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एक सपना और था जिसने मेरी उठती जवानी को अपने धागों में लपेट लिया था। हर तीसरी या चौथी रात देखती थी कोइ दो मंज़िला मकान है, वो बिलकुल अकेला ,आसपास कोइ बस्ती नहीं ,चारो ओर जंगल है और जहाँ वो मकान है उसके एक तरफ नदी बहती है...... नदी की ओर उस मकान की दूसरी मंज़िल की एक खिड़की खुलती है। जहाँ कोई खड़ा खिड़की से बाहर जंगल के पेड़ों व नदी को देख रहा है। मुझे सिर्फ़ उसकी पीठ दिखाई देती थी ,और सिर्फ इतना ... की गर्म चादर उसके कन्धों से लिपटी होती थी ...
सिकंदर (Alexander The Great) का दबदबा पूरी दुनियां में कायम था।विश्व विजेता का सपना देखने वाला सिकंदर एक बहादुर और कुशल योद्धा था। तमाम युद्धों में उसने अपनी वीरता का परिचय दिया लेकिन जब उसे अपनी स्वयं की मृत्यु हो जाने का आभास हुआ तो वो डर गया। महान दार्शनिक अरस्तु के शिष्य रहे सिकंदर ने गहराई से सोचा तो समझ आया की मृत्यु तो निश्चित है। उसने अपने वज़ीर को बुलाया और अपनी अंतिम इच्छा बताईं .....
महारानी एलिज़ाबेथ जिस युवक से मन ही मन प्यार करती हैं ,उसे जब समुद्री जहाज़ देकर काम सौंपती हैं ,तो दूरबीन लगाकर जाते हुए जहाज़ को देखकर परेशान हो जाती हैं । देखती हैं कि नौजवान प्रेमिका भी जहाज़ पर उसके साथ है। वे दोनों डैक पर खड़े हैं ,उस समय महारानी को परेशान देखकर उसका एक शुभचिंतक कहता है ,'मैडम ! लुक ए बिट हायर !'
ऊपर ,उस नवयुवक और उसकी प्रेमिका के सिरों से ऊपर ,महारानी के राज्य का झंडा लहरा रहा था।
मिल गयी थी इसमें एक बूँद तेरे इश्क़ की ,इसलिए मैंने उम्र की सारी कड़वाहट पी ली ,पर आज इस महफ़िल में बैठे हुए मुझे लग रहा है की मेरी उम्र के प्याले में इंसानी प्यार की बहुत सी बूंदे मिल गयी हैं ,और उम्र का प्याला मीठा हो गया है। '
------ अमृता प्रीतम ,रसीदी टिकट
लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिए आता था ,तो जैसे मेरी ही ख़ामोशी में से निकला हुआ खामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और चला जाता था.....
वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था ,कोई आधी सिगरेट पी कर राखदानी में बुझा देता था ,फिर नयी सिगरेट सुलगा लेता था ,और उसके जाने के बाद केवल सिगरटों के बड़े -बड़े टुकड़े कमरे में रह जाते थे।
कभी ... एक बार उसके हाथ को छूना चाहती थी ,पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी ,जो तय नहीं होती थी....
तब भी कल्पना की करामात का सहारा लिया था।
उसके जाने के बाद ,मैं उसके छोड़े हुए सिगरटों के टुकड़ों को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी ,और फिर एक -एक टुकड़े को अकेले में बैठकर जलाती थी ,और जब उँगलियों के बीच पकड़ती थी ,तो लगता था ,जैसे उसका हाथ छू रही हूँ .....
दुखों की कहानियां कह -कहकर लोग थक गए थे ,पर ये कहानियां उम्र से पहले ख़त्म होने वाली नहीं थीं। मैंने लाशें देखी थीं ,लाशों जैसे लोग देखे थे ,और जब लाहौर से आकर देहरादून में पनाह ली ,तब नौकरी की और दिल्ली में रहने के लिए जगह की तलाश में दिल्ली आयी ,और जब वापसी का सफर कर रही थी ,तो चलती हुई गाड़ी में ,नींद आंखों के पास नहीं फाटक रही थी.....
गाड़ी के बाहर घोर अँधेरा समय के इतिहास के सामान था। हवा इस तरह सांय- सांय कर रही थी ,जैसे इतिहास के पहलू में बैठकर रो रही हों। बाहर ऊंचे- ऊंचे उनके पेड़ दुखों की तरह उगे हुए थे। कई जगह पेड़ नहीं होते थे ,केवल एक वीरानी होती थी ,और इस वीरानी के टीले ऐसे प्रतीत होते थे,जैसे टीले, नहीं क़ब्रें हों।
वारिस शाह की पंक्तियाँ मेरे ज़हन में घूम रही थीं ---'भला मोये ते बिछड़े कौन मेले.....'
रसीदी टिकट पाठ 9 नफरत का एक दायरा ,पाठ 10 --1947
एक लंबा और सांवला सा साया था ,जब मैंने चलना सीखा ,तो मेरे साथ साथ चलने लगा।
एक दिन वो आया ,तो उसके हाथ में एक काग़ज़ था ,उसकी नज़्म का। उसने नज़्म पढ़ी और वो काग़ज़ मुझे देते हुए जाने क्यों उसने कहा --" इस नज़्म में जिस जगह का ज़िक्र है ,वो जगह मैंने कभी देखी नहीं, और नज़्म में जिस लड़की का ज़िक्र है , वो लड़की कोइ और नहीं....."
मैं काग़ज़ लौटाने लगी ,तो उसने कहा --"यह मैं वापस ले जाने के लिए नहीं लाया। "
तब रात को आसमान के तारे मेरे दिल की तरह धड़कने लगे ,और फिर जब मैं कोइ नज़्म लिखती ,लगता मैं उसे खत लिख रही हूँ।
अचानक कई पतझड़ एक साथ आ गए ,उसने बताया कि अब उसे मेरे शहर से चले जाना है। रोटी रोज़ी का तकाज़ा था ,और उस शाम उसने पहली बार मेरी नज़्में माँगी और मेरी एक तस्वीर माँगी।
फिर , अखबारें ,किताबें, जैसे मेरे डाकिये हो गयीं और मेरी नज़्में मेरे ख़त हो हो गए उसकी तरफ।
Rasidi Ticket part 5
lesson --7+8
Uska Saaya + Khamoshi ka ek dayara
सुरेंद्र दिल ही दिल में बहुत ख़फ़ीफ़ हो रहा था,उसने एक बार बुलंद आवाज़ में उस लड़की को पुकारा ,"ए लड़की !"
लड़की ने फिर भी उसकी तरफ न देखा. झुंझला कर उसने अपना मलमल का कुरता पहना और नीचे उतरा।जब उस लड़की के पास पहुंचा तो वो उसी तरह अपनी नंगी पिंडली खुजला रही थी.
सुरेंद्र उसके पास खड़ा हो गया। लड़की ने एक नज़र उसकी तरफ देखा और सलवार नीची करके अपनी पिंडली ढांप ली .
लड़की का चेहरा और ज़्यादा सांवला हो गया,"तुम क्या चाहते हो ?"
सुरेंद्र ने थोड़ी देर अपने दिल को टटोला,"मैं क्या चाहता हूँ मैं कुछ नहीं चाहता. मैं घर में अकेला हूँ ,अगर तुम मेरे साथ चलोगी तो बड़ी मेहरबानी होगी "
लड़की के गहरे सांवले होठों पर अजीब-ओ-गरीब किस्म की मुस्कराहट नुमूदार हुई ,"मेहरबानी ... काहे की मेहरबानी ... चलो !"
और दोनों चल दिए।
उर्दू के अग्रणी लेखकों में से एक सआदत हसन मंटो लिखित कहानी "वह लड़की" विभाजन की उस त्रासदी से छलके दर्द की परिणति है,जब धर्म के आधार पर आंदोलन भड़के और भारत दो भागों में बंट गया ।
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