इतिहास पुराण की कथाएं Itihas Puran Ki Kathaye

इतिहास पुराण की कथाएं Itihas Puran Ki Kathaye

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इतिहास पुराण की कथाएं Itihas Puran Ki Kathaye episodes

  • कार्तिकेय का जन्म

    सतयुग के युग में, तारक (तारक) नामक एक असुर का वास था, जिसने 100 वर्षों तक अत्यधिक तप किया था। हर 100 साल में वह अपनी तपस्या को और कठिन बना देता था। पहले 100 वर्षों तक वह पानी पर जीवित रहा और बाद में, वह केवल हवा में ही जीवित रहा।

    अत्यधिक तपस्या से प्रभावित होकर, भगवान ब्रह्मा तारकासुर (तारकासुर) को आशीर्वाद देने के लिए उनके सामने प्रकट हुए। "मैं तुम्हारी भक्ति और तप से प्रसन्न हूँ, तुम क्या वरदान चाहते हो? मुझे बताओ और तुम्हें दिया जाएगा ”निर्माता ने कहा।

     

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    11 min
  • महाराज परीक्षित और कलियुग

    पांडवों के महाप्रयाण के बाद अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित हस्तिनापुर के महाराज बने। स्वयं पाण्डव भाइयों के द्वारा शिक्षा प्राप्त परीक्षित सर्वगुण संपन्न महाप्रतापी राजा थे। परीक्षित गुरु कृपाचार्य और युयुत्सु के संरक्षण में भली भांति राजधर्म का पालन करते थे। परीक्षित का विवाह राजा उत्तर की पुत्री इरावती से हुआ और उनको जनमेजय, भीमसेन, श्रुतसेन और उग्रसेन नाम के चार पुत्र हुए। 

    कुलगुरु कृपाचार्य के सुझाव पर परीक्षित ने गंगा नदी के तट पर तीन अश्वमेध यज्ञ किए और समस्त विश्व में अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए दिग्विजय पर निकल गए। अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान एक जगह महाराज परीक्षित की भेंट एक गाय, एक बैल और एक ग्वाले से हुई। गाय बहुत ही दुर्बल थी और बैल केवल एक ही पैर पर खड़ा था तथा ग्वाला दोनों को मार रहा था। 

     

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    12 min
  • उर्वशी और पुरुरवा की प्रेमकथा

    इला व बुध से जो पुत्र हुआ उनका नाम पुरुरवा था। पुरुरवा ने अपने पितामह चंद्र के नाम पर चंद्र वंश की स्थापना की और इला के बाद  वह राजा बने। पुरुरवा में देव-सुलभ गुणों का समाहार था और वह प्रचंड बलशाली और प्रतापी राजा थे। पुरुरवा ने एक सौ अश्वमेध यज्ञ करवाकर स्वयं को देवों के समान यशोबल धारी बना दिया था। तीनों लोकों में पुरुरवा  की वीरता की गाथाएं कही जाने लगीं। इससे प्रभावित हो कर देव-राज इंद्र ने भी पुरुरवा  से मित्रता स्थापित की और असुरों के विरुद्ध युद्ध में कई-बार उनका समर्थन भी प्राप्त  किया।

    इंद्रलोक की सबसे सुंदरी अप्सरा उर्वशी के कानों में भी पुरुरवा  के वीरता और यश की गाथाएं पड़ी। किसी मानव का इस तरह देव-सुलभ बलशाली होना साधारण बात नहीं थी। इसीलिए उर्वशी का मन भी एक बार पुरुरवा  से मिलने को हुआ। बहरहाल उर्वशी को यह अवसर जल्द ही मिलने वाला था।

    अपनी सखी चित्रलेखा के साथ उर्वशी एक बार धरा लोक की सुंदरता  का आनंद लेने आई हुई थी, तभी उनका सामना केशी नामक एक दैत्य से हो जाता है। केशी के हृदय में उर्वशी जैसी अपूर्व सुंदरी स्त्री के लिए काम भावना जाग्रत होती है और वह बल पूर्वक उर्वशी का अपहरण करने की चेष्टा करने लगता है।

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    13 min
  • ईला और बुध

    वैवस्वत मनु और महारानी श्रद्धा दीर्घ काल तक निःसंतान रहे। पुत्रहीनता के कष्ट को कम करने हेतु महर्षि वशिष्ठ के परामर्श अनुसार, मनु और श्रद्धा ने भगवान मित्र और वरुण की उपासना करने का निर्णय लिया। वशिष्ठ ऋषि के संरक्षण में ही मनु ने पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन करवाया। भगवान मित्र-वरुण से मनु ने अपने वंश को आगे चलाने हेतु एक पुत्र की कामना की थी, परंतु विधि का विधान कुछ और ही था।

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    11 min
  • सरस्वती नदी के नन्दा नाम की कथा

    प्राचीन काल में पृथ्वी लोक में प्रभंजन नामक एक प्रसिद्ध महाबली राजा हुआ करते थे। एक बार वो जंगल में शिकार के उद्देश्य से गए हुए थे। जंगल में घूमते हुए अचानक उनकी दृष्टि झाड़ी के पीछे एक हिरणी पर पड़ी। हिरणी को देखते ही राजा ने उस पर बाण चला दिया। 

    बाण के प्रहार से आहत हुई हिरणी ने जब हाथ में धनुष-बाण लिए राजा प्रभंजन को देखा तो बोली, “अरे मूढ़! यह तूने क्या किया? मैं यहाँ सर नीचे किए हुए, निर्भयता से अपने बालक को दूध पिला रही थी और ऐसी अवस्था में इस वन में आकर तूने मुझ निरपराध हिरणी को अपने बाणों का निशाना बनाया है। तूने यह पाप कर्म किया है। मैं तुझे श्राप देती हूँ की तू इस वन में कच्चा मांस खाने वाले जीव के रूप में जीवन व्यतीत करे।“

     

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    12 min
  • भगवान जगन्नाथ रथयात्रा

    विश्व में कई धर्म, पन्थ तथा सम्प्रदायों के मानने वाले वास करते हैं। इन सबके द्वारा अपनी अपनी परम्पराएँ , पूजा पद्धति और तरह तरह के अनोखे त्योहार मनाए जाते हैं। इसी तर्ज पर भारत में वैष्णव धर्म के मानने वालों के द्वारा भगवान श्रीहरि विष्णु और उनके दशावतारों की उपासना किए जाने की विधि प्रचलित है। दशावतारों में भगवान श्रीकृष्ण का आधुनिक भारतीय समाज एवं हिन्दू दर्शन पर गहरा प्रभाव दिखाई पड़ता है। जिसके चलते केवल वैष्णव नहीं अपितु प्रत्येक पन्थ के सनातनियों में कृष्ण उपासना की प्रथा प्रचलित है। इसी सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण के कलियुग के अवतार पुरुषोत्तम जगन्नाथ की गरिमा सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रतिष्ठित है। चारों धामों में एक माने जाने वाले श्री जगन्नाथ के निवासस्थल नीलान्चल पूरी में हर साल मनाई जाने वाली रथयात्रा हिन्दू संकृति के महान् तम पर्वों में से एक है , जो कि केवल भारत ही नही बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

    प्रतिवर्ष आषाढ़ शुल्क द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा तथा सुदर्शन को तीन विशाल सुसज्जित रथों पर विराजमान कर श्रीमन्दिर से गुंडीचा मन्दिर की ओर लिया जाता है। इस भक्तिमय परिवेश में सराबोर होने हेतु लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। बिना किसी जातपात, धर्म, मत आदि का प्रभेद किए भगवान अपनी इस अनूठी लीला में समग्र संसार हो दर्शन देने हेतु स्वयं मन्दिर से बाहर निकलते हैं। मान्यताओं के अनुसार रथ पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण की इस अनोखे रूप का दर्शन करने वाले को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है। साथ ही साथ ऐसा माना जाता है कि पुराणों में वर्णित सभी आठ चिरंजीवी रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने हेतु छद्म वेश धारण कर पूरी पधारते हैं!  

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    14 min
  • श्रीजगन्नाथ धाम की प्राण-प्रतिष्ठा - Part 4

    विग्रहों और मंदिर का निर्माण संपन्न हो चुका था। अब केवल उनकी प्रतिष्ठा करनी बाकी थी। लेकिन इसमें भी एक अड़चन थी, जिस भगवान जगन्नाथ की मूर्तियाँ बनाना भी किसी नश्वर के लिए असंभब था, उनकी प्रतिष्ठा भला कोई साधारण ब्राह्मण कैसे कर सकता था। इसके लिए तो शायद देवर्षि नारद अथवा देवगुरु बृहस्पति जैसे दिव्य ऋषियों की आवश्यकता थी। 

    राजा इन्द्रद्युम्न अब तपस्या में बैठ गए। थोड़ी देर बाद किसी के बुलाने पर राजा का ध्यान खुलता है और वह अपने सामने देवर्षि नारद को खड़ा पाते हैं। नारद को प्रणाम कर वह उनसे मंदिर तथा विग्रहों की स्थापना के बारे में मार्गदर्शन मांगते हैं।

    "नारायण, नारायण। यह बात आपकी सत्य है राजन। जिस स्वरूप को बनाने हेतु देवशिल्पी विश्वकर्मा को आना पड़ा, उस स्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा केवल वही कर सकता है जो तीनोलोकों में सवश्रेष्ठ वेदज्ञ हो।" देवर्षि नारद ने राजा से कहा।

     

    "क्षमा करें देवर्षि, परंतु आप और देवगुरु बृहस्पति के अतिरिक्त और ऐसा कौन है जो इतना उत्कृष्ट ब्राह्मण व पारंगत विद्वान हो?" राजा ने पुनः पूछा।

    "मैं उनकी बात कर रहा हूँ राजन, जिनके श्रीमुख से समस्त वेदों की उत्पत्ति हुई है। केवल और केवल मेरे पिता, ब्रह्मदेव के हाथों ही भगवान श्रीहरि का यह कार्य संपादित हो सकता है।"

    "अहोभाग्य मेरे, देवर्षि। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अभी आपके साथ ब्रह्मलोक जाकर प्रजापिता को निमंत्रण देना चाहता हूँ, भगवन।" इन्द्रद्युम्न ने प्रसन्न होकर कहा। 

    "अवश्य राजन।" देवर्षि उन्हें अपने साथ स्वदेह ब्रह्मलोक ले जाने के लिए तैयार हो गए।

    इन्द्रद्युम्न ने विद्यापति, विश्वावसु तथा रानी गुंडिचा से विदा ली और जल्द लौटने का वादा कर देवर्षि के साथ ब्रह्मलोक की यात्रा पर निकल गए। जब वह ब्रह्मलोक पहुंचे तो ब्रह्मा जी ध्यानमग्न थे। राजा इंद्रद्युम्न ने उनका ध्यान खत्म होने तक प्रतीक्षा करना ही उचित समझा।

    कुछ समय बाद जब ब्रह्माजी तप से जागे तो राजा इंद्रद्युम्न ने उन्हें प्रणाम कर मंदिर की प्रतिष्ठा करने हेतु निमंत्रण दिया जिसे प्रजापिता ने सहर्ष स्वीकार किया। ब्रह्मा की स्वीकृति देते ही राजा का मन अब अत्यंत प्रसन्न हो उठा। वह जल्द से जल्द रानी गुंडिचा के साथ ब्रह्माजी के आने की खुशखबरी बांटने के लिए व्याकुल थे। अतएव अब वह  ब्रह्मलोक से पृथ्वीलोक पर  वापस आ गये।

    वापस नीलांचल में पहुंच कर राजा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। अब शंख क्षेत्र नामक कोई जगह समुद्र तट पर नहीं थी। राजा का महल, वह भव्य मंदिर तथा राजा की बसाई हुई पूरी की पूरी नगरी का कोई नामोनिशान नहीं था। चारों तरफ बस मीलों तक रेत ही रेत थी जैसा कि किसी भी सागर तट पर होता है। राजा को लगा कि वह अवश्य ही सपना देख रहे हैं, क्योंकि ऐसा भला कैसे हो सकता है कि कुछ ही घंटों पहले उन्होंने यहीं रानी गुंडिचा से बात की थी, और अब वहां कुछ भी नहीं था। रानी, विद्यापति, विश्वावसु, उनका मंत्री परिषद, प्रजा, सारे कारीगर यहां तक के हाथी घोड़े भी वहां से अदृश्य हो चुके थे।  

    राजा बहुत देर तक रानी गुंडिचा और विद्यापति का नाम पुकार पुकार कर उन्हें बुलाते रहे। अंत में दुख से व्याकुल, चिंतित होकर वहीं समुद्र किनारे रेत पर बैठ गए। 

    "अब फिर कौन सी परीक्षा ले रहे हो प्रभु, अब फिर कौन सी..." यही एक वाक्य वह बार बार जप रहे थे।

    शाम हुई तो उन्हें कुछ लोग नज़र आये। इंद्रद्युम्न उनके पास जाकर उस जगह के बारे में पूछने लगे। सामने वाले आदमी ने जो कहा वह सुनकर राजा के पैरों तले की भूमि खिसक गई। उस आदमी ने कहा कि, "लगता है आप विदेशी हो मान्यवर, यह जगह उत्कल देश है और यहां पिछले चौदह पीढियों से प्रवल प्रतापी राजा गाल माधव का परिवार साशन करता आ रहा है।" 

    "चौदह पीढ़ियों से? यह असंभव है। मैंने तो सुना था कि यहाँ राजा इंद्रद्युम्न का शासन है?" राजा ने कहा। 

    "मैंने किसी इन्द्रद्युम्न का नाम कभी नहीं सुना । क्षमा कीजियेगा, लोग गलत पते पर आते हैं, मगर आप तो शायद गलत राज्य में ही आ गये हैं मान्यवर।" यह कहकर वह आदमी हंसने लगा।

    राजा का दुःख अब किसी अनजान आशंका में बदल रहा था। लेकिन वह उस आदमी को पागल समझ कर आगे चलने लगे। कुछ दूर चलने के बाद उन्हें अखिरकर एक मंदिर की ध्वजा दिखाई दी।

    "अवश्य ही मेरा मंदिर है। निश्चित ही विद्यापति तथा बाकी के लोग यहां मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे!" यह कहकर इन्द्रद्युम्न भागते हुए मंदिर के सामने पहुंचते हैं। यद्यपि उन्हीं के द्वारा भगवान जगन्नाथ के लिए बनाया गया यह वही मंदिर था, लेकिन उसके अतिरिक्त कोई भी वस्तु ऐसी नहीं थी जिसे वह पहचानते हों।" सत्य जानने के लिये व्याकुल राजा मंदिर के बाहर बैठे एक ब्राह्मण के पास पहुंचे। अब फिर से अचंभित होने की बारी इंद्रद्युम्न की ही थी।

    ब्राह्मण ने कहा, " यह राजा गाल माधव के कुल देवता भगवान विष्णु का मंदिर हैं। बहुत सालों पहले राजा के पूर्वजों को यह विशाल मंदिर पूरी तरह मिट्टी और रेत में दबा हुआ मिला था।"

    राजा को आश्चर्यचकित देख ब्राह्मण ने आगे कहा,

    “हे विदेशी, तुम्हारी जिज्ञासा समझ सकता हूँ मैं। भला इतना विशाल मंदिर मिट्टी में कैसे दबा हुआ था यह जानने की उत्सुकता है ना तुम्हारे भीतर?"

    राजा अपनी सुध पूरी तरह से खो चुके थे और केवल सर हिला कर ब्राह्मण को हाँ में उत्तर दिया।

    "तो सुनो, मंदिर को लेकर के एक लोककथा प्रचलित है। मैंने अपने पितामह से सुना था, उन्होंने अपने पितामह से। लगभग एक हज़ार वर्ष पहले, यहां इन्द्रद्युम्न नामक एक राजा का साशन था। हमारे महाराज की तरह ही वह भी प्रचंड विष्णु भक्त था। उसी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। परंतु प्रतिष्ठा करने से पूर्व, एक दिन शायद ब्रह्मा जी  को निमंत्रण देने ब्रह्मलोक चला गया। बस उस दिन के बाद से उसे किसी ने नही देखा।" 

    इन्द्रद्युम्न को यह सब सुनकर अपने कानों पर विश्वास नही हो रहा था।

    "उसकी प्रजा, उसकी रानी, मंत्री परिषद सब उसकी प्रतीक्षा करते करते मृत्यु को प्राप्त हो गए, परंतु वह नहीं आया। ऐसे ही कई पीढ़ियों के बाद धीरे धीरे उसका बसाया हुआ राज्य काल की गर्भ में लीन हो गया। उसका बनाया यह मंदिर भी पूरी तरह रेत में गड़ा हुआ था, एक दिन राजा के घोड़े की नाल किसी वस्तु से टकराई और राजा भूमि पर गिर पड़े। मिट्टी हटाई तो पता चला कि किसी मंदिर का शिखर है। बहुत दिन तक खुदाई करने के पश्चात तब जाकर कहीं इस भव्य मंदिर का ढांचा सामने आया। चूँकि मंदिर खाली था, तो राजा ने इसमें अपने आराध्य भगवान विष्णु की स्थापना की। बस तभी से यहाँ बैष्णव पूजन की परंपरा का प्रारंभ हुआ है।" ब्राह्मण यह कहानी सुनाकर राजा इन्द्रद्युम्न को देख रहा था जो कि किसी बच्चे की तरह रोने लग गए थे।

    "अरे क्या हुआ मान्यवर? आप उसी इंद्रद्युम्न के वंशज हैं क्या?" ब्राह्मण ने रोते हुए राजा से पूछा।

    "नहीं ब्राह्मण श्रेष्ठ, मैं कोई वंशज नहीं बल्कि स्वयं वही अभागा इन्द्रद्युम्न हूँ।"  

    यह उत्तर सुनकर ब्राह्मण कोई प्रतिक्रिया दे पाता उससे पहले ही राजा रोते बिलखते चिल्लाते हुए मंदिर की ओर भागने लगे। उनके मन में अब कोई संदेह नहीं था। जिस ब्रह्मलोक में एक दिन गुज़र जाने पर मृत्युलोक में पूरा एक मन्वंतर निकल जाता है, वहाँ उनके बिताए गए कुछ समय का ही भुगतान था यह एक सहस्र वर्ष। राजा को समझ आ गया था कि, जिनको वह यहां छोड़ कर गए थे, उन सभी को मृत्यु को प्राप्त किये सैकड़ों वर्ष बीत चुके हैं।

    "इतना बड़ा अन्याय क्यों किया मेरे साथ? कालचक्र के इस पहिये के नीचे मेरा सब कुछ कुचल गया भगवन। हे नीलमाधव, यह कैसी लीला है आपकी? इसका उत्तर आपको देना होगा, देना होगा इसका उत्तर...." रोष व अभिमान भरे कंठ से चींखते हुए राजा अब मंदिर के मुख्य द्वार की ओर बढ़ रहे थे। यह सब देख वहां उपस्थित सैनिकों ने राजा को पागल समझ कर बंदी बना लिया और गाल माधव के दरबार में लेकर चले गए।

    दरबार में पूछे जाने पर राजा इन्द्रद्युम्न ने गाल माधब को सारा वृत्तांत बताया। परन्तु शायद ही कोई उनकी बात मानता। इसके विपरीत, वह इन्द्रद्युम्न हैं ऐसा कहने पर राजसभा में उपस्थित समस्त पार्षदों ने उनका तीव्र उपहास किया। किसी किसी ने तो इन्द्रद्युम्न के ऊपर शत्रु देश का गुप्तचर होने का भी लांछन लगाया।

    "वृद्धावस्था के चलते मतिभ्रम हो गया है तुम्हारा, जाओ जाओ, तुम्हारी हालत पर दया करते हुए मैं तुम्हें कोई दंड नहीं दे रहा हूँ। यदि दोबारा ऐसा प्रलाप करते दिखाई दिए तो कठोर दंड मिलेगा।" गाल माधव ने अपमानित कर इन्द्रद्युम्न को राजसभा से निकाल दिया।

    दिन भर का राजकार्य सम्पात कर जब गाल माधव निद्रा लेने गए तो देर रात उनके सपने में भगवान विष्णु आये।

    "अरे मूर्ख, तेरे अहंकार ने तुझे अंधा कर दिया है। जिसका तूने आज तिरस्कार किया वह मेरा सबसे बड़ा भक्त इन्द्रद्युम्न है। उसी ने मेरे आदेश अनुसार इस मंदिर का निर्माण किया है। यह मंदिर मेरे पुरुषोत्तम जगन्नाथ स्वरूप को समर्पित है जो आज भी अपने परम भक्त के हाथों ही प्रतिष्ठित होने की प्रतीक्षा किये रेत में दबी पड़ी है। जा, जाकर सम्मान के साथ इन्द्रद्युम्न को ले आ और विधिपूर्वक मेरे तथा इस मंदिर की स्थापना करवा।" श्रीहरि विष्णु का यह आदेश सुन गाल माधव उसी समय आधी रात में ही राजा इन्द्रद्युम्न को खोजने निकल गए। बहुत ढूंढने के बाद समुद्र के किनारे सिर को झुकाए अत्यंत दुखी बैठे राजा इन्द्रद्युम्न उन्हें मिल गये। इन्द्रद्युम्न को देखते ही गाल माधव उनके पैरों पर गिर गए और अपनी मूर्खता के लिए उसने क्षमा माँगी। तत्पश्चात वह पूरे राजकीय सम्मान के साथ राजा इन्द्रद्युम्न को अपने महल ले आये। 

    अगले दिन सुबह राजा इन्द्रद्युम्न और गाल माधव साथ ही मंदिर गए और भगवान विष्णु से वर्षों से दबी हुई त्रिमूर्तियों का संधान देने हेतु प्रार्थना करने लगे।  जैसे ही वे मंदिर से बाहर आये तो एक बहुत तेज आंधी चलने लगी। तूफ़ान के प्रकोप से थोड़ी ही दूरी पर स्थिति एक विशाल टीले पर से रेत छंटने लगी। रेत के छंटते के साथ ही प्राचीन मूर्तिशाला का आकार बाहर आने लगा।

    यह दृश्य देख राजा इन्द्रद्युम्न की आंखे भर आयी। पूरी मिट्टी हट जाने के बाद मूर्तिशाला के द्वार स्वयं ही खुल गए और अंदर से आने वाले दिव्य प्रकाश से सबकी आंखे चौंधियाने लगी। इतने साल दबे हुए होने के बाद भी त्रिमूर्तियों का तेज जरा सा भी कम नहीं हुआ था। जीवन में पहली बार विष्णु के इस अनोखे रूप का दर्शन करने वाले गाल माधव की आँखों से भी अब किसी अविरल झरने की तरह अश्रु बहने लगे।

    उपयुक्त घड़ी आने पर देवराज इंद्र व देवर्षि नारद सहित प्रजापति ब्रह्मा वहां उपस्थित हुए। ब्रह्माजी के संरक्षण में वेद मंत्रोचारण के बीच त्रिमूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा हुई। द्वापर काल में ज़ारा व अर्जुन द्वारा समुद्र में बहाया गया श्रीकृष्ण का अवशेष अब एक शक्तिपुंज बन कर भगवान श्रीजगन्नाथ के विग्रह में प्रवेश कर गया। यह अलौकिक दृश्य देख समस्त देवगण स्वर्ग से पुष्पवृष्टि करने लगे। भगवान जगन्नाथ की प्रतिष्ठा कर अपने अंतिम कर्तव्य का पालन करके राजा इन्द्रद्युम्न ने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया और वैकुंठ लोक में विश्वावसु के पास अपना स्थान ग्रहण किया।

    आज भी पूरे विश्व में भगवान जगन्नाथ एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनकी प्रतिमा जीवित है। श्रीकृष्ण का वह देह अवशेष आज भी भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के अंदर वास करता है, जिसे ब्रह्म पदार्थ कहा जाता है। हर बारह वर्षों के बाद त्रिमूर्तियों का किसी जीवित मनुष्य के भांति ही अंतिम संस्कार किया जाता है और उस समय नई बनी प्रतिमा में प्राण स्वरूप श्री कृष्ण के अवशेष को स्थापित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को नवकलेवर कहा जाता है। भगवान नीलमाधव के कहे अनुसार आज भी विश्वावसु के वंशज ही प्रभु श्री जगन्नाथ के आद्य सेवक हैं, जिन्हें दैतापति कहा जाता है.

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    17 min
  • भगवान जगन्नाथ का आगमन (Part - 3)

    नील कन्दर से वापस लौटे अब कई दिन बीत चुके थे। सबर नगरी में विश्वावसू और अवंति में राजा इन्द्रद्युम्न अपने आराध्य के पुनः दर्शन पाने हेतु व्याकुल हो रहे थे। एक रात सोते समय इन्द्रद्युम्न के सपने में भगवान नीलमाधव आते हैं। पहली बार अपने भगवान की नीलवर्णी प्रतिमा तथा अलौकिक तेज को देखकर राजा भी भक्ति भाव से सराबोर हो उठते हैं।

    नीलमाधव अब राजा को सही समय आने की सूचना देते हैं और कहते हैं कि, " हे मेरे परम भक्त इन्द्रद्युम्न, तुम पुनः उत्कल राज्य में जाओ। वहाँ तुन्हें समुद्र के किनारे पानी में तैरता हुआ लकड़ी का एक लट्ठा मिलेगा। उस लट्ठे से तुम मेरी, भैया बलराम तथा बहन सुभद्रा की त्रिमूर्तियों का निर्माण करोगे और उसी समुद्र के किनारे एक भव्य मंदिर बनवाकर विधि पूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करोगे। कलियुग के अंत तथा कल्कि अवतार होने तक यही नील समुद्र का किनारा, नीलांचल ही मेरा स्थान होगा। यह कार्य तुम्हे, मेरे आद्य सेवक विश्वावसु को अपने साथ लेकर संपादित करना होगा।"

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    13 min
  • श्रीकृष्ण का नीलमाधव रूप (Part 2)

    द्वापर युग का समापन होकर अब कलयुग की शुरुआत हुए कुछ वर्ष बीत चुके थे। निषाद राज विश्वावसु का जन्म सबर कुल में हुआ था। वह उत्कल राज्य में एक आदिवासी कबीले के सरदार हुआ करते थे। एक दिन वन में शिकार करने के लिए निकले विश्वावसु देर रात तक भी वापस घर नहीं लौटे, किसी अनहोनी की आशंका से उनकी पत्नी, बेटी और कबीले के बाकी साथी कांपने लगे। कई दिनों तक विश्वावसु की खोज में आदिवासी सैनिकों ने दिन रात एक कर दिए परंतु उन्हें कहीं पर भी अपने राजा का कोई पता नहीं मिला। थक हार कर सब उदास मन से विश्वावसु की कुशलता की कामना कर प्रार्थना करने लगे।

    जंगल में एक भालू का पीछा करते करते भटक चुके थे विश्वावसु। हालांकि वह कई बार इसी वन में शिकार करने हेतु आया करते थे, लेकिन आज पता नहीं क्यों उन्हें बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा था। शायद ही कोई मायावी शक्ति आज उन्हें इस जंगल से बाहर नहीं निकलने देना चाहती थी। अंत में बहुत कोशिशें करने के बाद वह थक हार कर एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगते हैं। कुछ देर के बाद उसी पेड़ से थोड़ी ही दूरी पर स्थित एक गुफ़ा के अंदर से कोई चमकती हुई चीज विश्वावसु  का ध्यान अपनी ओर खींचती है। उत्सुकतावश  विश्वावसु गुफा के अंदर से आती रोशनी की ओर बढ़ने लगते हैं। वह जितना उस गुफा के पास जाते, अंदर से आने वाली रोशनी और अधिक उज्जवल होने लगती। इस तरह उस रोशनी का पीछा करते करते आखिरकार वह गुफा के अंदर प्रवेश कर जाते हैं।

    गुफ़ा के अंदर घुसते ही  विश्वावसु के मन को मानो अपने आप ही सुकून मिलने लगता है, एक अद्भुत सी शांति विराजमान थी उस गुफ़ा के भीतर। थोड़ी ही देर पहले इस वन से बाहर निकलने के लिए व्याकुल निषाद राज का मन अब न जाने क्यों इसी गुफ़ा में हमेशा के लिए रह जाने को कर रहा था। बहरहाल अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए  विश्वावसु अब जहां से रोशनी आ रही थी, उसी दिशा में गुफा के और अंदर चले जाते हैं।

    उस अति उज्ज्वल आलोक के निकट पहुँच कर मानो  विश्वावसु के पैरों तले जमीन ही खिसक जाती है। जैसे कि कोई प्रेत देख लिया हो, उसी के डर से अब वह कांपने लगते हैं। उनकी आंखों के सामने अब जो सब हो रहा था, वह सच नहीं हो सकता, भला कैसे कोई मूर्ति जीवित हो सकती है? 

    "क्या यह मेरा वहम है या फिर किसी दुष्ट असुर की माया?" डर के मारे पसीने से लथपथ  विश्वावसु अब खुद से यही सवाल पूछ रहे थे। क्योंकि जो कुछ भी उनकी आंखों के सामने घट रहा था, उस पर विश्वास करना उनके लिए भी असंभव था।

    विश्वावसु के सामने एक गहरे नीले रंग की मूर्ति रखी हुई थी जिससे लगातार तेज रोशनी निकल रही थी। हैरान कर देने वाली बात यह थी, की उस मूर्ति की आंखें खुली हुई थीं और किसी जीवित मनुष्य के भाँति उसकी पुतलियां भी जीवित थी। रह रह कर वह मूर्ति  विश्वावसु को देख कर मंद मंद हंस भी रही थी। यदि कोई साधारण मनुष्य होता तो यह सब देखकर शायद भय से उसके प्राण ही निकल जाते, लेक़िन निषाद राज ने हिम्मत नहीं हारी, अपने अंदर शेष बचे सारे साहस को एकजुट कर वह मूर्ति की ओर देख रहे थे।

    "कौन हो तुम? क्या चाहते हो? मुझे क्यों अपनी माया का शिकार बना रहे हो?"  विश्वावसु ने उस मायावी मूर्ति से प्रश्न किया।

    बिना उत्तर दिए ही वह मूर्ति केवल मंद मंद मुस्कान कर रही थी। जिसे देख कर  विश्वावसु और आतंकित हो रहे थे। 

    "मुझे पता है तुम ही मुझे यहाँ लाये हो। अब लाये हो तो बताते क्यों नहीं क्या चाहिए मुझ से? यदि मेरे प्राण लेने हैं तो ले लो और ख़त्म करो। यह क्या बेकार ही मुस्कुरा रहे हो?" गले में डर के मारे दबी हुई आवाज़ में  विश्वावसु ने फिर मूर्ति से सवाल किया ।

    "हा हा हा... इतनी जल्दी मुझे भूल गए सबर नरेश! मैं तो युगों युगों से तुम्हारे साथ ही हूँ।" मूर्ति ने बड़ी चपलता के साथ उत्तर दिया।

    "मैं कुछ समझा नहीं, तुम और मेरे साथ?" आश्चर्यचकित होकर  विश्वावसु ने पूछा।

    "अभी स्मरण किये देता हूँ निषाद राज।" मूर्ति के ऐसे कहने के साथ ही अब उस गुफ़ा में वेद मंत्रोचारण की ध्वनि गूंजने लगी। सारे वातावरण में तुलसी और चंदन की सुगंध महकने लगी। विश्वावसु को अब ऐसा प्रतीत हो रहा था की मानो वह किसी हवन के पास खड़े हुए हों। धीरे धीरे उन्हें एक असाधारण चेतना का एहसास होता है और उनकी आंखों के सामने रामायण और महाभारत काल की घटनाएं चित्रित होने लगती हैं। 

    अब कोई संदेह नहीं था मन में। आंखों से खुशी के आंसू टपक रहे थे  विश्वावसु के। इतने वर्षों बाद अपने प्रभु को स्वयं के सामने देख फूले नहीं समा रहे थे सबर राज। त्रेता में बाली, द्वापर में जारा और अब कलयुग में  विश्वावसु बने इस महान विष्णु भक्त के सामने उसके आराध्य श्री हरि स्वयं नीलमाधव की मूर्ति बने खड़े थे। 

    "हे भगवन! अहोभाग्य मेरे जो मुझे इस जीवन में भी आपके चरणों की सेवा करने का पुनः  अवसर मिला। मैं तो धन्य हो गया, केशव।"  विश्वावसु ने नीलमाधव की ओर देखते हुए कहा।"

    "जब तुमने बाण चलाकर द्वापर युग में मुझे मेरे नश्वर शरीर से मुक्ति दिलाई थी, तब मैंने कहा था कि तुम्ही आने वाले युग में मेरे आद्य सेवक बनोगे, ज़ारा। अब वह समय आ चुका है। इसी नीलकन्दर गुफ़ा में नीलमाधव के रूप में मैं अवतरित हुआ हूँ। कलयुग में जब अधर्म अपनी पराकाष्ठा पार कर जाएगा, तो हे विश्वावसु, मैं अपना कल्कि अवतार लूंगा। तब तक यही मेरा माधव रूप ही कल युग के सकल प्राणियों के लिए पूजनीय होगा।" यह कहकर भगवान नीलमाधव ने  विश्वावसु को अपने धरावतरण का उद्देश्य समझया।

    "हे भगवान, मैं तो आपका दास हूँ, जो प्रभु की इच्छा, वही होगा।" यह कहकर  विश्वावसु भगवान नीलमाधव की सेवा में लग गए। इसी बीच बहुत दिन बीत चुके थे और  विश्वावसु का परिवार उनके जीवित होने की आशा अब छोड़ चुका था। यहाँ तक कि कबीले में भी नए सरदार का चुनाव व नियुक्ति की जा चुकी थी। 

    भगवान नीलमाधव ने इन सब की सूचना  विश्वावसु को दी और उनके बिना उनके परिवार का क्या हाल हो रहा है वह भी बताया। राजा और पिता के तौर पर अपने कर्तव्य के प्रति सचेत रहते हुए ही वह भगवान की सच्ची सेवा कर सकते हैं यह कहकर भगवान नीलमाधव ने उन्हें गुफ़ा से जाने की आज्ञा दी। जाते हुए यह निर्देश भी दिया कि यहां आने की अनुमति केवल  विश्वावसु को ही है और जबतक वह न चाहें,  विश्वावसु इस नीलकन्दर गुफ़ा के बारेमें किसी को कुछ भी नहीं बताएंगे।

    सबर नगरी की सीमा में घुसते ही लोग अचंभे में  विश्वावसु को देख रहे थे, चूंकि उन्हें लगा कि वह मर चुके थे। उनका परिवार अब  विश्वावसु को देखकर ख़ुशी से झूम उठा। इस जन्म में अपने पिता से पुनः मिलने की उम्मीद खो चुकी  विश्वावसु की पुत्री ललिता में मानो फिर से जीवन का संचार हो गया था।  विश्वावसु के वापस लौटते ही उन्हें पुनः राजा बना दिया गया। अब राज्य भार संभालने  के साथ साथ वह रोज ही नीलकन्दर गुफ़ा में जाकर भगवान नीलमाधव की सेवा भी करते। 

    धीरे धीरे नीलकन्दर पर्वत पर  विश्वावसु का रोज जाना प्रजा में संदेह का कारण बन गया। रानी व राजकुमारी ललिता भी अपने पिता के इस अद्भुत व्यवहार का कारण जानना चाहती थीं। परन्तु  विश्वावसु तो वचनबद्ध थे, किसी को भी भगवान के बारे में नहीं बता सकते थे। मगर एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने अपने परिवार और प्रजा को भगवान नीलमाधव की उपस्थिति के बारे में सब कुछ बता दिया। लेकिन अभी भी वह अपने पहले वचन पर अड़िग थे, कि उनके अलावा और कोई भी भगवान के दर्शन नहीं कर सकता। अतएव कितना कहने पर भी राजा ने किसीको नीलकन्दर गुफ़ा तक पहुंचने का रास्ता नहीं बताया। इसी बीच बहुत वर्ष बीत गए।

    अवन्ति राज्य में एक परम विष्णुभक्त महाराज इन्द्रद्युम्न ने सिंहासन आरोहण किया। वह अपने आराध्य के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और किसी भी तरह से श्रीहरि के साक्षात दर्शन पाने की मनोकामना रखते थे। एक कान से दुसरे कान तक फैलते फैलते अब नीलकन्दर गुफ़ा की कहानी राजा इन्द्रद्युम्न तक भी पहुंच गई। जब उन्हें पता चला की श्रीहरि विष्णु पूर्णतः जीवित रूप में वहां पर निवास कर रहे हैं, तो उनसे अब रहा नहीं गया। वह नीलमाधव के दर्शन करने को अब व्याकुल हो उठे।

    अपने मंत्री विद्यापति को बुलाकर वह उनसे सलाह करने लगे। विद्यापति को भी नीलकन्दर गुफ़ा की कहानी पता थी, वह जानते थे कि सबर राज  विश्वावसु के अतिरिक्त वहां का रास्ता किसी और को नहीं पता तथा वहां पर किसी और का प्रवेश भी वर्जित है। ऐसे में नीलकन्दर तक पहुँचना असंभव था। अतएव उन्होंने इन्द्रद्युम्न को इस इच्छा का त्याग करने का परामर्श दिया। परंतु इन्द्रद्युम्न नहीं माने, उनकी ज़िद के सामने विद्यापति को हार माननी पड़ी। अंततः विद्यापति ने राजा से उन्हें पहले भेजने के लिए कहा, ताकि वह गुफ़ा की खोज कर वापस आ सकें और फिर राजा को दर्शन करवा सकें। इन्द्रद्युम्न को यह सुझाव बहुत पसंद आया और उन्हीने तुरंत ही विद्यापति को उत्कल राज्य भेज दिया।

    उत्कल देश में पहुंच कर विद्यापति,  विश्वावसु की नगरी की ओर जाने लगे। वह बस सबर नगरी पहुँचने ही वाले थे कि, उन्हें अकेला पाकर लुटेरों ने उनपर आक्रमण कर दिया। यद्यपि विद्यापति एक शूरवीर तथा तलवार चलाने में निपुण योद्धा थे, परंतु संख्या बल के आगे उन्हें अपनी हार माननी पड़ी। लुटेरों ने उनका सारा धन,अस्त्र-शस्त्र, आभूषण तथा उनके अश्व को भी लूट लिया तथा उन्हें बुरी तरह से आहत कर रास्ते पर ही छोड़ दिया। शायद उनकी मृत्यु का समय निकट है, यह सोचकर विद्यापति बेहोश हो जाते हैं। उनकी नींद अगले दिन किसीकी कुटिया में खुलती है।

    "अवश्य ही भगवान नीलमाधव की कृपा है आप पर, जो मैं वहाँ ठीक समय पर पहुंच गई। अन्यथा न जाने क्या होता !" किसी स्त्री की सुमधुर आवाज़ अब विद्यापति के कानों को तृप्त कर रही थी। 

    "कौन हो आप, और मैं यहां कैसे आया ?" दर्द से भारी सिर को पकड़े हुए विद्यापति ने पूछा।

    "मैं ललिता हूँ, सबर राज  विश्वावसु की पुत्री। कल आप अचेत अवस्था में मुझे नगरी के बाहर मिले थे, पूरी रात वैद्यों ने आपका उपचार किया है, तभी आप का जीवन बच पाया। अभी आप हमारे निवास में हैं। चिंता मत कीजिये, यहां आपके प्राण पूरी तरह से सुरक्षित हैं।" अपना परिचय देते हुए ललिता ने कहा।

    जिस वस्तु को खोजते खोजते वह अवंति से यहाँ तक आये थे, वह निश्चित ही उन्हें मिलने वाली है, ऐसा अब विद्यापति को लगने लगा था।  विश्वावसु की पुत्री द्वारा ही उनको बचाया जाना अवश्य ही विधि निर्देशित था, अन्यथा ललिता का वहां पर होना केवल एक संयोग नहीं हो सकता। उन्हीने मन ही मन नीलमाधव के लिए अपने हांथ जोड़ दिए। 

    अब ललिता की सेवा से धीरे धीरे विद्यापति ठीक होने लगते हैं। इसी बीच दोनों एक दूसरे के प्रेम में पड़ जाते हैं और विवाह करने का निर्णय लेते हैं।  विश्वावसु भी ललिता के प्रेम को स्वीकृति दे देते हैं और दोनों विवाह कर लेते हैं। विवाह के पश्चात विद्यापति भी सबर नगरी में ही रहने लगते हैं और हर दिन नीलकन्दर पहुंचने के रास्ते को खोजने लगते हैं। कई बार तो वह छुप छुप के  विश्वावसु का पीछा भी करते, परंतु वन में थोड़ी  दूर जाते ही विश्वावसु मानो अदृश्य हो जाते। अंत में यह बात विद्यापति को भली भांति समझ आ गयी कि  विश्वावसु की सहायता के बिना नीलमाधव के दर्शन करना असंभव है। 

    विश्वावसु को मनाना आसान नहीं है, यह सोच कर उन्होंने अपनी प्रियतमा पत्नी ललिता की सहायता मांगी। विद्यापति को यह आशा थी कि यदि ललिता खुद अपने पिता से विद्यापति के लिए प्रार्थना करेगी तो शायद वह मान जाएंगे। पहले तो ललिता ने भी अपने पति की इस इच्छा को अनुचित समझा, लेकिन विद्यापति का नीलमाधव को देखने की जिद के आगे उन्होंने हार मान ली और अपने पिता से विद्यापति के इच्छा की पेशकश की। यद्यपि भगवान की आज्ञा की अवहेलना करना उन्हें गंवारा नहीं था, लेकिन  विश्वावसु भी पुत्री मोह के सामने एक बार के लिए दुर्बल पड़ गए।

    "ठीक है। मैं तुम्हें केवल और केवल एक बार के लिए भगवान नीलमाधव के दर्शन करवा सकता हूँ । लेकिन मेरी एक शर्त है। शर्त के अनुसार तुम्हें पूरे रास्ते अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर ही चलना होगा और मेरे कहने से पहले तुम अपनी आंखों की पट्टी नहीं उतारोगे।"  विश्वावसु अवश्य ही नीलकन्दर की अवस्थिति गुप्त रखना चाहते हैं यह समझ कर विद्यापति ने उनकी शर्त में हां भर दी।

    अगले दिन सूर्योदय से पहले ही दोनों नीलकन्दर की ओर निकल पड़े। चूंकि आंखों पर पट्टी बंधी होने के कारण वह रास्ता देख नहीं सकते थे, इसीलिए विद्यापति अपने साथ एक थैली में सरसों के कुछ बीज ले आये थे। उन्ही बीजों को वह  विश्वावसू की नज़रों से बचाते हुए पूरे मार्ग पर बिछाते जा रहे थे। जैसे जैसे नीलकन्दर निकट आ रहा था, आंखों पर पट्टी बंधे होने के बाद भी विद्यापति को इसका एहसास हो रहा था। न जाने अब कहाँ से एक अलौकिक शांति उनके हृदय में खेलने लगी थी।

    जब आंखों पर से पट्टी उतरी तो नीलमाधव के सामने उपस्थित होकर विद्यापति को भी वैसा ही एहसास हो रहा था जैसा पहली बार  विश्वावसु को हुआ था। पूरी तरह से सचेत, एक जीवित मूर्ति को देख वह अचंभे में थे। भगवान के उद्देश्य में विद्यापति ने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और श्रीहरि के इस अत्यंत निराले रूप को देख कर वह भी भक्ति से गद गद हो उठे। विश्वावसु ने अपनी पूजा समाप्त करने के बाद वैसे ही आंखों पर पट्टी बांध कर अपने दामाद को नीलकन्दर से वापस ले आये।

    वापस आते ही अपने राजा इन्द्रद्युम्न को नीलमाधव को देखने की कहानी बताने के लिए विद्यापति व्याकुल हो उठे। अतएव उन्होंने ललिता से विदा लेकर कुछ दिनों के लिए अपने राज्य वापस जाने की इच्छा व्यक्त की। हालांकि उन्होंने  विश्वावसु को गोपनीयता का वचन दिया था, परंतु न चाहते हुए भी उन्हें वह वचन तोड़ना पड़ेगा, इस बात से विद्यापति थोडे दुःखी भी थे।

    अब अवंति राज्य पहुंच कर विद्यापति ने इन्द्रद्युम्न को सारा वृतांत सुनाया। खुशी के मारे उत्साहित राजा अब एक क्षण की और देरी नहीं करना चाहते थे। अपने सैनिकों को उन्होंने तुरंत नीलकन्दर की ओर कूच करने का निर्देश दिया। विद्यापति के साथ घोड़े पर बैठ कर राजा उस वन के निकट पहुंचे जिसके भीतर नीलमाधव का निवास था। जिस मार्ग पर विद्यापति ने सरसों के बीज बिछाए थे, वहां पर अब सरसों के पौधे उग चुके थे। रास्ता पहचानने में अब विद्यापति के द्वारा की गई यही बुद्धिमता काम आने वाली थी। राजा और सारे सैनिक उन पौधों के द्वारा बनाई गई पगडंडी का अनुसरण करते करते नीलकन्दर गुफ़ा के अंदर पहुंचे।

    परंतु यह क्या, न ही अब वहां कोई दिव्य रोशनी थी, और न ही तुलसी चंदन की सुगंध। वह गुफ़ा तो अन्य किसी भी सामान्य गुफ़ा की तरह ही उजाड़ पड़ी हुई थी। राजा को यह देखकर बहुत दुःख हुआ और नीलमाधव की इच्छा के विरुद्ध उनके दर्शन करने की अपनी लालसा के चलते वह खुद का तिरस्कार करने लगे। नीचे भूमि में गिर कर किसी बच्चे की तरह हाथ पैर मार कर वह रोने लगे और अपनी मूर्खता को कोशने लगे।

    "हे त्रिलोक पिता, मुझ से एक बहुत बड़ी भुल हो गयी, आपकी आज्ञा न होने के बाद भी मैंने आपको देखने की धृष्ठता करनी चाही। इस कार्य में मैंने सबर राज  विश्वावसु को भी धोखा दिया। मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं है भगवन, कोई अधिकार नहीं..." राजा अब किसी पागल की तरह अपना सिर पीट रहे थे।

    उसी समय रोज की तरह पूजा करने के लिए  विश्वावसु भी वहां पहुंच जाते हैं। राजा और अन्य पार्षदों के साथ विद्यापति को गुफ़ा के अंदर देख कर उन्हें पूरी घटना का अंदाजा हो जाता है। वह भी अब राजा के भांति ही भगवान नीलमाधव के चले जाने से अत्यंत दुःखी हो जाते हैं।

    इस समय एक घोर गर्जना के साथ आकाशवाणी होती है।

    " मेरे आने और जाने का समय में स्वयं तय करता हूँ। नीलकन्दर में मेरा प्रकट होना तथा यहाँ से अदृश्य हो जाना भी मेरे द्वारा ही निर्धारित है। विश्वावसु, इन्द्रद्युम्न, तुम अपने अपने राज्य लौट जाओ, उचित समय आने पर मैं स्वयं ही तुम्हें सूचित करूँगा।"

    यह आकाशवाणी सुनने के पश्चात अब किसी के भी मन में कोई संदेह नहीं था। राजा इन्द्रद्युम्न के साथ अवंति प्रदेश वापस लौटते समय विद्यापति ललिता को भी अपने साथ ले आये। वहीं अपनी बेटी और दामाद को विदा करने के बाद  विश्वावसु अपने राजकार्य में मन लगाने लगे। वे सभी श्री हरि विष्णु की आज्ञानुसार अपने अपने राज्यों में लौटकर आने वाले समय की प्रतीक्षा करने लगे।

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    25 min
  • भगवान जगन्नाथ : श्रीकृष्ण का वैकुंठ गमन (Part 1)

    द्वापर युग का अंतिम समय आ चुका था, महाभारत युद्ध को हुए छत्तीस  वर्ष  बीत चुके थे। गांधारी के श्राप के अनुसार सात्यकि और कृतवर्मा की लड़ाई से शुरू हुआ कलह अब पुरे यादव वंश को समाप्त कर चुका था। शेष बचे बलराम के स्वधाम लौटने के बाद अब पूरी तरह से अकेले हो चुके थे भगवान श्रीकृष्ण। अब अपना बाकी का जीवन वह वन में ही बिताने लगे. एक दिन वनवासी जारा शिकार की तलाश में जंगल में घूम रहा था। जारा को झाड़ियों के बीच खड़े एक हिरण का आभास हुआ, उसने अपने धनुश को तैयार किया और निशाना साध दिया। जारा का निशाना अभेद्य था, गहरे लाल रंग के रक्त के प्रवाह के  साथ जारा को अपनी विजय का एहसास हो चुका था। तभी हृदय को चीरने वाली एक दर्द भरी चीख ने उसे एक समय  के लिए झकझोर कर रख दिया, उसका तीर गलती से मृग को नहीं बल्कि एक ,मनुष्य को लग चुका था। 

    जारा ने अपने सामने जो दृश्य देखा उसके बाद उसे खुद पर बहुत क्रोध आया और वह पश्चाताप की आग में जलने लगा। क्योंकि जारा का बाण वहीं झाड़ियों के बीच विश्राम कर रहे एक मनुष्य के पैर में लग चुका था जिसे जारा ने गलती से हिरण समझ लिया था। वह मनुष्य कोई और नहीं, द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण थे। बहरहाल जारा ने भगवान से अपने इस किये गए पाप के दंड स्वरुप स्वयं के लिए भी मृत्यु मांग ली।

    जारा को इस तरह रोते बिलखते अपने भाग्य को कोसते हुए देख भगवान श्रीकृष्ण थोड़ा मुस्कुराये। जिन्होंने अधर्म को समाप्त करने हेतु महाभारत की रचना की, उन्हें भला स्वयं की मृत्यु की  पूर्व निर्धारित विधि कैसे न पता रहती। जारा की व्याकुलता को देख कर श्रीकृष्ण ने उसे यह कहकर सांत्वना दी कि यह सब पहले से तय था, जारा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की हत्या का कारण नहीं बल्कि उनके पार्थिव शरीर से मुक्ति का कारक बना है। 

    भगवान ने जारा की उत्सुकता को देख उसे अपने और उसके पूर्व जन्म की कहानी सुनाई, कि कैसे उसी के ही हाथों उनका, मृत्यु को प्राप्त करना विधि निर्देशित था। पूर्व जन्म यानी त्रेता युग में भगवान राम के अवतार ने महापराक्रमी वानर राज बाली का वध किया था, यद्यपि यह धर्म की स्थापना हेतु ज़रूरी था, लेकिन युद्ध के नियमों के विरुद्ध था। भगवान राम ने बाली की हत्या करने हेतु छल का सहारा लिया था, और बाली पर तीर उन्होंने एक झाड़ी के पीछे रहकर, छुपकर चलाया था।

    जारा अभी तक कुछ समझने की स्थिति तक नहीं पहुंच पाया था, वह समझ नहीं पा रहा था कि उसको यह सब कहानी क्यों सुनाई जा रही है, उसका इससे क्या लेना देना है। खैर! उसका यह संदेह ज्यादा देर तक नहीं टिक पाया जब श्रीकृष्ण ने उसे बताया कि वह त्रेता युग में वानर राज बाली था। देवराज इंद्र का  पुत्र वही वानर महावीर जिसके पराक्रम से असुर तो असुर, देवता भी कांपते थे। 

    जारा को यह सब किसी अविश्वसनीय सपने जैसा लग रहा था, लेकिन वह भी मानने को विवश था। भगवान श्रीकृष्ण के ऊपर बाण चलाकर उसने अपने प्रतिशोध के ऋण को ही चुकाया था। श्रीराम से सच्ची भक्ति, प्रेम और  समर्पण ही वही कारक थे जिनके चलते स्वयं भगवान को भी उसे यह अवसर देना ही पड़ा। अपनी हत्या  का प्रतिशोध जारा रूपी बाली ले चुका था, बिना जाने, बिना समझे, बिना उसकी इच्छा के। 

    बेहरहाल, अर्जुन के साथ मिलके जारा ने भगवान श्रीकृष्ण का अंतिम संस्कार किया और उनके कहे अनुसार द्वारका नगरी का सम्पूर्ण विनाश भी अपनी आँखों से देखा। श्रीकृष्ण का पार्थिव शरीर अग्नि में लीन होने के बाद भी उनका हृदय जैसे का वैसा था। आग उसे जला नहीं पाई थी, और तो और वह तब भी धड़क रहा था। अर्जुन और जारा  ने श्रीकृष्ण के शेष बचे उस अंश  को समुद्र में विसर्जित कर दिया। उसी पल से द्वापर युग की समाप्ति और कलयुग का आरंभ हुआ।

    एक और मान्यता के अनुसार जारा,  वानर राज बाली नहीं बल्कि उनके पुत्र अंगद का पुनर्जन्म था। 

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