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शायद सफलता हसरतों को पूरा करना नहीं है, बल्कि ये समझ जाना है की हसरतें पूरी हो नहीं सकती।
हसरतों का स्वतः मिट जाना सफलता है।
शायद प्रेम और वियोग, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जब तक हम किसी के क़रीब होते हैं तो हमें उसकी एहमियत का आभास नहीं हो पाता। और जैसे ही उस व्यक्ति का, उस स्थिति का या उस भाव का अभाव हमारे सामने आता है, तो हम स्तब्ध रह जाते हैं और उस खालीपन से पहला साक्षात्कार होता है।
मेरा गाँव बदल रहा है
और न्यूटन की मानें तो कोई भी बदलाव बिना किसी बाहरी बल के खुदबखुद नहीं होता।
आज हिमालय जगा रहा है तुम्हें, जागो-जागो मेरे लाल
मत करने दो नीलाम मुझे, मत होने दो मेरा हलाल।
पत्थर बेचे, मिट्टी बेची, बेचे जंगल हरे बांज के, लीसा गडाण के घाव से, दी गई खाल मेरी उतार
संगीत-गीत सब बेच दिए, मेरे इन सुमधुर कंठों का सुर बेच दिया…. सब बेच दिया ठंडा पानी, ठंडी बयार
चलन आज का नहीं, पुराना है उनका, छानेंगे इतिहास तो आपको यही मिलेगा… जिसको भी कांधे बैठाया हमने, वही काल बन गए हमारे, यही इतिहास कहेगा
रोज़ स्कूल में बच्चों से सीखते और उन्हें सिखाते हुए कई बार दिल में आता है की क्या सिर्फ बोर्ड्स में अच्छे मार्क्स लाने या अपनी ड्रीम जॉब पाने के लिए स्कूल आते हैं सभी? क्या हमारे लिए शिक्षा का ये ही मतलब है?
और अगर हाँ, तो मैं क्यों बच्चों को पढ़ाई के साथ- साथ फोटोग्राफी सीखने, कामू या मारकेज़ पढ़ने, म्यूज़िक सीखने और कविताएं लिखने के लिए प्रेरित करता हूँ?
'क्यारी'-शब्द, मुझे हमेशा से ही बेहद प्रिय है. इस साल की शुरुआत में जब डिसाइड किया कि पॉडकास्ट शुरू करनी है तो ये शब्द सबसे पहले ज़हन में आया।
इस एपिसोड में केवल खुद से पूछे गए एक प्रश्न का जवाब है - "पॉडकास्ट का नाम 'क्यारी' क्यों रखा?"
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