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पिछली कथा में हमने चित्रकूट की उस सभा में धर्म और तर्क का गहरा सामना देखा। हमने सुना कि कैसे जाबालि ने प्रत्यक्ष और भौतिक दृष्टि से राम को समझाने का प्रयास किया, और कैसे राम ने सत्य को सर्वोपरि रखकर उन सभी तर्कों का उत्तर दिया। हमने अनुभव किया कि राम के लिए सत्य ही ईश्वर है और पिता का वचन केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। हमने देखा कि अंत में सभी ऋषि और गुरु भी इसी मार्ग को स्वीकार करते हैं और भरत को अयोध्या लौटने का आदेश देते हैं।
आज की कथा उसी निर्णय के बाद आगे बढ़ती है। आज हम चित्रकूट के उस वन में प्रवेश करते हैं, जहाँ अब भी शांति है, लेकिन उस शांति के भीतर एक नई हलचल उठ रही है। आज हम उस क्षण के साक्षी बनेंगे, जब राम स्वयं अपने भीतर झाँकते हैं और सोचते हैं कि कहीं उनके कारण तो यह अशांति नहीं आई। हम सुनेंगे उनका वह विनम्र प्रश्न, जहाँ वे अपने आचरण को परखते हैं और ऋषियों से सत्य जानना चाहते हैं। फिर हम देखेंगे कि यह संकट किसी भूल का परिणाम नहीं, बल्कि आने वाले एक बड़े संघर्ष का संकेत है। आज की कथा हमें एक और महत्वपूर्ण अध्याय की ओर ले जाती है। आज हम देखेंगे कि जब राम, सीता और लक्ष्मण महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचते हैं, तब उनकी यात्रा केवल भौतिक नहीं रहती, वह आध्यात्मिक रूप ले लेती है। आज हम अत्रि और माता अनसूया जैसे महान तपस्वियों से मिलेंगे, जिनका जीवन केवल तप नहीं, बल्कि धर्म का जीवंत उदाहरण है। आज हम सीता और माता अनसूया के उस गहरे संवाद को सुनेंगे, जहाँ एक तपस्विनी स्त्री दूसरी को जीवन का मार्ग दिखाती है। हम समझेंगे कि पत्नी का धर्म क्या है और क्यों कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य पर अडिग रहना ही सच्ची शक्ति है। आज की कथा हमें यह सिखाएगी कि वनवास केवल कष्ट का मार्ग नहीं है, वह आत्मबल, धैर्य और धर्म की परीक्षा का मार्ग है। यह केवल शरीर की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। तो आइए, आगे बढ़ते हैं उस शांत आश्रम की ओर, जहाँ तप की अग्नि में तपकर जीवन का सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है, और जहाँ सीता को एक नई शक्ति, एक नई दिशा मिलने वाली है।
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पिछली कथा में हमने चित्रकूट के उस वन में प्रेम, त्याग और धर्म का सर्वोच्च रूप देखा। हमने अनुभव किया कि कैसे भरत ने राम की चरण-पादुका को अपने सिर पर धारण किया और स्वयं को केवल सेवक मान लिया। हमने देखा कि विदाई का वह क्षण कितना मार्मिक था, जहाँ माता कैकेयी का पश्चाताप, राम की करुणा, माता कौशल्या का स्नेह और सीता का धैर्य एक साथ प्रकट हुआ। उस कथा ने हमें यह सिखाया कि सच्चा प्रेम केवल मिलन में नहीं, वियोग में भी उतना ही गहरा होता है।
आज की कथा उसी क्षण से आगे बढ़ती है। आज हम चित्रकूट के उसी सभा में प्रवेश करते हैं, जहाँ एक नया प्रश्न खड़ा होता है। आज हम देखेंगे कि जब जाबालि जैसे ज्ञानी व्यक्ति तर्क और प्रत्यक्ष के आधार पर राम को समझाने का प्रयास करते हैं, तब धर्म की कसौटी कैसी होती है। आज हम सुनेंगे वह संवाद, जहाँ एक ओर भौतिक सोच है, जो केवल दिखने वाले को सत्य मानती है, और दूसरी ओर राम हैं, जो सत्य को ही ईश्वर मानते हैं। हम देखेंगे कि कैसे राम तर्कों का उत्तर केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने अटल संकल्प और जीवन के आदर्श से देते हैं। आज हम समझेंगे कि सत्य का महत्व क्या है, और क्यों एक राजा का आचरण पूरे समाज का मार्ग बन जाता है। हम अनुभव करेंगे कि राम के लिए वनवास कोई दंड नहीं, बल्कि एक पवित्र वचन है। फिर हम देखेंगे कि इस संवाद के बाद कैसे सभी ऋषि और गुरु इस सत्य को स्वीकार करते हैं और भरत को अयोध्या लौटने का मार्ग दिखाते हैं। आज की कथा हमें यह सिखाएगी कि जब तर्क और धर्म आमने-सामने खड़े होते हैं, तब सच्चा मार्ग वही होता है जो सत्य और मर्यादा पर आधारित हो। तो आइए, चलते हैं चित्रकूट की उस सभा में, जहाँ एक ओर प्रश्न उठता है और दूसरी ओर राम उसका उत्तर बनकर खड़े हैं।
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पिछली कथा में हमने चित्रकूट के उस वन में एक अद्भुत परिवर्तन देखा। हमने अनुभव किया कि कैसे शोक से भरा हुआ वातावरण धीरे-धीरे प्रेम और शांति में बदल गया। हमने देखा कि भरत का निस्वार्थ समर्पण और राम का अटूट विश्वास किस प्रकार धर्म का मार्ग प्रशस्त करते हैं। हमने जनक के आगमन का वह मार्मिक दृश्य देखा, जहाँ शोक और शांति का संगम हुआ। और फिर हमने अनुभव किया कि कैसे वही वन, जहाँ आँसू थे, वह आनंद का स्थान बन गया, जहाँ चार दिन ऐसे बीत गए जैसे समय थम गया हो।
आज की कथा उसी परिवर्तन के बाद आगे बढ़ती है। आज हम उस सुबह में प्रवेश करते हैं, जहाँ शब्द कम हैं और भाव अधिक। आज सभा मौन है क्योंकि सभी जानते हैं अब विदा का समय निकट है। आज हम देखेंगे वह क्षण जहाँ प्रेम वियोग के रूप में अपने सबसे कठिन रूप में प्रकट होता है । हम देखेंगे कि कैसे भरत, अपने भैया के सामने विनम्र होकर आज्ञा माँगते हैं और कैसे राम उन्हें धर्म और कर्तव्य का गहरा मार्ग समझाते हैं। आज हम राजधर्म का सार सुनेंगे, सेवक और स्वामी के उस संबंध को समझेंगे, जो केवल शब्द नहीं, जीवन का सत्य है। फिर हम उस पवित्र क्षण के साक्षी बनेंगे जब राम अपनी चरण-पादुका भरत को सौंपते हैं और भरत उन्हें अपने सिर पर धारण करते हैं। यह केवल एक प्रतीक नहीं है, यह समर्पण की पराकाष्ठा है । आज हम देखेंगे कि कैसे विदाई का दुख असहनीय हो जाता है और कैसे उसी समय ईश्वर की कृपा उस दुख को सहने की शक्ति भी देती है। हम माता कैकेयी का पश्चाताप, राम की करुणा, माता कौशल्या का स्नेह, सीता का धैर्य और माता सुमित्रा का गर्व देखेंगे । आज की कथा हमें यह सिखाएगी कि सच्चा प्रेम केवल मिलन में नहीं वियोग में भी उतना ही गहरा होता है ।
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पिछली कथा में हमने चित्रकूट के उस शांत वन में शोक की गहराई को अनुभव किया। हमने देखा कि कैसे महाराज दशरथ के वियोग ने राम को एक व्याकुल पुत्र बना दिया। हमने गुरु वशिष्ठ का मार्गदर्शन देखा, जहाँ शोक को कर्म में बदल दिया गया। हमने सीता का धैर्य और उर्मिला का मौन त्याग भी अनुभव किया। उस कथा ने हमें यह समझाया कि वनवास केवल राम की नहीं, पूरे परिवार की परीक्षा है।
आज की कथा उसी भाव से आगे बढ़ती है। आज हम प्रवेश करते हैं उस चित्रकूट में जहाँ शोक अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उसके बीच एक नया प्रश्न खड़ा हो गया है। धर्म क्या है? और प्रेम क्या चाहता है? आज हम देखेंगे वह सभा, जहाँ एक ओर राम खड़े हैं और दूसरी ओर भरत। आज हम सुनेंगे भरत का हृदय जहाँ प्रेम है, पश्चाताप है, और अपने भैया को वापस लाने की तीव्र इच्छा है। हम देखेंगे कि कैसे राम भरत की महिमा बताते हैं और कैसे वे स्वयं निर्णय भरत पर छोड़ देते हैं। यहीं से कथा एक नया मोड़ लेती है, जहां हम देखेंगे कि देवता भी इस निर्णय से चिंतित हो उठते हैं और फिर गुरु बृहस्पति का ज्ञान उन्हें शांत करता है। फिर हम भरत का वह समर्पण देखेंगे जहाँ वे अपने लिए नहीं केवल राम के लिए सोचते हैं। और फिर कथा हमें राजा जनक का आगमन की ओर ले जाएगी। हम देखेंगे शोक और शांति का वह संगम, जहाँ आँसू भी हैं और प्रेम भी। जहाँ राजा जनक जैसा ज्ञानी भी राम के प्रेम में डूब जाता है। फिर हम देखेंगे कि कैसे ऋषि वशिष्ठ सबको धैर्य का मार्ग दिखाते हैं। और कैसे धीरे-धीरे वही वन जो दुख से भरा था वह आनंद का स्थान बन जाता है। और जहाँ चार दिन ऐसे बीत जाते हैं, जैसे समय थम गया हो। आज की कथा हमें यह समझाएगी कि सच्चा सुख स्थान में नहीं होता, सच्चा सुख संग में होता है। तो आइए चलते हैं चित्रकूट की उस सभा में जहाँ भरत अपने हृदय की सारी पीड़ा लेकर खड़े हैं और राम शांत होकर उन्हें सुन रहे हैं।
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पिछली कथा में हमने देखा कि चित्रकूट की पावन भूमि पर भाइयों का मिलन हुआ। हमने देखा कि कैसे भरत अपराधबोध से व्याकुल होकर राम के चरणों में गिर पड़े। हमने सुना कि कैसे राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगाया। हमने अनुभव किया कि राजधर्म केवल शासन नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। और फिर हमने वह वज्रपात समान समाचार सुना कि महाराज दशरथ पुत्र-वियोग सह न सके और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
आज की कथा उसी क्षण से आगे बढ़ती है। आज चित्रकूट का वन शांत है। पर यह शांति साधारण नहीं है। यह शोक की शांति है। यह उस पुत्र के हृदय की शांति है, जो भीतर से टूट चुका है। आज हम देखेंगे कि जब राम को अपने पिता के देहत्याग का समाचार मिलता है, तब धैर्य का पर्वत भी कैसे कांप उठता है। हम सुनेंगे उस पुत्र की करुण पुकार, जो कहता है, “मैं अंतिम क्षणों में आपके समीप क्यों न था?” हम देखेंगे कि गुरु का मार्गदर्शन कैसे शोक को कर्म में बदल देता है। हम अनुभव करेंगे कि एक साधारण इंगुदी फल से बना पिंड भी कितनी गहरी सच्चाई प्रकट करता है। आज माता कौशल्या का हृदय बोलेगा। वे अपने पुत्रों का वनजीवन देखेंगी। वे उस पिंड को देखेंगी और स्मरण करेंगी कि कभी अयोध्या का सम्राट कैसा वैभव भोगता था। आज सीता का धैर्य भी प्रकट होगा। वे बताएँगी कि सुख और दुःख में परिवार के साथ चलना ही उनका धर्म है। और फिर आज हम एक और मौन त्याग को सुनेंगे। हम सुनेंगे उर्मिला का प्रश्न। हम सुनेंगे लक्ष्मण का उत्तर। हम जानेंगे कि वनवास केवल राम की परीक्षा नहीं है। यह लक्ष्मण का पुरुषार्थ की भी परीक्षा है। यह उर्मिला का मौन तप भी है। आज की कथा में आँसू हैं। आज की कथा में आशीर्वाद है। आज की कथा में त्याग है। और आज की कथा में वह गहरा प्रेम है, जो शब्दों से अधिक मौन में प्रकट होता है। तो आइए, आरंभ करते हैं चित्रकूट के उस शांत वन से जहाँ वृक्ष स्थिर हैं, पवन धीमे बह रही है, और एक पुत्र अपने पिता के वियोग में मस्तक झुकाए खड़ा है।
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पिछली कथा में हमने देखा कि चित्रकूट की भूमि पर प्रेम और संदेह आमने-सामने खड़े थे। हमने अनुभव किया कि कैसे लक्ष्मण का प्रेम रौद्र रूप धारण कर लेता है, और कैसे राम अपने शांत विश्वास से उस अग्नि को शीतल कर देते हैं। हमने सुना कि राम ने भरत की महिमा को किस प्रकार शब्द दिए, उन्हें विवेक रूपी हंस कहा, और यह घोषित किया कि संसार में उनके समान निष्कलंक हृदय दूसरा नहीं हैं।
आज की कथा उस क्षण से आगे बढ़ती है जब दूरी समाप्त होने वाली है, जब प्रतीक्षा समाप्ति की ओर है, और जब मिलन केवल भाव नहीं, इतिहास बनने जा रहा है। आज हम देखेंगे कि कैसे राम स्वयं अपने भाई के लिए वनदेवी से प्रार्थना करते हैं। कैसे एक मार्ग, जो काँटों और पत्थरों से भरा था, करुणा के स्पर्श से समतल हो जाता है। आज हम उस दृश्य के साक्षी बनेंगे, जब भरत पहली बार चित्रकूट की कुटिया को देखते हैं। जब वे राजसभा के योग्य राम को जटाजूट और वल्कल में पाते हैं। जब उनका हृदय अपराधबोध से फट पड़ता है। जब पुकारते-पुकारते वे चरणों में गिर पड़ते हैं, और राम उन्हें उठाकर हृदय से लगा लेते हैं। पर आज की कथा यहीं नहीं रुकती। आज राम केवल भाई नहीं रहेंगे, वे गुरु बनेंगे। वे भरत से राजधर्म के प्रश्न करेंगे। वे बताएँगे कि राज्य शक्ति नहीं, उत्तरदायित्व है; न्याय केवल व्यवस्था नहीं, धर्म है। और फिर आज भरत राम को वह वज्रपात जैसी समाचार सुनाएंगे, जहां अपने पुत्र से अलग होने के बाद महाराज दशरथ पुत्र वियोग की अग्नि में तड़पकर अपने प्राण त्याग देते हैं। आज की कथा में प्रेम है, धर्म है, शोक है, और त्याग की पराकाष्ठा भी है। तो आइए, आरंभ करते हैं चित्रकूट के उस सघन वन से, जहाँ मार्ग कंटीला है, पर हृदय करुणा से भरा है; जहाँ वनदेवी स्वयं प्रकट होती हैं, और जहाँ मिलन केवल आलिंगन नहीं, एक युग का निर्णय बन जाता है।
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पिछली कथा में हमने देखा कि भरत की पदयात्रा कैसे केवल एक भौतिक यात्रा नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और आत्मदंड की साधना बन गई थी। हमने देखा कि कैसे अयोध्या का समस्त समाज उनके साथ तप और संयम का मार्ग अपनाता है, कैसे निषादराज की सेवा में राम-भक्ति प्रकट होती है, और कैसे गंगा माँ के तट पर भरत संसार के सभी पुरुषार्थों को त्यागकर केवल एक ही वरदान माँगते हैं, राम के चरणों में अटूट प्रेम। हम भरद्वाज आश्रम में उस क्षण के साक्षी बने, जहाँ भरत का हृदय टूटकर शब्दों में बह निकला, और जहाँ यह स्पष्ट हो गया कि राम और सीता की दृष्टि में भरत अपराधी नहीं, बल्कि प्रेम की आधारशिला हैं।
आज की कथा वहीं से आगे बढ़ती है, जब भरत चित्रकूट के समीप पहुँच चुके हैं, जब प्रेम अब दूरी नहीं सह पा रहा, और जब यह निकटता ही एक नई परीक्षा बन जाती है। आज हम देखेंगे वह भोर, जब सीता एक ऐसा स्वप्न देखती हैं, जो उसके मन में शक तो पैदा करता है लेकिन उसे अपने प्रियजनों से मिलने की उम्मीद भी देता है। आज लक्ष्मण का प्रेम रौद्र रूप धारण करेगा, वह प्रेम, जो रक्षा करना चाहता है, पर संदेह में जल उठता है। और फिर आज की कथा हमें उस शांत, पर अडिग राम तक ले जाएगी, जो राजमद की भयावहता स्वीकार करते हुए भी भरत की पवित्रता पर अचल विश्वास रखते हैं। जो भरत को विवेक रूपी हंस कहते हैं। और जिनके मुख से निकली भरत की महिमा सुनकर देवता भी स्वीकार करते हैं कि यदि भरत न होते, तो पृथ्वी पर धर्म का भार उठाने वाला कोई न बचता। तो आइए, आज की कथा आरंभ करते हैं, उस क्षण से, जहाँ प्रेम और संदेह आमने-सामने खड़े हैं; जहाँ लक्ष्मण का क्रोध परीक्षा ले रहा है; और जहाँ राम का विश्वास इतिहास को दिशा देने वाला है।
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पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे भरत का हृदय अपराधबोध, प्रेम और पश्चात्ताप की अग्नि में जल रहा था। सिंहासन उनके सामने था, पर वह उनके लिए वह काँटों की सेज बन चुका था। राम के बिना अयोध्या उन्हें शून्य लग रही थी, और सीता के कष्ट का विचार उन्हें भीतर तक तोड़ रहा था। हमने सुना कि कैसे भरत ने स्वयं को इस समस्त अनर्थ का कारण मान लिया, कैसे उन्होंने अपने मन को धिक्कारा, और कैसे मुनि वशिष्ठ ने उन्हें समझाया कि यह सब किसी एक मनुष्य का दोष नहीं, बल्कि विधि का विधान है।
आज की कथा उसी संकल्प की यात्रा है। आज हम देखेंगे अयोध्या की वह अद्भुत यात्रा, जहाँ राजा और प्रजा, माता और सेवक, सब भोग-विलास छोड़कर तप और संयम का मार्ग अपनाते हैं। कैसे भरत स्वयं पैदल चलने का व्रत लेते हैं, और कैसे माता कौशल्या उन्हें रथ पर बैठने के लिए इसलिए कहती हैं, ताकि प्रजा स्वयं को और दंड न दे। आज की कथा हमें श्रृंगवेरपुर ले जाएगी, जहाँ राम के सखा निषादराज गुह के हृदय में संदेह और भक्ति एक साथ जाग उठते हैं। हम देखेंगे वह अलौकिक मिलन, जहाँ एक राजा एक वनवासी को गले लगाता है, और समाज के सारे भेद राम के नाम में गल जाते हैं। फिर कथा पहुँचेगी गंगा के तट पर, प्रयागराज की त्रिवेणी में, जहाँ भरत संसार के चारों पुरुषार्थों को त्यागकर केवल एक वरदान माँगते हैं, राम के चरणों में अटूट प्रेम। और अंत में, हम मुनि भरद्वाज के आश्रम में उस क्षण के साक्षी बनेंगे, जहाँ भरत की पीड़ा शब्द बनकर बहती है, जहाँ सीता के दुःख की स्मृति उन्हें तोड़ देती है, और जहाँ मुनि उन्हें यह आश्वासन देते हैं कि राम और सीता उन्हें दोषी नहीं, अपने प्रेम का आधार मानते हैं। तो आइए, आज की कथा आरंभ करते हैं, उस यात्रा से, जो सिंहासन से नहीं, राम के चरणों से होकर गुजरती है; और उस भरत से, जो इतिहास के आरोप से नहीं, प्रेम और धर्म के प्रकाश से अपना मार्ग रच रहा है।
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पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे अयोध्या शोक के अंधकार में डूबी हुई थी। राजा दशरथ के देहावसान के बाद सिंहासन सूना था, और महल में केवल मौन और पीड़ा शेष रह गई थी। भरत अयोध्या लौटे तो उनका स्वागत उल्लास से नहीं, बल्कि टूटे हुए हृदयों से हुआ। कैकेयी के शब्दों से राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास का सत्य प्रकट हुआ, और पिता के निधन का समाचार भरत के जीवन पर वज्रपात बनकर गिरा।
आज की कथा वहीं से आगे बढ़ती है, जहाँ शोक के बीच धर्म खड़ा है, और अपराधबोध के बीच त्याग जन्म ले रहा है। हम देखेंगे कि कैसे गुरु वशिष्ठ और महर्षि वामदेव, भरत को कर्तव्य का मार्ग दिखाते हैं। कैसे पिता के अंतिम संस्कार के साथ-साथ, भरत अपने भीतर के अहं और मोह का भी संस्कार करते हैं। कैसे राजसभा में उन्हें सिंहासन स्वीकार करने का आग्रह किया जाता है, और कैसे भरत, उदाहरणों और आँसुओं के बीच, स्पष्ट शब्दों में कह देते हैं कि राम के बिना अयोध्या का राज्य उनके लिए शून्य है। आज की कथा में हम भरत का वह रूप देखेंगे, जो स्वयं को पापों का घर कहने से भी नहीं हिचकता, जो राज्य को बोझ और राम की सेवा को ही अपना कल्याण मानता है। हम सुनेंगे उनके वे वचन, जो शोक में डूबी अयोध्या के लिए औषधि बन जाते हैं, और देखेंगे कि कैसे शत्रुघ्न का समर्थन और सुमित्रा का मौन गर्व इस त्याग को और भी पवित्र बना देता है। और अंत में, हम उस क्षण के साक्षी बनेंगे जब यह निर्णय होता है कि सिंहासन की नहीं, वन की ओर यात्रा होगी। तो आइए, आज की कथा आरंभ करते हैं, उस राजसभा से, जहाँ भरत का हृदय इतिहास के दोष से नहीं, धर्म की ज्योति से प्रकाशित होने वाला है, और जहाँ अयोध्या पहली बार समझती है कि राम केवल वन में नहीं हैं, वे भरत के भीतर भी जीवित हैं।
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पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे वन की पवित्र भूमि पर, महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में, राम, सीता और लक्ष्मण का वह दिव्य मिलन हुआ जिसने रामकथा को उसका सबसे प्रामाणिक स्वर दिया। वहाँ राम ने अपना हृदय खोलकर कहा, सीता ने संकोच और धैर्य के साथ आशीर्वाद माँगा, और महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें संरक्षण, प्रेम और सत्य का वचन दिया। चित्रकूट का मार्ग निश्चित हुआ, और वनवास का एक स्थिर अध्याय आरंभ होने को था।
पर उसी समय, अयोध्या में सब कुछ स्थिर नहीं था। आज की कथा हमें उस नगर की ओर ले जाती है, जहाँ राम के बिना सिंहासन सूना था, जहाँ दीप जल रहे थे पर प्रकाश नहीं था, और जहाँ राजा दशरथ के प्राण त्याग के बाद पूरा नगर शोक में डूबा हुआ था। गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन में दूत भेजे गए, और भरत तथा शत्रुघ्न को बिना कारण बताए अयोध्या लौटने को कहा गया। पर नियति अपने संकेत पहले ही भेज चुकी थी, केकय देश में भरत के स्वप्न अशुभ थे, मन व्याकुल था, और हृदय किसी अनजाने भय से घिरा हुआ था। जैसे ही भरत अयोध्या की सीमा पर पहुँचे, उन्होंने नगर को पहचान लिया और फिर भी पहचान नहीं पाए। जहाँ कभी उल्लास था, वहाँ अब मौन था। जहाँ कभी मंगल था, वहाँ अब शोक छाया हुआ था। आज की कथा उस क्षण से आरंभ होती है, जब भरत अयोध्या लौटते हैं, रानी कैकेयी के शब्द उनके कानों में पड़ते हैं, राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास का रहस्य खुलता है, और पिता के देहावसान का समाचार उनके हृदय को चीर देता है। यहीं हम देखेंगे भरत का पश्चात्ताप, उनका क्रोध, उनका टूटना, और साथ ही देखेंगे रानी कौशल्या का वह वात्सल्य, जो बिना किसी दोषारोपण के, एक पुत्र को ऐसे अपनाता है मानो स्वयं राम लौट आए हों। तो आइए, आज की कथा आरंभ करते हैं, अयोध्या के उसी शोकाकुल महल में, जहाँ इतिहास भरत को दोषी ठहराने को तैयार है, पर धर्म भरत को एक ऐसे मार्ग पर ले जाने वाला है जो राजसिंहासन से नहीं, राम के चरणों से होकर गुजरता है।
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