Rog Nivaran Suktam रोगनिवारण सूक्तम् ★
उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः । उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुनः ॥ १ ॥
द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः ।
दक्षं ते अन्य आवातु व्यन्यो वातु यद्रपः ॥२ ॥
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः।
त्वं हि विश्वभेषज देवानां दूत ईयसे ॥ ३ ॥
त्रायन्तामिमं देवास्त्रायन्तां मरुतां गणाः ।
त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत् ॥ ४ ॥
आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टतातिभिः
दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते ॥५॥
अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तरः ।
अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः ॥ ६ ॥
हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी
अनामयित्नुभ्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृशामसि ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ :
हे देवो! हे देवो! आप नीचे गिरे हुए को फिर निश्चयपूर्वक ऊपर उठाओ। हे देवो! हे देवो! और पाप करनेवाले को भी फिर जीवित करो, जीवित करो ॥१ ॥
ये दो वायु हैं। समुद्रसे आनेवाला वायु एक है और दूर भूमिपर से आनेवाला दूसरा वायु है। इनमें से एक वायु तेरे पास बल ले आये और दूसरा वायु जो दोष है, उसे दूर करे ॥ २ ॥
हे वायु! ओषधि यहाँ ले आ। हे वायु! जो दोष है, वह दूर कर। हे सम्पूर्ण ओषधियोंको साथ रखने वाले वायु! निःसन्देह तू देवोंका दूत जैसा होकर चलता है, जाता है, बहता है ॥ ३ ॥
हे देवो! इस रोगी की रक्षा करो। हे मरुतों के समूहो! रक्षा करो। सब प्राणी रक्षा करें। जिससे यह रोगी रोग-दोष रहित हो जाय ॥ ४ ॥
आपके पास शान्ति फैलानेवाले तथा अविनाशी करने वाले साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिये प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर कर भगा देता हूँ ॥ ५ ॥
मेरा यह हाथ भाग्यवान् है। मेरा यह हाथ अधिक भाग्यशाली है। मेरा यह हाथ सब औषधियों से युक्त है और यह मेरा हाथ शुभ स्पर्श देने वाला है ॥ ६ ॥
दस शाखावाले दोनों हाथों के साथ वाणी को आगे प्रेरणा करने वाली मेरी जोभ है। उन नीरोग करने वाले दोनों हाथों से तुझे हम स्पर्श करते हैं ॥७॥