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I strongly feel की हर दिन ही मातृत्व दिवस है। अगर एक माँ के लिए बच्चे उसके जीने का मक़सद हैं तो फिर, बच्चों के लिए उनकी माँ में सारा ब्रह्मांड समाया हुआ है। किसी माँ का उसके बच्चे के प्रति प्यार शब्दों में बायाँ करना बहुत कठिन है। हम चाहे कितना ही महँगा तोहफ़ा क्यों ना ले आए, मगर माँ के प्यार के सामने वो हमेशा छोटा ही प्रतीत होगा। luckily मातृत्व दिवस के रूप में हमारे पास एक दिन है जो पूरी तरह से माँ को समर्पित है।
आज मैं आपसे कुछ ऐसे gifts ideas बाटूँगी जो सुनने में तो बहुत ही साधारण लगेंगे मगर ये आपकि माँ के लिए सिर्फ़ mother's day तक ही सीमित नहीं रहेंगे। बल्कि उनको काफ़ी लम्बे समय तर एक ख़ुशी का अनुभव कराएँगे। और वैसे भी अपना प्यार व्यक्त करने के लिए क्या वाक़ई किसी महंगे तोहफ़े की आवश्यकता है? कोई भी चीज़ जो सच्चे मन से की जाए वो बहुमूल्य होती है।
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सवाल बहुत मुख्य भूमिका निभाते हैं हमारे जीवन में। हम हमेशा सवालों से घिरे रहते हैं। दूसरे की बारे में सवाल, अपने बारे में सवाल। जब बात अपने बारे में सवालों की आती है तब हमारी ज़िम्मेदारी थोड़ी बढ़ जाती हैं और हम कुछ हद तक भावुक भी हो जाते हैं। हमारे दिमाग में किस तरह के सवाल आते हैं और उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण हम उन सवालों को किस दिशा में ले कर जाते हैं ये तय करना बहुत महत्वपूर्ण है। ये दिशा है - उन सवालों के उत्तर।
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जब हम कोई movie या TV shows देखते हैं तब कुछ किरदार ऐसा होते हैं जो हमारे दिल को छू जाते हैं। उनको देख कर हमें ऐसा लगता हैं as if they are living next door.‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ serial की राजश्री माहेश्वरी या ‘विवाह’ movie की भावना ऐसे ही कुछ किरदारों में से हैं। और इनको निभाने वाली कलाकार हैं लता सबरवाल। इनको किसी भी introductionकी ज़रूरत नहीं है। लता सबरवाल ने सिर्फ़ अपने अभिनय के माध्यम से ही नहीं बल्कि अपने youtube channel, Live chatsइनके माध्यम से अपने दर्शकों में अपनी एक ख़ास जगन बनाई है। I am very lucky to have her on my show today. इस interview के दौरान लता ने उनके holistic approach, self-worth, inner beautyजैसे और भी कई विषयों पर अपने विचार share किए। This entire session was very inspiring. तो चलिए, आप भी हिस्सा बन जाइए इन बातों का सफ़र का। Please welcome Lataa Saberwal – actress, certified nutritionist, and lifestyle image consultant.
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आज का विषय ना तो संजीदा है और ना ही हल्का फुल्का। मुझे इस विषय पर कई बार प्रश्न पूछे जाते हैं इसलिए मैंने सोचा क्यों ना आज आपसे उन प्रश्नो के उत्तर देते हुए आपसे बात की जाए। आज मैं आपसे बात करने वाली हूँ पॉड्कैस्ट की। तो आज पॉड्कैस्ट पर पॉड्कैस्ट की बात होने वाली है।
अक्सर मुझे मेरे दोस्त पॉड्कैस्ट से जुड़े प्रश्न पूछते हैं – जैसे पॉड्कैस्ट शुरू करने के लिए किन बातों का ध्यान चाहिए, content कैसे तैयार किया जाए, एक episode कितना लम्बा होना चाहिए, या कौन कौन से equipments होना ज़रूरी है, ख़ुद को motivated और organized कैसे रखा जाए। तो चलिए शुरू करते हैं आजका एपिसोड।
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Mental health या मानसिक स्वास्थ्य ये विषय आज काफ़ी सुनने में आता है। हमारी जीवनशैली, चीज़ों को परिस्थितियों को देखने का हमारा नज़रिया ये बदल गया है।जिसके कारण कई बार ना चाहते हुए भी हम disturb हो जाते हैं। और इसकी तरफ़ सही समय पर ध्यान देना और किसी expert की राय लेना ये बहुत ज़रूरी है। मेरी आजकि guest ने Mental Health इस क्षेत्र में काफ़ी काम किया है and I am very proud to know her as my friend and co-blogger. Please welcome Priyanka Joshi-author, blogger, and NLP and Mindfulness Practitioner.
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Podcast: Mental Health First, Youtube: Rebel Poet
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आज मेरे साथ जो guest हैं उनका सम्बंध हम सभी की बहुत पसंदीदा चीज़ें से है – मैं बात कर रही हूँ – हमारी नींद की। बताइए है कि नहि ये हमारी ज़रूरत और बहुत ही पसंदीदा चीज़ें? नींद हम सबको बहुत प्यारी होती है। अगर अछी नींद मिल जाते तो हमारा दिन भी बहुत अच्छा गुज़रता है। infact, नींद का हमारे mood से भी गहरा सम्बंध है। मगर कुछ लोगों को नींद से जुड़ी समस्याईं होती हैं – जैसे नींद ना आना, या, कच्ची नींद की समस्या। और आजकल बच्चों को भी नींद से जुड़ी शिकायतें होने लगी है। आज हम इन सब विषयों पर बात करेंगे हमारी महमान से। Please welcome Dr. Sudha Tallavajhula – Neurology faculty at UT Medical School of Houston and sleep medicine specialist.
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हमारे दिन कैसे दिख राय हैं, हम उनको कसा समझते हैं ये तय करता हैं हमारा नज़रिया कैसा है। कुछ जो आज बात करते हैं दृष्टिकोण कि। जिसे हम नज़रिया भी कहते हैं। सब कुछ नज़रिए का ही खेल है। नज़रिया ही है जो हमें किसी भी परिस्थिती में हिम्मत ना हारने के लिए प्रेरित करता है, या नज़रिया ही हमें किसी नई जगह पर नए दोस्त बनाने में काम आता है। दिन बहुत अच्छे दिखेंगे, कुछ दिन बिलकुल भी अच्छे नहि दिखेंगे। मगर हम उनको कैसे perceive करते हैं, समझते हैं – यही वो चीज़ हैं जो हमें ख़ुशी देती है या हमें उदास करती है।
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Blogging के माध्यम से मैं कई बार book reviews भी करती हूँ। किसी किताब के बारे में दूसरों को कम और सटीक शब्दों में बताना जितना interesting है उतना ही challenging भी है।क्योंकि ये readers के लिए उस किताब को पढ़ा जाए या ना पढ़ा जाए तय करता है। आज मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति से मिलवाने वाली हूँ जिनका किताबों से गहरा ताल्लुक़ है। ये प्रतिदिन एक नयी किताब पढ़ते हैं।इन्होंने अभी तक लगभग 1480 किताबें पढ़ीं हैं और उनको summarize भी किया है।और आज वो Booklet Guy के नाम से जाने जाते हैं. Please welcome अमृत देशमुख।
हमारी बातचीत के दौरान अमृत ने reading से related की बातें share की जैसे हम reading को कैसे enjoy कर सकते हैं, The Booklet Guy की शुरूवात कैसे हुई, अमृत के जीवन में किताबों का क्या महत्व है।तो चलिए जानते हैं कैसा था अमृत का अभी तक का सफ़र।
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जबसे pandemic हुआ है, हमारे कई plans बने और फिर पूरे नहीं हो पाए। सबकुछ बहुत unpredictable हो गया है। जिसके कारण हमें frustration भी होती है। जब आपके मन के अनुरूप काम नहीं होते तब क्या आप frustrate हो जाते हैं? क्या आप ख़ुद को judge करने लगते हैं?
आपको क्या लगता है - सिर्फ़ बड़ी मुश्किलें ही रुकावटें होती हैं? नहीं। अगर हमारा नज़रिया नहीं बदल तो हमें हर दिन एक नई रुकावट हमारा रास्ता रोके खड़ी नज़र आएगा। अगर हमने कोई किसी राह पर चलने का तय किया है तो फिर रुकावटें तो आएँगी।
फिर क्या करें? कैसे हटाए उन रुकावटों को?तो आज बात करते हैं रुकावटों की और उन्हें कैसे दूर किया जाए।
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आज बात करते हैं, उन्ही emotional triggers की।आपने ख़ुद को कभी ऐसी situationमें पाया है जब आप कोई ऐसी चीज़ कर देते हैं, या बात कह देते हैं जो आपको नहीं कहनी चाहिए या करनी चाहिए थी? कई बार हमें पता होता है की हमरा रवैया सही नहीं है और हमें इसके लिए कुछ करना चाहिए मगर हमारी ज़िंदगी auto-pilot mode पर चल रही होती है। दिन आते हैं, दिन बीत जाते हैं, हम हर उन मौक़ों पर ख़ुद को बदलने के बारे में सोचते हैं और फिर बात वही की वही राह जाती है। मगर अगर आप वाक़ई ख़ुद में बदलाव की अपेक्षा करते हैं तो फिर इंतज़ार किस बात का?
चलिए आजसे से शुरू कीजिए। उन auto-pilot mode पर चल रहे व्यवहार को कैसे बदले: पहला, आपके सामने फिर ऐसी ही कोई situationआयी जो आपके लिए trigger का काम करती है। आप एक बार फिर अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण नहि रख पाए। तो ऐसी situation में, उसे realize करें और अगली बार उसे सुधारने का प्रयास करें। इसी कि continuation में आपके सामने दोबारा वैसी ही situation आयी जैसे पहले भी आयी थी और आपने ख़ुद को सुधारने का वादा किया था। इस बार जैसे ही आपको ये realize हो की आप ख़ुद पर से control loose कर रहे हैं, वही पर ख़ुद को रोक ले। See you are getting better! इस बार आपने बाद में realize नहीं किया और अगली बार का इंतज़ार नहीं किया। अब जब आपको ख़ुद पर नियंत्रण रखना धीरे धीरे आ रहा है तब आपको वो triggers भी समझ में आने लगे हैं। तो ऐसी कोई situation आए उसके पहले ही उसको अपने control में लें ले। जिसे हम “ग़ुस्सा पी जाना” भी कहते हैं। Congratulations आपने ख़ुद के emotional triggers पर control पाना सीख लिया। See it is not that hard।
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