इंकलाब ज़िंदाबाद, कुछ याद आता है इस नारे को सुनकर? कुछ जवान चेहरे, कुछ जोशीले तेवर या कुछ फांसी के फंदे?
मैं इसी नारे के इर्द गिर्द घूमती उन यादों में से एक याद, उन तेवरों में से एक तेवर और उन फंदों में झूल चुकी गर्दनों में से एक गर्दन हूं, मैं.... भगत सिंह हूं।
जी हां, मैं 23 साल का वही बच्चा हूं जो कभी बड़ा नहीं हो पाया मगर फांसी के लायक हो गया।
पॉडकास्ट 24 आवाज़ सबकी।
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