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Protest Songs
Paisa Paisa
Request: If you are known to the singers or the team who brought it out, kindly write to me on [email protected] so that I can add the relevant informations to this podcast.
Released by Bharat Gyan Vigyan Samiti, this poem of Rajesh Joshi was sung by a team of young musicians and singers.
Preserved, Digitized and Curated by Irfan
~ राजेश जोशी
कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह-सुबह
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग-बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्या सारे मैदान, सारे बग़ीचे और घरों के आँगन
ख़त्म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्बमामूल
पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए
बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं।
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Work on Listen with Irfan takes time, money and hard work to produce. As of now it is being done voluntarily with the family, friends and listeners who came forward for hand holding from its inception. If you like the Podcasts, admire it, and benefit from its content, please consider awarding us an honorarium to make the future of this Podcast Channel robust and assured.
यहाँ आपको मिलती हैं वो दुर्लभ आवाज़ें खुद बोलती, गाती और बहस करती। मनोहर श्याम जोशी, कमलेश्वर, कृष्णा सोबती, बी वी कारंत, शमशेर बहादुर सिंह, बलराज साहनी, अज्ञेय, रसूलन बाई, निर्मल वर्मा, मंगलेश डबराल, राजेंद्र यादव, चंद्रकांत देवताले, भवानी प्रसाद मिश्र, इस्मत चुग़ताई, सत्यदेव दुबे, त्रिलोचन, अमरीश पुरी, इब्राहीम अल्क़ाज़ी, मोहन उप्रेती, गोरख पांडेय, नैना देवी, वीरेन डंगवाल, मन्नू भंडारी, भीष्म साहनी, देवकी नंदन पांडे आदि के अलावा अनगिनत भारतीय और विदेशी समकालीन विचारक, कलाकार, लेखक, कवि और सांस्कृतिक लड़ाके। किताबों पर चर्चा के पॉडकास्ट, संगीत, फिल्म रिव्यू और स्ट्रीट रिकॉर्डिंग्स का एकमात्र पॉडकास्ट मंच।
Recorded, Produced Curated by Irfan, 4 April 2023
Veteran theatre director, actor, writer, broadcster Bharat Ratna Bhargava worked more than a decade with blind and destitute children to train them in theatre. Here is an anecdote.
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A rare recording.
Listen in the voice of Sahir Ludhianvi
Shaistagi-e-Dahar Farogh-e-watan ke khwaab
Ye KHwab hi to apni jawani ke pas the
Ye KHwab hi to apne amal ki asas the
Ye KHwab mar gae hain to be-rang hai hayat
Yun hai ki jaise dast-e-tah-e-sang hai hayat
Aao ki koi KHwab bunen kal ke wastey
Warna ye raat aaj ke ghamnaak daur ki
Das legi jaan o dil ko kuchh aaise ki jaan o dil
Ta-umr phir na koi hasin KHwab bun sakein
*
~Sahir Ludhianvi
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Cover Art: Irfan
It was a BIM's Alumni meet in Delhi around 2008 or 2009. My friend Anand Pradhan have selected half a dozen of poems by contemporary Hindi-Urdu poets and we enjoyed the evening. Discovered this recording (though very poor) last week. #Patkatha #Dhumil #BharathidasanInstituteofManagement
Patkatha | Dhumil
(Excerpts)
जी भरकर प्यार किया
और जो नहीं था
उसका इंतज़ार किया।
मैंने इंतज़ार किया–
अब कोई बच्चा
भूखा रहकर स्कूल नहीं जायेगा
अब कोई छत बारिश में
नहीं टपकेगी।
अब कोई आदमी कपड़ों की लाचारी में
अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा
अब कोई दवा के अभाव में
घुट-घुटकर नहीं मरेगा
अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा
कोई किसी को नंगा नहीं करेगा
अब यह ज़मीन अपनी है
आसमान अपना है
जैसा पहले हुआ करता था…
सूर्य,हमारा सपना है
मैं इन्तजा़र करता रहा..
इन्तजा़र करता रहा…
इन्तजा़र करता रहा…
जनतन्त्र,त्याग,स्वतन्त्रता…
संस्कृति,शान्ति,मनुष्यता…
ये सारे शब्द थे
सुनहरे वादे थे
खुशफ़हम इरादे थे
सुन्दर थे
मौलिक थे
मुखर थे
मैं सुनता रहा…
सुनता रहा…
सुनता रहा…
मतदान होते रहे
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।
वह हमें विश्वशान्ति के और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा। मैं खुद को
समझाता रहा-’जो मैं चाहता हूँ-
वही होगा। होगा-आज नहीं तो कल
मगर सब कुछ सही होगा।
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब की भीड़ बढ़ती रही।
चौराहे चौड़े होते रहे।
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज
खाकर-निरापद भाव से
बच्चे जनते रहे।
योजनायेँ चलती रहीं
बन्दूकों के कारखानों में
जूते बनते रहे।
और जब कभी मौसम
उतार पर होता था।
हमारा संशय
हमें कोंचता था।
हम उत्तेजित होकर
पूछते थे
यह क्या है?
ऐसा क्यों है?
फिर बहसें होतीं थीं
शब्दों के जंगल में
हम एक-दूसरे को काटते थे
भाषा की खाई को
जुबान से कम जूतों से
ज्यादा पाटते थे
कभी वह हारता रहा…
कभी हम जीतते रहे…
इसी तरह नोक-झोंक चलती रही
दिन बीतते रहे…
मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।
मेरा सारा धीरज
युद्ध की आग से पिघलती हुयी बर्फ में
बह गया।
मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह
मरे हुये साँपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़-टूटे हुये रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक
कोई मौसम नहीं है
लोग-
घरों के भीतर नंगे हो गये हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं
विधवायें तमगा लूट रहीं हैं
सधवायें मंगल गा रहीं हैं
वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ
अकाल का लंगर चला रही हैं
जगह-जगह तख्तियाँ लटक रहीं हैं-
‘यह श्मशान है,यहाँ की तश्वीर लेना
सख्त मना है।’
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।
फिर भी उस उजाड़ में
कहीं-कहीं घास का हरा कोना
कितना डरावना है
मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध- मठ
बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अखबार के मटमैले हासिये पर
लेटे हुये ,एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद ,नाम है
यह मेरा देश है…
यह मेरा देश है…
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ
जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहाँ हर तीसरी जुबान का मतलब-
नफ़रत है।
साज़िश है।
अन्धेर है।
यह मेरा देश है
और यह मेरे देश की जनता है
जनता क्या है?
एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है।
जनता क्या है?
एक शब्द…
सिर्फ एक शब्द है
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है
एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती-जाती हवा की जुबान में
हाँऽऽ..हाँऽऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से
डरता है।
गाँवों में गन्दे पनालों से लेकर
शहर के शिवालों तक फैली हुई
‘कथाकलि’ की अंमूर्त मुद्रा है
यह जनता…
उसकी श्रद्धा अटूट है
उसको समझा दिया गया है कि यहाँ
ऐसा जनतन्त्र है जिसमें
घोड़े और घास को
हर तरफ कुआँ है
हर तरफ खाई है
यहाँ,सिर्फ ,वह आदमी,देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है...
Cover Image Courtesy KHWAB TANHA COLLECTIVE
Cover: Irfan
Recorded, produced and published as a Podcast in 2008
Kya Tumne Kabhi Koi Sardar Bikhari Dekha ? | Swayam Prakash's short story recited by Irfan and Munish
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Details to support this Podcast Channel i.e. Listen with Irfan :-
Cover image Courtesy : IDesign
Cover: Irfan
Born on February 3, 1954 in Sulemapur, a small village of Azamagarh, Uttar Pradesh, Eish Mishra later studied in University of Allahabad
He recently was retired from Univesity of Delhi where he was a Professor in the Dept of Political Science.
This is an excerpt from a Guftagoo recorded on 22 March 2023 at Janchowk's editorial office, Delhi NCR
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Born in Baswa a small tehsil in Alwar Rajasthan on 6 March 1944 Mr RamSharan Joshi is a senior journalist, social activist and writer. He also chaired many important roles in Media and Journalism also in academics and social institutions.
Here is an excerpt from a recent 22 March 2023 recording which was done at Janchowk's editorial office in NCR.
Cover and Photo: Irfan
Recorded exclusively by Irfan with the help of KK Pandey on 21 April 2002, Gurugram
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Cover: Irfan
Inteqam (1969)
Sung by Mohammad Rafi
Lyricist Rajendra Krishan
Music Laxmikant Pyarelal
Copyright disclaimer 107
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Cover: Irfan
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