जाके उर उपजी नहिं भाई। सो क्या जाने पीर पराई।।
ब्यावर जाने पीर की सार। बांझ नार क्या लखे विकार।।
पतिब्रता पति को ब्रत जानै। बिभचारिन मिल कहा बखानै।।
हीरा पारख जौहरि पावै। मूरख निरख के कहा बतावै।।
लागा घाव कराहै सोई। कोतगहार के दर्द न कोई।।
रामनाम मेरा प्रान-अधार। सोई रामरस-पीवनहार।।
जन दरिया जानेगा सोई। प्रेम की भाल कलेजे पोई।।
जो धुनिया तो मैं भी राम तुम्हारा।
अधम कमीन जाति मतिहीना, तुम तो हौ सिरताज हमारा।।
काया का जंत्र, सब्द मन मुठिया, सुषमन तांत चढ़ाई।
गगन-मंडल में धुनिया बैठा, मेरे सतगुरु कला सिखाई।।
पाप-पान हरि कुबुधि-कांकड़ा, सहज-सहज झड़ जाई।
घुंडी गांठ रहन नहिं पावै, इकरंगी होए आई।।
इकरंग हुआ भरा हरि चोला, हरि कहै कहा दिलाऊं।
मैं नाहिं मेहनत का लोभी, बकसो मौज भक्ति निज पाऊं।।
किरपा करि हरि बोले बानी, तुम तो हौ मम दास।
दरिया कहै मेरे आतम भीतर, मेलौ राम भक्ति-बिस्वास।।
तुम रूप-राशि, मैं रूप-रसिक,
अवगुंठन खोलो, दर्शन दो!
मानस में मेरे आन बसो,
कुटिया मेरी जगमग कर दो!
युग-युग से प्यास लिए मन में,
फिरता आया इस-उस जग में,
ठहराव कहीं भी पा न सका,
अभिशप्त रहा हर जीवन में!
क्षणभंगुर रूप दिखा इत-उत,
हर जगती में, हर जीवन में,
तृष्णा-ज्वाला जलती ही रही,
हर जीवन में प्रतिपल मन में।
अब द्वार तुम्हारे आया हूं,
रूपसि, खोलो पट, दर्शन दो!
तुम रूप-राशि, मैं रूप-रसिक,
अवगुंठन खोलो, दर्शन दो!
मानस में मेरे आन बसो,
कुटिया मेरी जगमग कर दो!
हो मधुप कुसुम सा प्रणय-मिलन,
रसमय पीड़ा का उद्वेलन,
परिणय हो प्राप्ति कामना का,
प्राणों का प्राणों से मधुर मिलन!
सुन पाया मन तव आवाहन,
रससिक्त, मदिर, मृदु उदबोधन,
वंशी-ध्वनि का सा आवाहन,
ब्रज-वनिताओं सा उद्वेलन!
हर्षित पर शंकित, व्याकुल मन,
रूपसि, खोलो पट, दर्शन दो!
तुम रूप-राशि, मैं रूप-रसिक,
अवगुंठन खोलो, दर्शन दो!
मानस में मेरे आन बसो,
कुटिया मेरी जगमग कर दो!
युग-युग की संचित आशाएं,
प्रियकर पावन अभिलाषाएं,
चिर-सुख की सुंदर आशाएं,
चिर-शांति-मुक्ति अभिलाषाएं!
तन, मन, प्राणों की निधियां ले,
मृदु आदि-काल की सुधियां ले,
दे सकता जो, वह सब कुछ ले,
अपना जो कुछ, वह सब कुछ ले,
मैं अर्घ्य लिए द्वारे आया,
रूपसि, खोलो पट, दर्शन दो!
तुम रूप-राशि, मैं रूप-रसिक,
अवगुंठन खोलो, दर्शन दो!
मानस में मेरे आन बसो,