जीवन को आनंदमय बनाने, संतुष्टि व प्रसन्नता से जीने के लिए हमें चलते फिरते तीर्थ, चलते फिरते ग्रन्थ और चलते फिरते मंदिर के निकट रहना चाहिए, जो सद्गुरु होते हैं। अपने गुरु के प्रति जीवन अर्पित करते हुए उनके प्रति वफादार रहना चाहिए। ऐसे गुरु परंपरा के प्रति वचनबद्ध लोगो के लिए अपने आतंरिक गुरु को जागृत करना आवश्यक है, आतंरिक गुरु जो हर क्षण जीवन का मार्गदर्शन करते हैं।