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गणेश पुराण में, शौनक जी, सूत जी से गणेश जी के गजानन होने की कथा पूछते हैं। सूत जी उन्हें वही कथा सुनाते हैं जो नारायण ने नारद मुनि को सुनाई थी।
एक बार देवराज इन्द्र पुष्पभद्रा नदी के शान्त और सुन्दर तट पर थे। उस निर्जन क्षेत्र में कई सुन्दर पुष्प और वृक्ष लगे हुए थे।
अभी इन्द्र देव इस मनोहर क्षेत्र को देख ही रहे थे तभी उन्हें घास पर लेटी हुई रम्भा दिखाई दी। रम्भा को देखते ही इन्द्र देव वासना से लिप्त हो गए और रम्भा से उनकी नज़र नहीं हटीं। रम्भा को ऐसा भान हुआ कि कोई उसे देख रहा है तो वह अपनी जगह से खड़ी हुई और उसका ध्यान इन्द्र देव की तरफ़ गया। रम्भा भी इन्द्र देव की तरफ़ आकर्षित हुई और उनकी तरफ़ बढ़ने लगी।
जैसे ही रम्भा, इन्द्र देव के निकट पहुँची उन्होंने पूछा, "हे मनमोहनी! तुम कौन हो? तुम कहाँ से आई हो और कहाँ जा रही हो? क्या तुम मेरा एक काम करोगी?"
रम्भा इन्द्र की बात सुनकर लजा गई और बोली, "देव! मैं तो आपकी दासी हूँ। आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगी।"
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जब भगवान् श्रीकृष्ण पर लगा चोरी का आरोप
सूत्रधार की इस कहानी में हम सुनेंगे स्यमन्तक मणि के बारे में। स्यमन्तक मणि एक ऐसी मणि थी जिसमें स्वयं भगवान् सूर्यदेव का तेज समाहित था। वो मणि जिस भी राज्य में रहती उस राज्य में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती। अब ऐसी मणि को कौन नहीं पाना चाहेगा। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के मन में उस मणि को पाने की इच्छा जागी। बचपन में गोपियों से माखन चुराकर खाने के कारण भगवान् श्रीकृष्ण का एक नाम माखनचोर भी है। लेकिन इस बार जो आरोप भगवान् कृष्ण पर लगा था वो हंसी-खेल में करी गयी चोरी का नहीं था। इस बार आरोप लगा था दुनिया की सबसे मूल्यवान वस्तु की चोरी का। आरोप था कि श्रीकृष्ण ने चोरी की थी स्यमन्तक मणि की। क्या था इस आरोप का सच? क्या सच में चुराई थी श्रीकृष्ण ने वो मूल्यवान मणि? अगर नहीं, तो फिर उन पर ऐसा आरोप क्यों लगा? इन्ही प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे हमें आज की इस कथा में। भगवान् श्रीकृष्ण की पत्नियों जांबवंती और सत्यभामा के तार भी इसी कथा से जुड़े हुए हैं । तो फिर बिना समय व्यर्थ किये सुनते हैं इस रोचक कथा को और जानते हैं इससे जुड़े हुए सारे प्रश्नों के उत्तर।
अंधकवंशी यादवों के राजा सत्राजित भगवान् सूर्यदेव के परम भक्त थे। सत्राजित ने वर्षों तक सूर्यदेव की आराधना की। एक दिन सुबह-सुबह सत्राजित रोज की ही तरह सूर्य वंदना कर रहे थे, कि भगवान् सूर्यदेव स्वयं उनके सामने प्रकट हो गए। सत्राजित ने जब भगवान् आदित्य को साक्षात् अपने सामने खड़ा हुआ देखा तो हाथ जोड़कर वंदना करते हुए कहा,"प्रभु! आप जिस तेज से इस सारे संसार को प्रकाशित करते हैं, मुझे वह तेज देने की कृपा करें।" सत्राजित के ऐसा कहने पर भगवान् भास्कर ने उन्हें दिव्य स्यमन्तक मणि दी। यह मणि सूर्य के तेज से प्रकाशित थी और उसको अपने गले में पहनकर जब सत्राजित ने अपने नगर में प्रवेश किया तो सभी को लगा स्वयं सूर्यदेव पधारे हैं।
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एक दिन महाराज शान्तनु गंगा नदी के समीप विचरण कर रहे थे और उन्होंने देखा कि एक किशोर आयु के बालक ने अपनी धनुर्विद्या से गंगा नदी के प्रवाह को रोक दिया था। महाराज शान्तनु उसकी ऐसी निपुणता को देखकर आश्चर्यचकित हुए और उससे उसका परिचय पूछा। उस समय देवी गंगा ने वहाँ प्रकट होकर महाराज शान्तनु को उस बालक का परिचय देते हुए कहा, “महाराज! आज मैं आपका पुत्र देवव्रत आपको सौंपती हूँ। इसने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के मार्गदर्शन में वेदों का अध्ययन किया है और धनुर्विद्या की शिक्षा स्वयं भगवान परशुराम से प्राप्त की है। यह आपका पुत्र आपके कुरुवंश का उत्तराधिकारी बनने के लिए सर्वथा योग्य है।” ऐसा कहकर देवी गंगा नदी में विलीन हो गईं और महाराज शान्तनु अपने पुत्र को अपने साथ राजमहल ले आए।
देवव्रत सभी प्रकार की विद्याओं में निपुण थे और महाराज शान्तनु को अपने पुत्र पर बड़ा गर्व था। देवव्रत से प्रभावित होकर महाराज शान्तनु ने उसे अपना उत्तराधिकारी बनाकर राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। युद्धकला में पारंगत देवव्रत ने अपने पिता के यज्ञ के लिए विश्व विजय का अभियान किया और सभी राजाओं को हस्तिनापुर के अधीन कर दिग्विजय का महान कार्य सम्पन्न किया। महाराज शान्तनु युवराज देवव्रत को पाकर स्वयं को धन्य समझते थे और उसे राज्य का समस्त कार्यभार सौंपने का निर्णय कर चुके थे।
एक दिन महाराज शान्तनु यमुना नदी के समीप विचरण कर रहे थे कि उनका ध्यान एक मानमोहिनी गन्ध की ओर आकृष्ट हुआ। उस गन्ध के स्रोत को खोजते हुए उनकी भेंट मछुआरे की कन्या सत्यवती से हुई। सत्यवती की दैवी सुन्दरता को देखकर महाराज शान्तनु का मन मोहित हो गया और वो उसके पास जाकर बोले, “देवी! कौन हो तुम? तुम्हारे रूप को देखकर तो लगता है कि तुम स्वर्ग की कोई अप्सरा हो और तुम्हारे शरीर से आने वाली यह मोहक गन्ध भी इस लोक से परे है।”
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द्वारका में पारिजात वृक्ष
इस कहानी के पहले भाग में हमने जाना कि किस तरह नारद मुनि के द्वारका आने पर एक के बाद एक कई घटनाओं का क्रम बँधा, जिस कारण श्रीकृष्ण ने सत्यभामा को अमरावती से पारिजात वृक्ष लाने और उसे सत्यभामा के बाग में लगाने का वचन दिया। श्रीकृष्ण की पारिजात हरण लीला के इस भाग में हम जानेंगे कि श्रीकृष्ण किस तरह अपने वचन का पालन करते हैं।
श्रीकृष्ण से विदा लेकर नारद मुनि महादेव की प्रतिष्ठा में इन्द्र द्वारा स्वर्गलोक में आयोजित एक समारोह में गए। नारद मुनि अन्य देवों, गन्धर्वों, अप्सराओं और देवर्षियों के साथ मिलकर उमा-महेश्वर की आराधना करने लगे। जब समारोह का अन्त हुआ और सभी अतिथि अपने-अपने लोकों में प्रस्थान कर गए, तब नारद मुनि सिंहासन पर बैठे इन्द्र के पास गए। इन्द्र ने नारद मुनि को प्रणाम किया और अपने समीप एक स्थान पर बैठने का निमंत्रण दिया। हालाँकि नारद मुनि ने खड़े रहकर ही कहा, "देवराज! आज मैं श्रीकृष्ण का दूत बनकर आपके समक्ष आया हूँ। मैं द्वारकापुरी से आपके लिए उनका एक सन्देश लेकर यहाँ उपस्थित हुआ हूँ।"
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द्वारका में नारद मुनि
एक बार श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मणि के साथ रैवतक पर्वत पर गए। वहाँ देवी रुक्मणि ने एक समारोह का आयोजन किया और श्रीकृष्ण स्वयं अतिथि सत्कार में लग गए। वो अतिथि सत्कार में कोई भी कमी नहीं रखना चाहते थे। इस समारोह में श्रीकृष्ण की पटरानियाँ और उनकी दासियाँ भी शामिल हुईं।
जब श्रीकृष्ण, देवी रुक्मणि के साथ बैठे थे, तभी वहाँ नारद मुनि आए। श्रीकृष्ण और रुक्मणि ने नारद मुनि का अभिवादन किया और उन्हें अपने समीप स्थान पर बिठा दिया। आतिथ्य स्वीकार करने के पश्चात नारद मुनि ने श्रीकृष्ण को दैवीय पारिजात वृक्ष का पुष्प अर्पित किया। श्रीकृष्ण ने वह पुष्प नारद मुनि से लेकर अपने पास बैठी देवी रुक्मणि को दे दिया। देवी रुक्मणि ने पुष्प लेकर अपने बालों में सजा लिया।
यह देखकर नारद मुनि ने प्रशंसा करते हुए कहा, "देवी! यह पुष्प तो आपके लिए ही बना प्रतीत होता है। पारिजात वृक्ष का यह पुष्प अत्यन्त ही दैवीय है। यह एक वर्ष तक ऐसे ही खिला रहेगा और यह आपकी इच्छा के अनुरूप ही सुगन्ध प्रदान करेगा। यह पुष्प सौभाग्य लाता है और इसे धारण करने वाला निरोगी रहता है। एक वर्ष की समाप्ति के बाद यह अपने दैवीय वृक्ष पर वापस लौट जाएगा। यह पुष्प मरणशील प्राणियों की पहुँच से बाहर है और यह देवताओं तथा गन्धर्वों को अत्यन्त प्रिय है। देवी पार्वती प्रतिदिन इन पुष्पों को धारण करती हैं और देवी शची को भी यह इतने प्रिय हैं कि वे प्रतिदिन इनकी उपासना करती हैं।
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द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने कर्ण को कौरव सेना का सेनापति नियुक्त किया। कर्ण ने दुर्योधन से वादा किया कि वह अर्जुन का वध करेगा और युद्ध में दुर्योधन की जीत सुनिश्चित करेगा। उसने दुर्योधन को बताया कि कैसे वह हर पहलू में अर्जुन से बेहतर है सिवाय एक को छोड़कर। कर्ण ने कहा कि अर्जुन के पास सारथी के रूप में श्रीकृष्ण हैं। उसने प्रस्ताव दिया कि यदि दुर्योधन शल्य को उसका सारथी बनने के लिए मना सकता है, तो वह अर्जुन के बराबर हो जाएगा।
दुर्योधन ने शल्य के घोड़ा चलाने के कौशल की प्रशंसा की, साथ ही यह भी कहा कि वह वास्तव में इस पहलू में श्रीकृष्ण के बराबर है। और शल्य को कर्ण का सारथी बनाने के लिए आश्वस्त किया। कर्ण का रथ चलाते समय शल्य ने उसे एक कहानी सुनाई।
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कुरुक्षेत्र का युद्ध जीतने के बाद, युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने और उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करने का फ़ैसला किया। यज्ञ अविस्मर्णीय और अत्यन्त ही विशाल पैमाने पर हुआ जिसकी महिमा चारों ओर फैली हुई थी। यज्ञ वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार विद्वान ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में किया गया और दान भी उस पैमाने पर दिया गया जो दुनिया ने कभी नहीं देखा था।
यज्ञ के अन्त में एक नेवला वहाँ आया। उसके शरीर का आधा हिस्सा सुनहरा था, जबकि बाकी आधा भूरा था। नेवला वहाँ आते ही फर्श पर लुढ़कने लगा और फिर ज़ोर-ज़ोर से शोर करने लगा। उसने वहाँ उपस्थित सभी ब्राह्मणों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और साथ ही उसने मानवीय स्वर में बात की। नेवले ने कहा, "धर्मराज! यह सब दान ग़रीब ब्राह्मण द्वारा दान किए गए एक किलो सत्तू की तुलना में कुछ भी नहीं है।”
नेवले की बात सुनकर यज्ञ में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। वहाँ उपस्थित ब्राह्मणों ने नेवले को सम्बोधित करते हुए कहा, “यहाँ आकर इस तरह के साहसिक वक्तव्य देने वाले आप कौन होते हैं ? आप अवश्य ही एक दिव्य प्राणी दिखाई पड़ते हैं । हम सब आपकी बात सुन रहें है कृपया हमें बताएँ कि आप क्या कहना चाहते हैं।”
The Golden Mongoose
After winning the war of Kurukshetra, Yudhishthira became the king of Hastinapur and decided to perform Ashwamedha Yagya. The yagya was done at a scale unseen to everyone in their living memory and the praises of it spread all across. The Yagya was performed as per Vedic Rituals under the guidance of learned Brahmins and donations were given at a scale the world has not witnessed.
Towards the end of that yagya a mongoose visited the place. One half of his body was golden, while the remaining half was brown. The mongoose came there and started rolling on the floor then made a loud noise. When all the Brahmins present there had his attention he spoke in a human voice. The mongoose said, “Dharmaraj! All this charity is nothing compared to one kilo sattu donated by the poor Brahmin.”
Everyone present there was stunned at this proclamation. The Brahmins present there addressed the mongoose, “who are you to come here and make such bold statements? You seem like a divine being. Please tell us what you want to say. You have our attention.”
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एक बार नारदमुनि मनु के पुत्र प्रियव्रत से मिलने गए। प्रियव्रत ने नारद जैसे ज्ञानी ऋषि का स्वागत पूरे सम्मान और आतिथ्य के साथ किया जिसके पश्चात प्रियव्रत ने नारदमुनि से कई प्रश्न किए।
परन्तु ज्ञान की प्यास लगातार बढ़ती चली गई और प्रियव्रत ने पूछा, "मुनिवर ! जब भी कुछ घटित होने वाला होता है, देवों को पूर्वानुमान हो जाता है लेकिन मैं किसी ऐसी घटना के विषय में जानना चाहता हूँ
जो विचित्र और अद्भुत हो।" जिसके पश्चात नारदमुनि ने प्रसन्नता पूर्वक अपनी एक विचित्र और अद्भुत कथा सुनाई जिसमें वो माँ सावित्री को पहचान नहीं पाए थे।
नारदमुनि श्वेतद्वीप नामक क्षेत्र में थे। यह स्थान यहाँ की सुन्दर झील के कारण प्रसिद्ध था और नारदमुनि उसकी सुन्दरता देखने के लिए लालायित थे।
नारद जी उस स्त्री के पास जाकर बोले, "हे सुन्दरी! तुम कौन हो?" उस स्त्री ने नारदमुनि को दुःखी होकर देखा और अदृश्य हो गई। जहाँ वह स्त्री अदृश्य हुई वहाँ आभामयी लड़कियाँ दिखने लगीं।
How Narad Muni Got His Name?
Narad muni once visited Priyavrata (प्रियव्रत), the son of Manu. He welcomed the learned sage with due respect and hospitality. Priyavrata asked many questions to Narad Muni. Once his thirst was quenched, he asked “Munivar! When an event is about to happen, the divine beings somehow know the consequences but I want to know about an event that was strange yet wonderful.”
Narad Muni was happy to share his strange yet wonderful experience where once he could not recognise Maa Savitri.
Narad Muni was in the region known as Shvetadvipa (श्वेतद्वीप). This place had a lovely lake and Narad ji was eager to see its beauty. Upon arriving, he discovered that the lake was filled with blooming lotuses and an enticing lady stood there motionless. Narad Muni was in awe of her elegance and beauty. She was glowing and was radiant.
Narad ji approached her and asked “Who are you, O beautiful one?”
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रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि अर्थात प्रथम कवि भी कहते हैं और उनके द्वारा रचित श्रीरामकथा को प्रथम महाकाव्य। देखिए कैसे मिली वाल्मीकि जी को रामायण की रचना करने की प्रेरणा।
एक बार तपस्वी वाल्मीकि ऋषि की भेंट तीनों लोकों में भ्रमण करने वाले त्रिलोकज्ञाता देवर्षि नारद ने हुई। वाल्मीकि जी ने नारद मुनि से पूछा, “देवर्षि! इस समय विश्व में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी, धर्मानुसार आचरण करने वाले, प्राणिमात्र के हितैषी, विद्वान, समर्थ, धैर्यवान, क्रोध को वश में करने वाले, तेजस्वी, ईर्ष्या से शून्य और युद्ध में देवताओं को भी भयभीत करने वाले कौन हैं। हे महर्षि! क्या आप किसी ऐसे पुरुष को जानते हैं? कृपा कर मुझे उनके विषय में बतायें।“
वाल्मीकि जी की बात सुनकर त्रिकालदर्शी नारद मुनि प्रसन्न हुए और बोले, “हे मुनिवर! आपने जिन गुणों की बात कही है, वो सभी एक पुरुष में मिलन अत्यंत दुर्लभ है। किन्तु मैं आपको ऐसे एक गुणवान पुरुष के विषय में बताता हूँ। ध्यान से सुनिए।“
ऐसा कहकर नारद मुनि ने ऋषि वाल्मीकि को इक्ष्वाकु वंश में जन्मे श्रीरामचन्द्र का परिचय देते हुए हुए उनके जीवन की कथा संछिप्त में सुनाई। उन्होंने बताया किस प्रकार श्रीराम का जन्म अयोध्या में महाराज दशरथ के पुत्र के रूप में हुआ, कैसे उन्होंने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के यज्ञ में उनकी सहायता की, किस प्रकार उनका विवाह मिथिला नरेश महाराज जनक की पुत्री जानकी से हुआ और कैसे उनको अपनी सौतेली माता कैकेयी के कारण वनवास में जाना पड़ा। नारद मुनि ने वाल्मीकि जी को रावण द्वारा सीता जी के अपहरण, सीता जी की खोज में श्रीराम और लक्ष्मण जी की हनुमान जी से भेंट, उनकी सुग्रीव से मित्रता और सुग्रीव की सहायता से सीता जी की खोज, नल द्वारा समुद्र पर पुल बंधे जाने और उसके पश्चात लंका पर आक्रमण कर दसग्रीव रावण का वध करने की कथा सुनाई।
देवर्षि नारद से यह वृत्तान्त सुनने के पश्चात वाल्मीकि जी ने अपने शिष्य भारद्वाज के साथ उनका पूजन किया। उसके बाद नारद मुनि विदा लेकर अकाशमार्ग में चले गए।
नारद मुनि को विदा करने के बाद वाल्मीकि ऋषि अपने शिष्य के साथ गंगा नदी से थोड़ी दूर पर स्थित तमसा नदी के तट पर पहुँचे, और नदी के शीतल जल में स्नान कर वहाँ विचरण करने लगे। उसी समय वाल्मीकि जी ने वन में विहार करते हुए मधुर ध्वनि करने वाले क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा देखा। इतने में एक बहेलिये ने उनमें से नर पक्षी को मार दिया। जिसे देखकर मादा पक्षी करुण स्वर में विलाप करने लगी। इस प्रकार विलाप करती हुई क्रौंची को देखकर वाल्मीकि जी के मुख से अनायास ही यह शब्द निकले –
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ब्रह्मदेव के मानस पुत्र भृगु ऋषि के पुत्र च्यवन ऋषि की कथा अत्यंत रोचक है। उनकी गर्भवती माता का अपहरण करने वाला राक्षस उनके जन्म लेते ही उनके तेज से भस्म हो गया। सदा हरिभक्ति में लीन रहने वाले ऋषि च्यवन का विवाह एक राजकुमारी से हुआ और उनके पतिव्रत के कारण ऋषि को सुंदर काया प्राप्त हुई। देवताओं के चिकित्सक और सूर्यदेव के पुत्रों अश्विनी कुमारों को देवराज इन्द्र के विरोध के बाद भी देवत्व प्रदान करने वाले भी ऋषि च्यवन ही थे। सूत्रधार की इस प्रस्तुति में हम देखेंगे भार्गव च्यवन के जीवन की कथा।
ब्रह्मदेव के मानस पुत्र ब्रह्मर्षि भृगु अपनी गर्भवती पत्नी पुलोमा को अग्निदेव के संरक्षण में छोड़कर तपस्या करने गए हुए थे। उसी समय पुलोमन नामक एक राक्षस ने आश्रम से पुलोमा का अपहरण कर लिया। जब वह राक्षस पुलोमा को बल पूर्वक अपने साथ ले जा रहा था, उसी समय देवी पुलोमा का गर्भ से एक बालक का जन्म हुआ। वह बालक इतना तेजस्वी था कि उनके जन्म लेते ही, उनके तेज से राक्षस पुलोमन वहीं भस्म हो गया। इस प्रकार जन्म के समय माता के गर्भ से गिरने के कारण उस बालक का नाम च्यवन हुआ।
जन्म से ही तेजस्वी च्यवन ऋषि अपना सारा समय तप में व्यतीत करते थे। एक बार वर्षों तक तप में लीन होने के कारण उनके ऊपर चींटियों ने बाँबी बना ली थी। उस बाँबी ने ऋषि का सारा शरीर ढक दिया था।
एक दिन महाराज शर्याति अपने परिवार और सैन्यबल के साथ वन में विहार करने गए हुए थे। राजकुमारी सुकन्या अपनी सखियों के साथ च्यवन ऋषि के आश्रम में क्रीड़ा कर रही थीं, कि उनकी दृष्टि उस विशाल बाँबी पर पड़ी। पास जाकर देखने पर उनको उसके अंदर से दो चमकते हुए रत्न दिखाई दिए। राजकुमारी ने कौतूहलवश एक नुकीली सींक से उन रत्नों को कुरेदने का प्रयास किया। उनके ऐसा करने पर उनसे रक्त की धारा बहने लगी। वो रत्न ऋषि च्यवन के दो नेत्र थे, जिन्हें राजकुमारी ने अपने कौतूहल वश फोड़ दिया था। बाँबी से रक्त की धार बहते देखकर राजकुमारी और उनकी सखियाँ घबराकर वहाँ से भागकर अपने पिता के पास चली गयीं।
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