कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः।
अथ चिंतासह स्तस्मादेवमेवाहमास्थितः।। 107।।
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः।। 108।।
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये।
एवं विलोक्य नियमेवमेवाहमास्थितः।। 109।।
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषाद्योः।
अभावादद्य हे ब्रह्मान्नेबमेवाहमास्थितः।। 110।।
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम्।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरवमेवाहमास्थितः।। 111।।
कर्माऽनुष्ठानमज्ञामाद्यथैवोपरमस्तथा।
बुद्धवा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः।। 112।।
अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिंतारूपं भजत्यसौ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः।। 113।।
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ।। 114।।
तृषित मरुथल की कहानी
हो चुकी जग में पुरानी
किंतु वारिधि के हृदय की
प्यास उतनी ही अटल है।
हर जगह जीवन विकल है।
रो रहा विरही अकेला
देख तन का मिलन मेला
पर जगत में दो हृदय की
मिलन-आशा विफल है।
हर जगह जीवन विकल है।
अनुभवी इसको बताएं
व्यर्थ मत मुझसे छिपाएं
प्रेयसी के अधर-मधु में भी
मिला कितना गरल है।