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आम तौर पर, inspirational topics की बात आने पर, हम selflessness की बात करते हैं। आपने लोगों को कहते सुना होगा कि दिल खोल कर दूसरों की मदद करें, दूसरों की भावनाओं की क़द्र करें। लेकिन कभी कभी ख़ुद के के लिए, थोड़ा selfish होना, बनता है। सवाल आता है क्यों? अगर selflessness को एक pedestal पर रखा जाता है फिर selfishness कैसे उसकी जगह ले सकता है? तो यहाँ हम किसी को किसी दूसरे से replace करने की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हमारी mental, emotional, और physical wellbeing की। चलिए आज इसी पर बात करते हैं।
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आपको Jab we met movie से करीना कपूर का dialogue याद है? – “मैं अपनी favorite हूँ।“ बस, हम सबकी कहानी, कुछ वैसी ही है। और इसमें बुरा क्या है? हमें ख़ुद का favorite होना ही चाहिए। इतनी ख़ूबसूरत ज़िंदगी मिली है! तो उसे उतनी ही ख़ूबसूरती से जीना भी तो चाहिए। कौन क्या कह रहा है, क्या कर रहा है – इन सबके बारे में सोच कर अपना समय क्यों ज़ाया करें। लेकिन हर कोई, इस बात को follow नही कर पाता है। ख़ुद के favorite बनते बनते वे कब दूसरों को अपना favorite बना लेते हैं ते उन्हें पता ही नहीं चलता। हम दूसरों पर इतना ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं की हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब उनके जैसे बनने लगते हैं। क्या किसी का influence इतना powerful हो सकता है?
Previous Episode: ज़िंदगी में लोगों की filtering ज़रूरी है
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दोस्तों, जिस तरह हम समय समय पर घर की चीज़ों को organize करते हैं, उसी तरह हमसे जुड़े लोगों पर भी एक नज़र डालनी चाहिए। कभी कभी जिन्हें हम अपना अच्छा दोस्त मानते हैं उनकी हमसे कुछ अलग ही बर्ताव की अपेक्षा होती है या जीवन को देखने का उनका नज़रिया कुछ अलग ही होता है। ऐसे में उस दोस्ती का लम्बे समय तक चल पाना कठिन है। और अपने कटू अनुभवों से सीख लेकर हमें, ऐसे लोगों की filtering करना ज़रूरी हो जाता है। मैं इस विषय पर क्या सोच रखती हूँ आयिए बताती हूँ आपको इस एपिसोड में।
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Happy Mother’s Day to all the wonderful moms listening to this show. आज क्योकी Mother's Day है इसलिए आजका episode भी mothers से related है। आज हम बात करने वाले हैं IMPROVE इस शब्द की मगर एक Therapeutic Tool के रूप में देखेंगे। हाल ही में मैने DBT Dialectical behavior therapy के बारे में पढ़ा जो behavioral patterns को समझने में हमारी मदद करता है, और इस इस therapy में Improve the moment ये एक tool है जो stressful situations में हमें अपनी भावनाओं को handle करने में काम आता है।
मुझे लगा की इसे आपसे share करना चाहिए। इसके बारे में Mother's Day पर बाँटने का कारण ये है की हम अक्सर इनकी तरफ़ ध्यान नहीं देते हैं। इस एपिसोड में आगे हम जब इस word के हर एक letter को decode करेंगे तब आपको समझमें आ जाएगा की मैं क्या कहना चाहती हूँ। आइए फिर IMPROVE इस शब्द को एक नए अन्दाज़ में समझते हैं।
I :Imagery (think about your favorite place)
M: Meaning (find the meaning to of your actions)
P:Prayer
R:Relaxation (do whatever you like)
O: One (thing at a time)
V: Vacation (taking a break)
E: Encourage (using encouraging words for yourself)
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हम सभी के मन में सिर्फ़ दो तेरह के विचार आते हैं- अच्छे ओर बुरे। 24घंटे के एक दिन में हमारे मन में अनगिनत ख़याल आते हैं। हमारा मन अच्छे ख़याल को तो तुरंत भूल जाता है मगर एक छोटे से छोटा बुरा ख़याल हमें झकझोर कर रख देता है। हमें कुछ सूझता ही नहीं है। और फिर ये एक बुरा ख़याल कई और बातों पर अपना असर दिखाने लगता है। इसलिए अगर हम अपने negative thoughts से दूर रहने की कोशिश करेंगे तो कई और बातें अपने आप सुलझ जाएँगी। ऐसा नहीं है की हम ये करने की कोशिश भी नहीं करते हैं लेकिन क्या करें, बुरे ख़याल बार बार मन में आ ही जाते हैं। लेकिन अब बस। इनको रोकने का अब कोई ना कोई रस्ता ढूँड़ना होगा। वह रास्ता है emotional diet का महत्व समझने कर उसे अपनी ज़िंदगी में शामिल करना। वह कैसे करे आइए बताती हूँ।
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हम जब लगातार inspiring talks सुनते हैं, या हमेशा positive रहने वाले लोगों से मिलते हैं तब automatically हमारे बोलने में उसका प्रभाव झलकने लगता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी भाषा में ऐसे कई शब्द होते हैं जो हमें empowering लगते हैं। जिसे Transformational Vocabulary भी कहा जाता है। हम भी transformational vocabulary को अपनी ज़िंदगी में शामिल कर सकते हैं। जिन लोगों ने इसके बारे में सुना होगा उन्होंने इसके प्रभाव को महसूस भी किया होगा । और जिनका अभी तक इससे परिचय नहीं हुआ है तो मुझे ये पूरा यक़ीन है की आजका episode सुनने के बाद आप इसे अपनी आदतों में ज़रूर शामिल कर लेंगे। कैसे ये जानने के लिए आइए मेरे साथ। समझते हैं शब्दों की ताक़त को और बात करते हैं Transformational Vocabularyके बारे में।
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बदलाव। बदलाव हम सभी चाहते हैं। मगर बदलाव हमेशा हमारे मुताबिक़ ही हो ये ज़रूरी नहीं है। कई बदलाव हमारे अच्छे के लिए होते है। तो कुछ बदलाव हमारे अच्छे खासे चल रहे जीवन में उथल पुथल भी लेकर आते हैं। फिर क्या करें? बदलाव ना ही हो तो अच्छा हैये सोच कर चुप बैठ जाएँ, और जैसा चल रहा है वैसा चलने दें? लेकिन फिर हम वह कैसे बन पाएँगे जो हम बनना चाहते हैं? इसका एक ही जवाब है – कुछ और बदले उसके पहले हमें बदलना होगा।मगर कैसे? सोचने की बात तो है। चलिए फिर आज बात करते हैं- कुछ और बदले उसके पहले हमें बदलना होगा।
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Confidence is not “I am better than them”, confidence is “I am great, so are they”
सफलता किसे अच्छे नहीं लगती। आख़िर हम जितनी मेहेनत करते हैं, वह सफलता पाने के लिए, ख़ुश रहने के लिए एक आराम का जीवन जीने के लिए ही तो है। लेकिन इतना सब होते हुए भी हम कई मौक़ों पर restless हो जाते हैं। हमें हमेश एक डर सा लगा रहता है की कोई हमसे आगे ना निकल जाए। ऐसा क्यों? अगर मेहेनत हम स्वयं के लिए कर रहे हैं, हम अपने जीवन को सवारना चाहते हैं फिर दूसरों की इतनी चिंता क्यों? अगर सोचना ही है तो स्वयं के बारे में सोचते हैं ना। हम सबको अपनी क्षमताएन पता हैं तो उनको इस्तेमाल करके आगे बढ़ते हैं। स्वयं पर विश्वास रखते हैं, हारे अंदर छुपी प्रतिभाओं को जगाते हैं। ऐसा करने से हमें कभी भी दूसरे से insecurity नहीं होगी।
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स्वतः की कबीलियत या self worth जिसे हम आत्म-मूल्य भी कहते हैं उसे जानने के लिए या पारखने के लिए हमारी performance यानी हमारा काम -क्या ये एक सही मापदंड हैं? या ऐसा कहते है कि क्या performance और हमारी self worth का आपस में कोई संबंध है?
मुझे ऐसा लगता है की अगर हम अपनी performance को, सफलताओं को self-worth से जोड़ेंगे तो हम हमेशा असंतुष्ट ही रहेंगे। क्योंकी हर बार तो हमें सफलता नहीं मिलेगी। और सफलता पाने के लिए, आगे बढ़ने की होड़ में हम दूसरों को अपेक्षा से ज़्यादा महत्व देने लगते हैं। कैसे? आइए बात करते हैं आज के एपिसोड में।
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