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अपने अहंकार के कारण अगस्त्य ऋषि के शाप का भागी बने नहुष ने वर्षों पृथ्वी पर एक अजगर के रूप में व्यतीत किए। नहुष की कथा के इस भाग में हम देखेंगे अंततः कैसे हुआ नहुष का उद्धार।
एक समय इंद्र रह चुके नहुष का सर्प बनकर धरा लोक पर पतन हुए हजारों वर्ष बीत चुके थे। महर्षि अगस्त्य के श्राप के कारण इतने वर्षों के उपरांत भी नहुष को सब कुछ पूरी तरह से याद था। वह जानते थे कि वह चन्द्रवंशी सम्राट आयु के पुत्र तथा अपने अहंकार का ही शिकार बने एक अभागे मनुष्य हैं जिन्होंने अपने अहंकार के वशीभूत होकर इन्द्र के पद को पाकर भी खो दिया। हर समय अपने द्वारा की गयी भूल को याद करते हुए सर्प रूपी नहुष पश्चाताप करते व अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा करते। हिमालय के तलहटी पर सरस्वती नदी के किनारे वन में एक विशाल सर्प के रूप में वास करने वाले नहुष जीव जंतु तथा अपने समीप आने वाले मनुष्यों का भक्षण कर अपनी क्षुधा का निवारण करते। ऐसे ही अपना जीवन व्यतीत करते नहुष अब द्वापर युग में पहुंच चुके थे।
वनवास काल के समय पांडव विचरण करते हुए इसी वन में आये जहाँ नहुष का वास था। एक बार अपने लिए खाना ढूंढ़ते ढूंढ़ते भीम गलती से नहुष के पास पहुंच जाते हैं। बहुत दिनों से भूखे नहुष ने अब भीम को देख कर उन्हें अपना भोजन बनाने का निश्चय किया। सर्प रूपी नहुष की विशाल काया से अचंभित भीम भी एक क्षण के लिए इतने बड़े सांप को देख कर तटस्थ हो गए थे। अब नहुष आगे बढे और अपनी जीभ लहलहाते हुए भीम की ओर अग्रसर हुए। हर समय अपने बल को लेकर अहंकार करने वाले भीम को आज कोई सर्प अपनी कुंडली में जकड़ रहा था और बहुत कोशिशें करने के बाद भी महाबली भीम असहाय थे।
भीम बस नहुष का भोजन बनने ही वाले थे कि वहां पर धर्मराज युधिष्ठिर का आगमन होता है। चूंकि बहुत देर से भीम वापस नहीं आये थे तो उन्हें खोजते खोजते युधिष्ठिर वहां पहुंच जाते हैं। अपने महा बलशाली भ्राता को एक सांप के चंगुल में इस तरह असहाय फंसा हुआ देख युधिष्ठिर समझ जाते हैं कि यह कोई साधारण सर्प नहीं हो सकता।
“हे सर्प, मैं युधिष्ठिर हूँ। तुमने जिसे अपना भोजन बनाने का निश्चय किया है,वह मेरा अनुज है। कृपा करके तुम उसे जाने दो, मैं तुम्हे इसके बदले कोई और उत्कृष्ट भोजन देने का वचन देता हूँ।” भीम को बचाने के लिए युधिष्ठिर ने सर्प से कहा।”
“हे कुंती पुत्र, मैं भली भांति जानता हूँ तुम कौन हो. और तुम्हारे अनुज को भी जानता हूँ। लेकिन मैं भूख की ज्वाला से विवश हूँ, भीम जैसे हट्टे कट्टे मनुष्य का भोजन कर मैं कई दिनों तक क्षुधा की ज्वाला से स्वयं की रक्षा कर सकता हूँ। तुम वापस लौट जाओ, मेरा भीम को खाना निश्चित हैं।” भूख से तिलमिलाते नहुष ने उत्तर दिया।
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पृथ्वीलोक पर वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य करने और शौर्य और वैभव अर्जित करने के बाद, ऐसा क्या हुआ कि महाराज नहुष को देवराज बनाना पड़ा। देखिये कैसा रहा देवराज नहुष का कार्यकाल?
युगों तक स्वर्गलोक पर शासन करने के बाद इंद्र को ऐश्वर्य का मोह लग चुका था और उनके मन में इस बात को लेकर के घमंड जाग गया। एक बार की बात है, इंद्रलोक में हमेशा की तरह ही उत्सव का माहौल था, देवी शची के साथ अपने आसन पर बैठे इंद्र नृत्य और गायन का आनंद ले रहे थे.देवता, ऋषि मुनि, मरुद गण, दिगपाल, गन्धर्व, नाग तथा अप्सराएं चारों ओर से देवराज इंद्र की वंदना करने में लगी हुई थी. पहले से ही अहंकार में चूर इंद्र इस जय जय कार से और फूले नहीं समा रहे थे। उस समय देवगुरु बृहस्पति जी का इंद्रलोक में आगमन हुआ, देवगुरु को आता हुआ देख कर भी न तो इंद्र ने उठ कर उनका अभिवादन किया और न ही बृहस्पति जी को आसन ग्रहण करने का न्योता दिया।
बृहस्पति जी को इस बात से अत्यंत बुरा लगा और उन्होंने उसी वक़्त इंद्रसभा परित्याग करने का निर्णय लिया। बृहस्पतिजी के जाने के बाद इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ और वह अपने गुरु से माफ़ी मांगने के लिए उनके निवास पर पहुंचे। लेकिन इंद्र ने वहां पहुंचने में देरी कर दी, देवराज के बर्ताव से रुष्ट होकर बृहस्पति जी कहीं जा चुके थे. अतएव दुखी मन से इंद्र वापस अपने महल लौट आये। असीम तपोबल के धनी बृहस्पति जी के इस तरह चले जाने से देवताओं की शक्ति लगभग आधी हो चुकी थी और हर बीतते समय के साथ वह और घटती जा रही थी। जैसे ही असुरों को इस बात का पता चला तो उन्होंने इस अवसर का फायदा लेते हुए स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया।
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वैवस्वत मनु की प्रथम संतान इला और चन्द्रपुत्र बुध के पुत्र पुरुरवा ने चन्द्रवंश की स्थापना की और वर्षों धर्मपूर्वक प्रजापालन किया। महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी के पुत्र आयु ने उनके बाद चन्द्रवंश की बागडोर सम्हाली। आयु अपने पिता के अनुरूप ही राजधर्म का पालन करने वाले प्रतापी व प्रजावत्सल राजा थे। इतना ऐश्वर्य और वैभव पाने के बाद भी आयु का मन हमेशा निसंतान होने के दुःख में डूबा रहता था। उनके पश्चात चन्द्रवंश के अस्तित्व का क्या होगा, इसी चिंता में वह सदैव उलझे रहते।
मन में एक उत्तराधिकारी की कामना लिए राजा आयु ने महारानी प्रभा के साथ भगवान दत्तात्रेय की शरण में जाने का निर्णय लिया। दोनों ने सौ वर्षों तक भगवान दत्तात्रेय के आश्रम में रहकर उनकी सेवा की। उनकी सेवा व भक्ति से संतुष्ट होकर त्रिदेवों के अवतार भगवान दत्तात्रेय ने उन्हें एक चक्रवर्ती पुत्र का वरदान दिया। इस प्रकार संतान प्राप्ति का वरदान पाकर महाराज आयु और महारानी प्रभा राजमहल में लौट आए और पुत्र जन्म की प्रतीक्षा करने लगे।
दूसरी ओर एक दिन देवी पार्वती व महादेव अलकापुरी के सुंदर नंदनवन में विचरण करते हुए इच्छापूर्ति करने वाले कल्पवृक्ष के समीप रुके। महादेव ने देवी पार्वती से कल्पवृक्ष से अपनी कोई भी इच्छा प्रकट करने को कहा। महादेव के सदा योग साधना में लीन होने का कारण कभी-कभी देवी पार्वती का मन उदास हो जाता था, इसलिए उन्होंने कल्पवृक्ष से अपने एकाकीपन को दूर करने के लिए एक पुत्री की इच्छा व्यक्त की। कल्पवृक्ष ने देवी की मनोकामना पूर्ण करते हुए उन्हे एक सुंदर कन्या प्रदान की। अपने अकेलेपन के शोक को हरने के लिए जन्मी इस कन्या का नाम देवी ने अशोकसुन्दरी रखा।
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गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥
देवी अहिल्या का नाम वैदिक भारत की असीम सुंदरियों में लिया जाता है। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव की मानस पुत्री अहिल्या को उनके पति गौतम महर्षि ने जड़ हो जाने का श्राप दे दिया था। अपने पति के श्राप के कारण वर्षों तक अहिल्या एक पत्थर की मूर्ति बनकर रहीं और अंततः त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने अपने स्पर्श से उनका उद्धार किया। क्यों दिया गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी को पत्थर बन जाने का श्राप? सुनिए रामायण के पन्नों से देवी अहिल्या की यह कथा। रामायण में यह कथा ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण जी को सुनाई थी।
ब्रह्मा की मानस पुत्री अहिल्या की सुंदरता असीमित थी। रूप और गुण में कोई भी स्त्री उनके समान नहीं थी। ब्रह्मदेव के आशीर्वाद से देवी अहिल्या का विवाह महर्षि गौतम के साथ हुआ और दोनों मिथिला नगरी के समीप आश्रम में रहने लगे।
एक बार देवराज इन्द्र गौतम आश्रम के पास से निकल रहे थे कि उनकी दृष्टि सुंदरी अहिल्या पर पड़ी। देवी अहिल्या की सुंदरता देखकर इन्द्र अपनी वासना पर नियंत्रण नहीं रख सके और उन्होंने किसी प्रकार अहिल्या को पाने के सोची।
एक दिन इन्द्र ने प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त के पहले ही एक मुर्गे की आवाज निकालकर गौतम ऋषि को भ्रमित कर दिया। महर्षि को लगा कि ब्रह्म-मुहूर्त हो गया है और वो नदी में स्नान के लिए निकल गए।
अहिल्या आश्रम में अकेली थी। देवराज इन्द्र, जो कि ऐसे ही अवसर की ताक में थे, गौतम ऋषि का वेश धारण कर आश्रम पहुँच गए। पहले तो देवी अहिल्या को लगा की उनके पति ही स्नान कर वापस लौट आए हैं और उन्होंने गौतम ऋषि के वेश में इन्द्र को अपने पास आने से नहीं रोका।
दोनों काम वासना से भरे हुए एक-दूसरे के समीप आना चाह रहे थे। ऐसा कामुक व्यवहार गौतम ऋषि से अपेक्षित नहीं था, इसीलिए अहिल्या को संदेह हुआ कि यह उनके पति के रूप में कोई और ही है; परंतु अपनी कामुकता के मद में अहिल्या ने इन्द्र को नहीं रोक और उनके साथ संभोग किया।
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स्यमन्तक मणि की कथा - जब भगवान् श्रीकृष्ण पर लगा चोरी का आरोप
सूत्रधार की इस कहानी में हम सुनेंगे स्यमन्तक मणि के बारे में। स्यमन्तक मणि एक ऐसी मणि थी जिसमें स्वयं भगवान् सूर्यदेव का तेज समाहित था। वो मणि जिस भी राज्य में रहती उस राज्य में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती। अब ऐसी मणि को कौन नहीं पाना चाहेगा। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के मन में उस मणि को पाने की इच्छा जागी। बचपन में गोपियों से माखन चुराकर खाने के कारण भगवान् श्रीकृष्ण का एक नाम माखनचोर भी है। लेकिन इस बार जो आरोप भगवान् कृष्ण पर लगा था वो हंसी-खेल में करी गयी चोरी का नहीं था। इस बार आरोप लगा था दुनिया की सबसे मूल्यवान वस्तु की चोरी का। आरोप था कि श्रीकृष्ण ने चोरी की थी स्यमन्तक मणि की। क्या था इस आरोप का सच? क्या सच में चुराई थी श्रीकृष्ण ने वो मूल्यवान मणि? अगर नहीं, तो फिर उन पर ऐसा आरोप क्यों लगा? इन्ही प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे हमें आज की इस कथा में। भगवान् श्रीकृष्ण की पत्नियों जांबवंती और सत्यभामा के तार भी इसी कथा से जुड़े हुए हैं । तो फिर बिना समय व्यर्थ किये सुनते हैं इस रोचक कथा को और जानते हैं इससे जुड़े हुए सारे प्रश्नों के उत्तर।
अंधकवंशी यादवों के राजा सत्राजित भगवान् सूर्यदेव के परम भक्त थे। सत्राजित ने वर्षों तक सूर्यदेव की आराधना की। एक दिन सुबह-सुबह सत्राजित रोज की ही तरह सूर्य वंदना कर रहे थे, कि भगवान् सूर्यदेव स्वयं उनके सामने प्रकट हो गए। सत्राजित ने जब भगवान् आदित्य को साक्षात् अपने सामने खड़ा हुआ देखा तो हाथ जोड़कर वंदना करते हुए कहा,"प्रभु! आप जिस तेज से इस सारे संसार को प्रकाशित करते हैं, मुझे वह तेज देने की कृपा करें।" सत्राजित के ऐसा कहने पर भगवान् भास्कर ने उन्हें दिव्य स्यमन्तक मणि दी। यह मणि सूर्य के तेज से प्रकाशित थी और उसको अपने गले में पहनकर जब सत्राजित ने अपने नगर में प्रवेश किया तो सभी को लगा स्वयं सूर्यदेव पधारे हैं।
सत्राजित ने वह मणि अपने प्रिय छोटे भाई प्रसेनजित को दे दी। वह मणि अंधकवंशी यादवों के घर में समृद्धि लाती रही। वह मणि जहाँ भी रहती उसके आस-पास के क्षेत्रों में समय पर वर्षा होती और लोग सभी रोगों से मुक्त रहते। जब भगवान् श्रीकृष्ण को उस मणि के बारे में पता चला तो उन्होंने प्रसेन से मणि पाने की इच्छा व्यक्त की, परन्तु प्रसेन ने उनको मणि देने से मना कर दिया।
एक दिन प्रसेन उस मणि को अपने गले में पहनकर शिकार खेलने के लिए गए। वहाँ प्रसेन एक शेर के हाथों मारे गए और वह शेर उनकी मणि अपने मुँह में दबाकर भाग गया। महाबली ऋक्षराज जांबवान ने जब शेर को अपने मुँह में मणि दबाये भागते हुए देखा तो उन्होंने शेर का वध कर, मणि लेकर अपनी गुफा में चले गए। अगर आप लोग सोच रहे हैं कि क्या ये जांबवान वही हैं? तो आप सही सोच रहे हैं। ये वही ऋक्षराज जांबवान हैं जिन्होंने सीतामाता की खोज में भगवान् राम की मदद की थी।
इधर जब कई दिनों तक प्रसेन का कोई पता नहीं चला तो अंधकवंश के लोग संदेह करने लगे कि हो-न-हो इसमें श्रीकृष्ण का ही हाथ है। उन्होंने पहले भी प्रसेन से मणि माँगी थी और प्रसेन ने उन्हें मणि नहीं दी; इसलिए उन्होंने मणि चुराने के उद्देश्य से प्रसेन को या तो बंदी बना लिया है, या उसका वध कर दिया है। सत्राजित ने द्वारका आकर भरी सभा में सबके सामने श्रीकृष्ण पर आरोप लगाते हुए कहा,"माखन चुराते-चुराते रत्नों की चोरी कबसे करने लगे, यशोदानन्दन? मेरे प्रिय भाई को तुमने जहाँ भी छुपाकर रखा है, उसे मणि समेत वापस कर दो।" भगवान् श्रीकृष्ण ने मणि नहीं चुराई थी, फिर भी उन पर मणि चुराने का आरोप लग रहा था और लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। इस कलंक से मुक्त होने के लिए श्रीकृष्ण ने मणि को ढूंढने का निश्चय किया और जंगल में चले गए। जंगल में प्रसेन के घोड़े के पैरों के निशानों का पीछा करते हुए श्रीकृष्ण को प्रसेन की और उसके घोड़े की लाशें मिली, लेकिन वहाँ मणि का कोई निशान नहीं था। थोड़ी दूर पर ऋक्षराज के द्वारा मारा गया सिंह भी पड़ा मिला। ऋक्ष के पैरों के निशान का पीछा करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण जांबवान की गुफा तक पहुँच गए।
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श्रीगणेश पुराण के अनुसार गणेश जी के जन्म और उनके हाथी के सर की कथा कुछ इस प्रकार है।
देवी पार्वती की दो सखियाँ थीं – जया और विजया। दोनों अत्यंत सदाचारिणी और विवेकमयी थीं, और देवी पार्वती उनका बहुत आदर करती थीं। एक दिन उन सखियों ने पार्वती जी से कहा, “सखी! शिवजी के इतने सारे गण हैं और आपका एक भी नहीं। आपका कम से कम एक गण तो होना चाहिये।“
उमा ने आश्चर्यपूर्वक कहा, “क्या कह रही हो सखियों? हमारे पास करोड़ों गण हैं, जो सदा हमारी आज्ञा का पालन करने के लिये तत्पर रहते हैं। फिर किसी अन्य गण की क्या आवश्यकता है?”
सखियों ने कहा, “सभी गण महादेव के हैं। उनकी ही आज्ञा उनके लिए प्रमुख है। नंदी, भृंगी आदि सभी गण आपकी आज्ञा मानते तो हैं पर आशुतोष भगवान की आज्ञा ही उनके लिये सर्वोपरि है। यदि आप कोई आदेश दें और शिवजी उसकी उपेक्षा करें तो कोई भी गण आपका आदेश नहीं मानेगा। आप पूछेंगी को अवश्य ही कोई बहाना बना दिया जाएगा।“
देवी पार्वती ने अपनी सखियों भी बात सुनी पर समय के साथ भूल गयीं।
एक दिन पार्वती जी स्नान करने जा रही थीं, और उन्होंने नंदी को आदेश दिया कि वो द्वार पर खड़े होकर किसी को भी अंदर न आने दें।
नंदी द्वार पर खड़े हो गए। उसी समय शंकर जी वहाँ आ पधारे और अंदर जाने लगे। नदीश्वर ने उनको रोकते हुए कहा, “स्वामी! माता अभी स्नान कर रही हैं, इसलिए आप यहीं ठहरने की कृपा करें।“
शिवजी नंदी की बात को अनसुना करके अंदर चले गए।
भगवान आशुतोष को इस प्रकार अंदर आया देखकर देवी पार्वती को अपनी सखियों की बात याद आ गई। उनको समझ में आ गया की सभी गण शिवजी के सेवक हैं और उनकी आज्ञा ही उनके लिए सर्वोपरि है। नंदी ने आज मेरी इच्छा की उपेक्षा की है। यदि मेरा कोई गण होता तो उसके लिए मेरी इच्छा सर्वोपरि होती।
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श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्नि देव की सहायता से खाण्डवप्रस्थ के जंगलों में लगी आग को बुझा लिया और उस आग से अपनी जान बचाए जाने के कारण मायासुर राक्षस ने पाण्डवों को इन्द्रप्रस्थ में अपनी राजधानी और एक शानदार महल बनाने में मदद की। मयासुर रावण का ससुर और एक बहुत ही कुशल वास्तुकार था।
सभी देवता, गन्धर्व, राजा और ऋषि इस शानदार महल को देखने के लिए आए और युधिष्ठिर ने उनका सत्कार किया। देवर्षि नारद जी की उपस्थिति में युधिष्ठिर के मन में राजसूय यज्ञ करने का विचार आया।
युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और मंत्रियों से इस विषय में बात की और सभी मान गए लेकिन युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से इस बात की सहमति चाहते थे। जैसे ही श्रीकृष्ण आए युधिष्ठिर ने उन्हें यज्ञ के विषय में बताया। तब श्रीकृष्ण बोले, "तुम्हारे भीतर इस यज्ञ को करने की सभी योग्यताएँ हैं लेकिन इससे पहले तुम्हें मगध के राजा जरासन्ध को ख़त्म करना होगा। वह पूरी पृथ्वी का शासक बनने हेतु महादेव को प्रसन्न करने के लिए एक यज्ञ करने जा रहा है। उसने बलि के लिए सैकड़ों राजाओं को बन्दी बनाकर रखा है। उसके जीवित रहते हुए तुम ये यज्ञ नहीं कर सकते क्योंकि वो कोई न कोई व्यवधान अवश्य उत्पन्न करेगा। बुराई के रास्ते पर चलने वाले जरासन्ध का अन्त होना अब आवश्यक हो चुका है।"
इसके बाद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और बाक़ी पाण्डवों से कहा, "हम उसे युद्ध के लिए नहीं ललकार सकते क्योंकि उसके पास विशाल सेना है। हम उसके पास ब्राह्मण का वेश धारण करके जाएँगे क्योंकि वो अभी भी ब्राह्मणों का सम्मान करता है। इस उद्देश्य के लिए अर्जुन और भीम तुम दोनों मेरे साथ आओगे।
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श्री कृष्ण के हाथों कंस की हत्या का बदला लेने के लिए क्रोध में अंधे होकर जरासन्ध ने मथुरा पर हमला करने का निर्णय लिया।
जरासन्ध ने अपनी सेना के साथ मथुरा को घेर लिया और श्रीकृष्ण तथा बलराम को युद्ध के लिए ललकारा। मथुरा की जनता ने श्रीकृष्ण और बलराम का पराक्रम पहले भी देखा था इसलिए वो सभी निश्चिन्त थे।
श्रीकृष्ण और बलराम ने अपनी यदु सेना को जरासन्ध की सेना के समक्ष लाकर खड़ा कर दिया। इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद भी मगध की सेना के पास श्रीकृष्ण और बलराम जैसा युद्ध कौशल नहीं था।
जैसे ही जरासन्ध और बलराम का आमना-सामना हुआ तो जरासन्ध को बलराम एक ऐसे नौजवान लड़के की तरह लगे जिनका उसके सामने कोई मुक़ाबला नहीं था। इसीकारण जरासन्ध ने बलराम को द्वन्द्व युद्ध की चुनौती दी। बलराम को जरासन्ध से द्वन्द्व युद्ध के लिए उतावला देखकर श्रीकृष्ण के चेहरे पर मुस्कान आ गई। दोनों योद्धा लड़ने लगे और कुछ ही समय में बलराम ने जरासन्ध को परास्त कर दिया।
जैसे ही बलराम, जरासन्ध को ज़मीन पर पटककर अपनी गदा से उसपर हमला करने वाले थे, तभी उन्होंने एक आवाज़ सुनी, "रुकिए दाऊ!"
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जरासन्ध मगध का शासक था और श्रीकृष्ण के जीवन से उसका गहरा सम्बन्ध था। इस कहानी में हम जरासन्ध के बारे में जानेंगे और पता लगाएँगे कि उसका श्रीकृष्ण से क्या रिश्ता था।
मगध पर जब राजा बृहद्रथ का राज्य था तब उसकी प्रजा बहुत खुश थी। बृहद्रथ का विवाह काशी की जुड़वा राजकुमारियों से हुआ और वो एक आनंदमय गृहस्थ जीवन में बँध गया। जैसे-जैसे समय बीतता गया राजा के मन में पुत्र प्राप्ति की कामना तीव्र होती गई।
अन्ततः बृहद्रथ ने निर्णय लेकर अपनी पत्नियों को इस बारे में बताने के लिए बुलाया। वो बोला, "प्रियाओं! मेरी बात ध्यान से सुनो। हमारी सन्तान की कामना पूर्ण करने के लिए मैंने वन-गमन करने का निर्णय लिया है।" बृहद्रथ की बात सुनकर रानियों को काफ़ी धक्का लगा किन्तु उन्होंने बृहद्रथ की बात मान ली।
राजा ने पैदल ही अपना राज्य छोड़ दिया और वन-गमन का पथ अपनाकर ऋषि चण्डकौशिक की शरण में गया। राजा ने सच्चे मन से ऋषि की सेवा प्रारम्भ की और अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाए। ऋषि इस समर्पण से काफी प्रसन्न हुए और राजा से वर माँगने को कहा, "हे राजन! मैं तुम्हारे समर्पण से बहुत प्रसन्न हुआ। तुमने एक राजा होकर भी निम्नतम कार्यों को भी पूरी लगन के साथ किया। मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूँ। बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है?"
राजा बृहद्रथ ने ऋषि चण्डकौशिक की चरण वन्दना करते हुए कहा, "हे ऋषिवर! मैं एक सन्तानहीन राजा हूँ। मुझे सिर्फ़ एक सन्तान की चाह है, जो मेरे राज्य का वारिस बने। मैं बस इतनी ही इच्छा रखता हूँ। मैं एक पिता बनना चाहता हूँ। हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझे सन्तान प्राप्ति का वरदान दीजिए।"
ऋषि ने राजा पर दयाभाव दिखाते हुए उसे एक फल दिया और कहा कि ये फल अपनी किसी भी एक पत्नी को दे देना। राजा उस दैवीय फल को लेकर वन से वापस अपने महल आ गया। राजा अपनी दोनों पत्नियों को खुश देखना चाहता था इसलिए उसने उस फल को दो भागों में बराबर बाँटकर अपनी पत्नियों को दे दिया। जिसके बाद उन दोनों के यहाँ आधी-आधी मृत सन्तानों ने जन्म लिया।
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कावड़ यात्रा
वेद पुराणों में शिवजी का अन्य नाम आशुतोष बताया गया है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार महादेव को यह नाम इसीलिए मिला क्योंकि वह भक्तों और साधकों की निष्काम तथा कठोर साधना से तुरन्त प्रसन्न हो जाया करते हैं। इसी कारण के चलते प्राचीन काल से देवता, गन्धर्व, असुर तथा साधारण मानव आदि भोले की आराधना कर अनेक शक्तिशाली एवं असाधारण वर प्राप्त किया करते थे। आजके समय में शैव उपासना की इस अनन्य परम्परा का एक रूप प्रसिद्ध "कावड़ यात्रा" के रूप में देखने को मिलता है। जहाँ लाखों श्रद्धालु कठोर नियमों का पालन करते हुए सैकड़ों किलोमीटर नंगे पैर चलकर भगवान भोलेनाथ को जल अर्पित करते हैं।
हिन्दू धर्म में श्रावण के महीने को अत्यन्त पवित्र माना जाता है। इसी श्रावण में कावड़ यात्रा निकलती है। मुख्यतः उत्तर और पूर्वी भारत में कावड़ यात्रा विशेष रूप से मनाई जाती है, जिसमें असंख्य शिवभक्त गेरुआ वस्त्र का परिधान किए हाथों में एक डंडी पर दो घड़े लटकाए हुए शिवजी का जलाभिषेक करने निकलते हैं। इन दो घड़ों में नदी का पवित्र जल होता है जिसे वे "कावड़" नामक उस डंडी पर लटकाए अपने कंधों पर उठाए शिवालय पहुँचते हैं। इन भक्तों को कावड़िया कहा जाता है जो कि सकड़ों किलोमीटर का मार्ग पैदल की पार करते हुए भोले की शरण में पहुँचते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कावड़ यात्रा की शुरुआत शिवजी को शीतल जल से अभिषेक करने की प्रथा से शुरू हुई है। विष्णु पुराण एवं भागवत पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के उपरान्त जब "हलाहल" विष की उत्पति हुई तो समग्र सृष्टि इसके प्रभाव में आकर नष्ट होने वाली थी। सृष्टि को इस विष के प्रलय से बचाने हेतु शिवजी ने हलाहल का पान कर लिया जिसके दुष्प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया। इसी वजह से शिवजी का एक और नाम नीलकंठ भी पड़ा। इसके पश्चात् शिवजी को विष की ज्वाला से शान्ति प्रदान करने हेतु माता पार्वती एवं अन्य देवताओं ने शीतल जल से उनका अभिषेक किया। तभी से भोलेनाथ के जलाभिषेक की परम्परा प्रचलन में आई। यूं तो पूरे वर्ष भक्त शिवालयों में जाकर शिवजी का अभिषेक करते हैं, लेकिन मान्यताओं के अनुसार कावड़ यात्रा के समय ऐसा करने से श्रद्धालुओं को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
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