क्या सोवै तू बावरी, चाला जात बसंत।।
चाला जात बसंत, कंत ना घर में आये।
धृग जीवन है तोर, कंत बिन दिवस गंवाये।।
गर्व गुमानी नारि फिरै जोवन की माती।
खसम रहा है रूठि, नहीं तू पठवै पाती।।
लगै न तेरो चित्त, कंत को नाहिं मनावै।।
कापर करै सिंगार, फूल की सेज बिछावै।।
पलटू ऋतु भरि खेलि ले, फिर पछतावै अंत।
क्या सोवै तू बावरी, चाला जात बसंत।। 7।।
ज्यौं-ज्यौं सूखै ताल है, त्यौं-त्यौं मीन मलीन।।
त्यौं-त्यौं मीन मलीन, जेठ में सूख्यो पानी।
तीनों पन गए बीति, भजन का मरम न जानी।
कंवल गए कुम्हिलाय, हंस ने किया पयाना।
मीन लिया कोऊ मारि, ठांय ढेला चिहराना।
ऐसी मानुष-देह वृथा में जात अनारी।
भूला कौल-करार आपसे काम बिगारी।।
पलटू बरस औ मास दिन, पहर घड़ी पल छीन।
ज्यौं-ज्यौं सूखै ताल है, त्यौं-त्यौं मीन मलीन।। 8।।
पिय को खोजन मैं चली, आपुइ गई हिराय।।
आपुइ गई हिराय, कवन अब कहै संदेसा।
जेकर पिय में ध्यान, भई वह पिय के भेषा।।
आगि-माहि जो परै, सोउ अगनी हवै जावै।
भृंगी कीट को भेंट, आपु सम लैइ बनावै।।
सरिता बहिकै गई, सिंध में रही समाई।
सिव सक्ती के मिले, नहीं फिर सक्ती आई।।
पलटू दिवाल कहकहा, मत कोउ झांकन जाय।
पिय को खोजन मैं चली, आपुइ गई हिराय।। 9।।