वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – 40वाँ सर्ग
इस सर्ग में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को राजा सगर के पुत्रों के अंत की कथा सुनाते हैं। सगर के पुत्र जब खोदे हुए मार्ग से कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँचते हैं, तो वे वहाँ यज्ञीय अश्व को देखते हैं और जल्दबाजी में मुनि को दोषी ठहरा देते हैं। उनके इस अधर्म के कारण वे महर्षि कपिल के क्रोध से भस्म हो जाते हैं।
1. सगर के पुत्रों का कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचना
सगर के साठ हजार पुत्रों ने संपूर्ण पृथ्वी खोद डाली, जिससे पृथ्वी हिल उठी और सभी जीव त्रस्त हो गए। अंत में, वे कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँचे, जहाँ उन्होंने देखा कि यज्ञीय अश्व वहीं बँधा हुआ है।
2. कपिल मुनि पर आरोप और उनका क्रोध
सगर के पुत्रों ने बिना सोचे-समझे महर्षि कपिल पर आरोप लगाना शुरू कर दिया। वे अत्यंत अहंकारी और क्रोधित थे, इसलिए वे मुनि को अपशब्द कहने लगे और उन पर आक्रमण करने के लिए दौड़े।
कपिल मुनि गहन तपस्या में लीन थे। जब उनकी समाधि भंग हुई और उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से यह देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उनके क्रोध से उनके नेत्रों से अग्नि उत्पन्न हुई, जिसने देखते ही देखते सगर के साठ हजार पुत्रों को भस्म कर दिया।
3. राजा सगर को अपने पुत्रों की मृत्यु का ज्ञान नहीं
राजा सगर अपने पुत्रों की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन जब बहुत समय बीत गया और वे नहीं लौटे, तो उन्होंने अपने पौत्र अंशुमान को यज्ञीय अश्व की खोज के लिए भेजा।
अगले सर्ग में: अंशुमान कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचते हैं और अपने पितामहों की दुर्गति देखकर दुखी होते हैं। वे कपिल मुनि से अपने पूर्वजों के उद्धार का उपाय पूछते हैं।
शिक्षा:
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और अधर्म का परिणाम नाश ही होता है। बिना सोचे-समझे किसी को दोषारोपण करने से स्वयं का ही विनाश हो सकता है।