते हो!
-गुलज़ार
Happy Valentine’s Day to all of you!! पिछले कुछ सालों में valentines day की बात आते ही लोगों के दिमाग़ में इसकी तस्वीर कुछ ऐसी होती है की वो दिन जो love birds या किसी couple के बीच ही मनाया जाता है। लेकिन अगर प्यार का दिन कहा जाता है तो इसे सिर्फ़ couples तक ही सीमित क्यों रखा जाए? हम अपने क़रीबी दोस्तों को भी तो wish कर सकते हैं। क्यों ना उन्हें wish करके, उन्हें, हमारी ज़िंदगी में उनकी अहेमियत से वाक़िफ़ कराया जाए? जैसे की गुलज़ार साहब ने कहा, हम शर्तें ही इतनी रखते हैं की हमें हमेशा “कुछ कम है” ऐसा महसूस होता रहता है। दूसरों से ही नहीं हम तो ख़ुद के लिए भी इतनी शर्तें रखते हैं कि हमें ज़िंदगी में ठहराव नसीब ही नहीं होता है। कई बार तो हम ऊपरवाले से शिकायत करते हैं कि ये कैसा शोर। आइए सुनते हैं इस पर उस ऊपरवाले का जवाब।
पूछा जो मैंने एक दिन खुदा से,
अंदर मेरे ये कैसा शोर है?
हँसा मुझ पर फिर बोला,
चाहते तेरी कुछ और थी, तेरा रास्ता कुछ और है।
रूह को सम्भालना था तुझे,
पर सूरत सँवारने पर तेरा ज़ोर है।
खुला आसमान, चाँद, तारे चाहत है तेरी,
पर बाद दीवारों को सजाने पर तेरा ज़ोर है।
सपने देखता है खुली फ़िज़ाओं के,
पर बड़े शहरों में बसने की कोशिश पुरज़ोर है।
Source: Unknown
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छोटी सी है ज़िन्दगी
हर बात में खुश रहो...
जो चेहरा पास न हो,
उसकी आवाज़ में खुश रहो...
कोई रूठा हो आपसे,
उसके अंदाज़ में खुश रहो...
जो लौट के नहीं आने वाले,
उनकी याद में खुश रहो...
कल किसने देखा है...
अपने आज में खुश रहो...
Source: Unknown
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एक बार फिर, साल का वो समय आ गया है जब हममें से कई लोग, अगले साल की to-do list बनाने में busy हो जाते हैं। बड़े बड़े goals से सजी हुई list किसे अच्छी नहीं लगती? लेकिन, उससे भी अच्छी बात तो तब होती है, जब उस list को अच्छे से follow भी किया जाए।मेरा पूछे तो मैं ऐसी कोई लिस्ट नहीं बनाती हूँ। इसका ये ज़रा भी मतलब नहीं है की मुझे बदलाव पसंद नहीं है। अपनी ज़िंदगी में कुछ exciting होता रहे ये हर किसी को पसंद होता है। लेकिन मेरे resolution ना बनाने का कारण ये है की मुझे resolutions से ज़्यादा promises में भरोसा है। resolution ये शब्द मुझे एक pressure का अनुभव कराता है। इसीके opposite, promises या वादे, मुझे feel good factor देते हैं। वो इसलिए क्योंकी जब हम ख़ुद से किए हुए वादों को पूरा कर पाते हैं ना तो उससे ख़ुशी होती है। इसलिए मैं New Year’s Resolutions की जगह ख़ुद से अपनी ज़िंदगी में अच्छी आदतों को अपनाने का वादा करती हूँ। आज इसी के बारे में थोड़ा detail में बात करते हैं।
नई आदतों को अपनी ज़िंदगी में शामिल करना कठिन नहीं है। इसके पहले सबसे पहले ये तय करें की आप किस तरह की ज़िंदगी की चाह रखते है। उसके बाद उसके लिए किन बातों की , कैसे माहौल की ज़रूरत है। अब two minute rule try कीजिए। ये देखिए की क्या आप इस नयी आदत को दो मिनट के लिए आसानी से कर पाते हैं? अगर नहीं तो आपको इस आदत को और छोटे parts में break करना होगा। और आख़िरी स्टेप है की हर दी उस नयी आदत की ओर आप जो भी क़दम उठाए उसके लिए ख़ुश होना सीखिए। उसे नज़र अन्दाज़ ना करें।
तो दोस्तों अब बताइए, क्या आपने कभी New Year Resolutions को इस नज़रिए से देखा है? अगर नहीं तो कोशिश कर के देखिए। एक बार ख़ुद को Challenge कर के देखिए। ख़ुद से अपनी ज़िंदगी में अच्छी आदतों को अपनाने के वादे को पूरा करने के बाद जो ख़ुशी मिलती है ना वो कुछ अलग ही होती है। आप सबको नए साल की बहुत शुभकामनाएँ।
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चलिए दोस्तों, आज खोलते हैं अपने यादों के ख़ज़ाने को और याद करते हैं उन अनमो…ल पलों को, उन दिनों को, उन…. लम्हों को जो बना देती हैं….भूली बिसरी यादों को… कुछ ख़ास।
बात उन दिनों की है…
वो दिन शायद फिर लौट कर ना आए। मगर वो यादें, हमेशा हमारे दिल में भूली बिसरी यादें नहीं बल्कि ख़ास यादें बन कर ज़िंदा रहेंगी।
तो चलिए, आज खोलते हैं अपने यादों के ख़ज़ाने को और याद करते हैं उन अनमो…ल पलों को, उन दिनों को, उन लम्हों को जो बना देती हैं भूली बिसरी यादों को… कुछ ख़ास।
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