दरिया हरि किरपा करी, बिरहा दिया पठाए।
यह बिरहा मेरे साध को, सोता लिया जगाए।।
दरिया बिरही साध का, तन पीला मन सूख।
रैन न आवै नींदड़ी, दिवस न लागै भूख।।
बिरहिन पिउ के कारने, ढूंढ़न बनखंड जाए।
निस बीती, पिउ ना मिला, दरद रही लिपटाए।।
बिरहिन का घर बिरह में, ता घट लोहु न मांस।
अपने साहब कारने, सिसकै सांसों सांस।।
दरिया बान गुरुदेव का, कोई झेलै सूर सुधीर।
लागत ही ब्यापै सही, रोम-रोम में पीर।।
साध सूर का एक अंग, मना न भावै झूठ।
साध न छांड़ै राम को, रन में फिरै न पूठ।।
दरिया सांचा सूरमा, अरिदल घालै चूर।
राज थापिया राम का, नगर बसा भरपूर।।
रसना सेती ऊतरा, हिरदे किया बास।
दरिया बरखा प्रेम की, षट ऋतु बारह मास।।
दरिया हिरदे राम से, जो कभु लागै मन।
लहरें उट्ठें प्रेम की, ज्यों सावन बरखा घन।।
जन दरिया हिरदा बिचे, हुआ ग्यान परगास।
हौद भरा जहं प्रेम का, तहं लेत हिलोरा दास।।
अमी झरत, बिगसत कंवल, उपजत अनुभव ग्यान।
जन दरिया उस देस का, भिन-भिन करत बखान।।
कंचन का गिर देख कर, लोभी भया उदास।
जन दरिया थाके बनिज, पूरी मन की आस।।
मीठे राचैं लोग सब, मीठे उपजै रोग।
निरगुन कडुवा नीम सा, दरिया दुर्लभ जोग।।