दोस्तों, अभी हाल ही में मैने अमिताभ बच्चन की एक speech सुनी।और उसमें उन्होंने, उनके पिताजी यानी श्री हरिवंश राय बच्चन जी की कविता की एक line दोहरायीं थी। शायद आपको इस speech के बारे में पहले से ही पता होगा या आप भी मेरी तरह ही इस line को पहली बार सुन रहे हो होंगे। तो ये line कुछ ऐसी है- मन का हो तो अच्छा, और मन का ना हो तो और भी अच्छा . सुनने में, ये बहुत मामूली लगती हैं लेकिन इनमें बहुत गहराई है। आज के एपिसोड के लिए मैंने सोचा कि आपसे इसमें छूपी गहराई के बारे में बात की जाए जो मुझे समझ में आई है।
अपने नज़रिए को ऐसा बनाने की कोशिश करते हैं, जिससे थोड़े समय के लिए बुरा लगेगा, मगर फिर, हम ख़ुद से ये भी कहेंगे की अच्छा ही हुआ, शायद कल की सुबह एक नयी
रोशनी लेकर आए। बड़े बुज़ुर्ग हमेशा कहते हैं ना - जो हुआ अच्छा हुआ। अब आगे सब अच्छा होगा। बस वैसे ही अपना नज़रिया रखते हैं। क्या आप सोच रहे हैं की ये कैसे हो पाएगा? तो यक़ीन मानिए – ये कठिन नहीं है।मैं ये अपने ख़ुद के अनुभव से बता रही हूँ। मन में ठान लीजिए कि अगर कुछ भी आपकी expectations के opposite हुआ, फिर भी आप ये शब्द कहेंगे की मेरा
कल और भी बेहेतर होगा। कुछ अलग करने के लिए मेरा रास्ता खुल गया है। अब मुझे ऐसे किसी काम में अपना समय ज़ाया नहीं करना पड़ेगा जो शायद मैं बस करना है
इसलिए कर रही थी । देखिएगा ज़िंदगी भी आपकी तरफ़ मुस्कुरा कर एक प्यारा सा जवाब देगी। सुनना चाहेंगे वो जवाब? तो सुनिए इस poem में...
कल एक झलक ज़िंदगी को देखा,
वो राहों में मरी गुनगुना रही थी।
वो आँख मिचोली कर मुस्कुरा रही थी।
एक अरसे की बाद आया मुझे क़रार,
वो सहला के मुझे सुला रही थी।
हम दोनों, क्यों ख़फ़ा हैं एक-दूसरे से,
मैं उसे, और वो मुझे समझा रही थी।
मैंने पूछ लिए, क्यों इतना दर्द दिया कमबख़्त तूने?
वो हँसी और बोली- मैं ज़िंदगी हूँ पगले, तुझे जीना सिखा रही थी।
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