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पेड़ ईंटों के,
पहाड़ प्लास्टिक के,
जंगल सीमेंट के,
हमने प्रकृति तक को विकसित कर दिया।
पानी की क्या परवाह करना,
वो तो फैक्ट्रियों में बना लेंगे।
हमें सिर्फ बच्चों के आर्थिक भविष्य,
और भौतिक सुखों की चिंता करनी चाहिए।
उदासी जीवन रस सोख लेती है।
दिल पर बुरा असर डालती है।
मुद्दे असली है या नहीं,
हमें क्या फर्क पड़ता है?
गलती करके परेशान न हों..
मनुष्य है ही गलतियों का पुतला..
सीख,सबक, सुधार के सिवाय..
कुछ और भी बेहतर हो सकता है।
देर नहीं, तो अन्धेर कैसे हो?
अन्धेर नहीं, तो आश्वासन कैसे हो?
आश्वासन नहीं, तो भाषण कैसे हो?
भाषण नहीं, तो शासन कैसे हो, प्रशासन कैसे हो?
वीरता नहीं दिखाना कायरों का काम है,जो हम कतई नहीं हैं।
सीमा पर नहीं भेजोगे तो गली - मुहल्ले - शहर, जहां हम हैं उसी को रणक्षेत्र बना बहादुरी दिखा देंगे।
खून है तो खौलेगा ही।
बुद्धि ने उसे बेवकूफ बनाया,
उसने कायनात को बेवकूफ बनाया।
सबको जीतने के चक्कर में,
स्वयं से हारता चला गया।
सुखी होने के लिए खूब दुःख दिये खुद को,
इतने दुःख पा कर कैसे सुखी हो सकता था।
दिमाग का दही कर दिया इन विज्ञापन बना कर माल बेचने वालों ने। होने और दिखाने में जमीन आसमान से कम का अंतर नहीं होता।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की गर्दन इनके शिकंजे में है और उससे चिपके रहने के कारण हमारी भी।
ये बेवकूफ समझ कर बेवकूफ बनाते हैं या बेवकूफ बना कर बेवकूफ समझते हैं।
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