इस बजट में एक नए कालखंड का पता चला है जिसका नाम अमृत काल है. वित्त मंत्री ने बजट भाषण के चौथे पैराग्राफ में इसकी जानकारी देते हुए कहा है कहा है कि हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं और और अमृत काल में प्रवेश कर चुके हैं.
पेगासस जासूसी कांड विपक्ष और सरकार की राजनीतिक लड़ाई का मुद्दा नहीं है. गोदी मीडिया के ज़रिए आज कल हर गंभीर मुद्दे को जनता के बीच इस तरह खिचड़ी बनाकर पेश किया जा रहा है कि मूल सवाल खो जाता है.
30 जनवरी के मौके पर नौजवानों से सवाल होना चाहिए, कि उनके मन में किसी से नफरत करते हुए नायक बनने का ख्याल कहां से पैदा होता है? क्या वे जानते हैं कि गांधी को किसने मारा?
मध्य प्रदेश में हरदा के किसान ने 8 करोड़ रुपये का टमाटर बेचने का दावा है. इस पर इंटरव्यू लेने के लिए किसान के घर कृषि मंत्री पहुंच गए. क्योंकि वो कृषि मंत्री का गृह जिला है. लेकिन दूसरे कई जिलों में किसान पपीता और टमाटर की फसल लेकर बैठे हैं.
रेलवे की भर्ती परीक्षा को लेकर सड़क पर उतरे छात्रों को भी नफरत की हवा का नुकसान उठाना पड़ रहा है. नफरत की राजनीति में सीधे शामिल होने या साथ खड़े होने के कारण नौकरी के इनके आंदोलन को कोई गंभीरता से नहीं लेता है.
गौशालाओं के बनने पर 500 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी उत्तर प्रदेश के किसान आवारा मवेशियों से परेशान हैं. अपने फसलों को बचाने के लिए रात-रात भर इस ठंड में जाग रहे हैं. रवीश रंजन की ये रिपोर्ट देखिए...
क्या चुनावों के समय जाति और समुदाय के नेता ही नाराज होते हैं. उन्हें मनाने के नाम पर मंत्रियों की लाइन लगी रहती है, लेकिन नौकरी मांग रहे छात्रों को नाराज क्यों नहीं माना जाता है? उन्हें मनाने के लिए कोई मंत्री उनके हॉस्टल या प्रदर्शन में क्यों नहीं जाता है?
रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड की नॉन टेक्निकल पॉपुलर कैटेगरी (NTPC) की परीक्षा में गड़बड़ूी की शिकायत को लेकर बिहार में बेरोजगार युवाओं का विरोध प्रदर्शन आज भी जारी रहा. युवाओं ने नियुक्ति की प्रक्रिया को रद्द करने के लिए प्रदर्शन किया.
बेरोज़गारी विस्फोटक हो गई है. इसे फटने से धर्म का मुद्दा ही बचा सकता है क्योंकि उसी में इन नौजवानों को भटकाने की ताकत है. सांप्रदायिक होने के सुख के सामने बेरोज़गार होने का दुख कुछ भी नहीं है. इसलिए हर चुनाव में बेरोज़गारी का मुद्दा फुस्स हो जाता है.
जब भी चुनाव आता है, और स्वास्थ्य से लेकर रोज़गार पर बात करने का अवसर मिलता है, नेता और मीडिया बहस की दिशा को इतिहास और धर्म की तरफ मोड़ देते हैं. ग़लत इतिहास को सही करने के नाम पर अपने मन के हिसाब से ग़लत किए जा रहे हैं.