*जो कुछ भी करो, वह भगवान् के लिये करो।
* भग़द्गीतामें भगवान् के वचन "योगक्षेमं वहाम्यहम्" की पूर्तिके लिये उससे पूर्व कहे गये "अनन्याश्चिन्तन्तो मां" का पालन करें।
*उद्धवगीता के अनुसार यम और नियमके 12-12 प्रकार। इस सम्बन्ध में पातञ्जल योगसूत्र और श्रीमद्भागवतान्तर्गत उद्धवगीता की तुलना।
* भगवान् में बुद्धिका लग जाना ही "शम" है।
*सर्वत्र ईश्वर को देखना ही "सत्य" है।
*शरीर को ही आत्मा समझना ही "मूर्खता" है।
* गुरु ही सच्चा "भाई-बन्धु" है।
* गुण-दोषों पर दृष्टि जाना ही सबसे बडा़ "दोष" है।