बाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के सत्ताईसवें (27वें) सर्ग में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्रदान करते हैं।
सर्ग का विवरण:
1. ताड़का वध के बाद – जब श्रीराम ने ताड़का का वध कर दिया, तब ऋषि-मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए। महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम की वीरता की सराहना की और उनके शौर्य को देखते हुए उन्हें दिव्यास्त्र प्रदान करने का निश्चय किया।
2. अस्त्रों की शिक्षा – महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को कई अद्भुत और शक्तिशाली अस्त्रों की जानकारी दी। इन अस्त्रों में ब्रह्मास्त्र, वैष्णव अस्त्र, इंद्र का वज्र, अग्नि अस्त्र, वरुणास्त्र, वायु अस्त्र, नागपाश, गरुड़ास्त्र, मोहनास्त्र, प्रस्वापनास्त्र, त्रिशूल, कालास्त्र आदि शामिल थे।
3. अस्त्रों का प्रभाव – ये सभी अस्त्र विशेष शक्तियों से युक्त थे। कुछ अस्त्र शत्रुओं को मोहित कर देते थे, कुछ उन्हें निद्रा में डाल देते थे, कुछ उन्हें जलाकर भस्म कर सकते थे, तो कुछ असाधारण विनाश कर सकते थे।
4. अस्त्रों की प्राप्ति – महर्षि विश्वामित्र ने मंत्रों द्वारा श्रीराम को इन अस्त्रों का ज्ञान दिया और कहा कि जब भी वे चाहें, अपने संकल्प मात्र से इन अस्त्रों को बुला सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर इन्हें वापस भी भेज सकते हैं।
5. लक्ष्मण का योगदान – श्रीराम के साथ लक्ष्मण भी थे, और उन्होंने भी इन घटनाओं को ध्यानपूर्वक देखा और सीखा।
महत्व:
• इन दिव्यास्त्रों की प्राप्ति के बाद श्रीराम और भी शक्तिशाली योद्धा बन गए।
• आगे चलकर यही अस्त्र-शस्त्र राक्षसों के वध और धर्म की स्थापना में सहायक हुए।
• यह घटना श्रीराम की दिव्यता और उनकी ईश्वरीय शक्ति को भी प्रकट करती है।
इस प्रकार, बालकाण्ड के 27वें सर्ग में श्रीराम को दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति होती है, जिससे वे राक्षसों के संहार के लिए और अधिक सक्षम हो जाते हैं।