ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इस दुनिया में हर चीज अपनी पूर्णता की ओर दौड़ रही है, केंद्र की ओर दौड़ रही है। आग ऊपर की ओर जाना चाहती है जहाँ इसका पूर्ण रूप सूर्य है और पानी नीचे की ओर जाना चाहता है जहाँ इसका पूर्ण रूप समुद्र है। मनुष्य भी अपने धन, सम्बन्ध, आनंद, प्रेम, शक्ति इत्यादि की परिपूर्णता ही ढूंढता है। समझें कि आखिर शुद्ध परिपूर्णता है कहां, जिसके बाद कुछ भी अधूरा नहीं रहता?