सोई सती सराहिये, जरै पिया के साथ।।
जरै पिया के साथ, सोई है नारि सयानी।
रहै चरन चित लाय, एक से और न जानी।।
जगत करै उपहास, पिया का संग न छोड़ै।
प्रेम की सेज बिछाय, मेहर की चादर ओढ़ै।
ऐसी रहनी रहै, तजै जो भोग-विलासा।
मारै भूख-पियास याद संग चलती स्वासा।।
रैन-दिवस बेहोस, पिया के रंग में राती।
तन की सुधि है नाहिं, पिया संग बोलत जाती।।
पलटू गुरु परसाद से किया पिया को हाथ।
सोई सती सराहिए, जरै पिया के साथ।। 13।।
तुझे पराई क्या परी, अपनी आप निबेर।।
अपनी आप निबेर, छोड़ि गुड़ विस को खावै।
कूवां में तू परै, और को राह बतावै।।
औरन को उजियार, मसालची जाय अंधेरे।
त्यों ज्ञानी की बात, मया से रहते घेरे।।
बेचत फिरै कपूर, आप तो खारी खावै।
घर में लागी आग, दौड़ के घूर बुतावै।
पलटू यह सांची कहै, अपने मन का फेर।
तुझे पराई क्या परी, अपनी आप निबेर।। 14।।
पलटू नीच से ऊंच भा, नीच कहै ना कोय।।
नीच कहै ना कोय, गये जब से सरनाई।
नारा बहिके मिल्यो गंग में गंग कहाई।।
पारस के परसंग, लोह से कनक कहावै।
आगि मंहै जो परै, जरै आगइ होइ जावै।।
राम का घर है बड़ा, सकल ऐगुन छिप जाई।
जैसे तिल को तेल, फूल संग बास बसाई।।
भजन केर परताप तें, तन-मन निर्मल होय।
पलटू नीच से ऊंच भा, नीच कहै न कोय।। 15।।