वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – इक्कीसवाँ सर्ग
इस सर्ग में महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ की वचनभंग की प्रवृत्ति देखकर अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं। जब दशरथ बार-बार यही कहते हैं कि वे राम को नहीं भेज सकते, क्योंकि वह अभी बालक है और राक्षसों का सामना करने में सक्षम नहीं है, तब विश्वामित्र कठोर शब्दों में कहते हैं—
“हे रघुकुलनंदन! आप इक्ष्वाकु वंश के राजा होकर भी अपने वचन से पीछे हट रहे हैं? यह धर्म के विरुद्ध है। आपने स्वयं कहा था कि मुझसे जो भी चाहिए होगा, आप देंगे। अब जब मैंने राम को माँगा, तो आप मुकर रहे हैं। यह क्षत्रिय धर्म नहीं है!”
विश्वामित्र की इस कठोर बात को सुनकर राजा दशरथ अत्यंत चिंतित और भयभीत हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि यदि महर्षि कुपित हो गए, तो उनका समस्त वंश नष्ट हो सकता है। तभी महामुनि वशिष्ठ, जो दशरथ के कुलगुरु थे, बीच में हस्तक्षेप करते हैं और राजा दशरथ को समझाते हैं—
वशिष्ठ का दशरथ को समझाना
वशिष्ठ मुनि राजा दशरथ से कहते हैं—
“राजन! महर्षि विश्वामित्र केवल तपस्वी ही नहीं, बल्कि अत्यंत पराक्रमी भी हैं। वे संपूर्ण ब्रह्माण्ड के ज्ञाता हैं और अनगिनत दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के स्वामी हैं। उनकी कृपा से आपका पुत्र राम सुरक्षित रहेगा। आपको संकोच नहीं करना चाहिए।”
“स्मरण रहे, राम केवल आपका पुत्र नहीं, बल्कि संपूर्ण संसार की रक्षा के लिए अवतरित हुए हैं। यदि आप राम को नहीं भेजते, तो यह आपके वंश और राज्य के लिए भी अशुभ होगा।”
वशिष्ठ मुनि के इन वचनों से राजा दशरथ को ज्ञान होता है कि वे एक महान ऋषि के क्रोध को आमंत्रित कर रहे हैं और धर्म के विपरीत आचरण कर रहे हैं। वे तुरंत अपनी भूल स्वीकार करते हैं और अत्यंत दुखी मन से कहते हैं—
“हे महर्षि विश्वामित्र! मैं अपने पुत्र राम को आपके साथ भेजने के लिए सहमत हूँ। आप उनका उचित मार्गदर्शन करें और उनकी रक्षा करें।”
दशरथ का राम को भेजने के लिए तैयार होना
राजा दशरथ फिर अपने पुत्र राम को बुलाते हैं और उन्हें महर्षि विश्वामित्र के साथ जाने की अनुमति देते हैं। वे लक्ष्मण को भी राम के साथ भेजने का निर्णय लेते हैं, ताकि वे अपने बड़े भाई की सेवा कर सकें।
इस प्रकार, गुरु वशिष्ठ की सलाह से दशरथ अपने पुत्र राम और लक्ष्मण को महर्षि विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए राजी हो जाते हैं, और इस सर्ग का समापन होता है।