Shamsher Ali

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By Shamsher AliScienceSocial Sciences
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Shamsher Ali episodes

  • Gandhi Agar Aaj Zinda Hote Toh Kya Karte?
    Gandhi Agar Aaj Zinda Hote Toh Kya Karte? कास के साथ सोचने वाली बातें कितनी अच्छी लगती हैं जैसे कास ऐसा होता कास वैसा होता तो क्या होता?
    तो चलिये एक काल्पनिक कास की तरफ चलते हैं और सोचते हैं कि काश अगर महात्मा गाँधी जिंदा होते तो क्या होता? वो क्या कर रहे होते और कहाँ होते?
    मैं दावे के साथ यह बात कहता हूँ कि अगर महात्मा गाँधी आज जीवित होते तो जेल में होते!
    क्योंकि जिस स्वराज की बात वो करते थे, जिस असली आजादी की वो बात करते थे वो हमें आज भी नहीं मिली है।
    तो ये बात पक्की है कि इसके लिए वो सड़कों पर होते, गिरफ्तार होते और जेल भेजे जाते!
    3 min
  • Sher Shah Suri an ideal administrator
    Sher Shah Suri an ideal administrator: पांच साल में क्या कुछ कर सकता है एक हाकिम, यदि वह चाह ले तो... शेरशाह का जन्म पंजाब में स्थित बजवाड़ा नामक गांव में हुआ था। उनके पिता हसन खाँ सासाराम (बिहार) के जागीरदार थे।
    शेर शाह ने 1540 ई. में मुगल सम्राट हुमायूं को हराकर उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य की स्थापना की।
    शेर शाह सूरी ने पाँच साल, पाँच दिन राज किया था।
    इस बीच वो 31 महीने युद्धों के कारण राजधानी दिल्ली से दूर रहे। बावजूद इन युद्धों के, इन पाँच सालों में उन्होंने जो जो कर दिखाया, आईये उस पर एक नज़र डालते हैं:
    4 min
  • Third Battle of Panipat: जब 12 घंटे में मारे गए थे डेढ़ लाख सैनिक और मराठा सेना को मिली थी करारी हार
    Third Battle of Panipat: जब 12 घंटे में मारे गए थे डेढ़ लाख सैनिक और मराठा सेना को मिली थी करारी हार भारत के इतिहास में 14 जनवरी की तारीख का एक खास महत्व है. 1761 में 14 जनवरी के दिन अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली की सेना और मराठों के बीच पानीपत की तीसरी लड़ाई (Third Battle of Panipat) हुई थी. इस युद्ध को 18वीं सदी के सबसे भयंकर युद्ध के रूप में याद किया जाता है, जिसमें मराठों को हार का सामना करना पड़ा. इस लड़ाई में एक ही दिन में हजारों लोगों की मौत हुई और मराठों के बढ़ते साम्राज्य विस्तार पर न सिर्फ रोक लग गई बल्कि औरंगजेब की मौत के बाद कमजोर हुए मुगलिया शासन के स्थान पर देश में भगवा परचम लहराने की संभावनाएं भी धूल में मिल गईं.
    3 min
  • Happy Lohari: दुल्ला भट्टी न होते तो लाहौर, लाहौर न होता और तो और लोहड़ी भी न होती
    Happy Lohari: दुल्ला भट्टी न होते तो लाहौर, लाहौर न होता और तो और लोहड़ी भी न होती. दुल्ला भट्टी न होते तो लाहौर, लाहौर न होता. सलीम कभी जहांगीर न हो पाता. मिर्जा-साहिबा के किस्सों में संदल बार न आता. पंजाब वाले दुल्ले दी वार न गाते और जानो कि लोहड़ी भी न होती.
    वाघा बॉर्डर से लगभग 200 किलोमीटर पार, पाकिस्तान के पंजाब में पिंडी भट्टियां है. वहीं लद्दी और फरीद खान के यहां 1547 में हुए राय अब्दुल्ला खान, जिन्हें दुनिया अब दुल्ला भट्टी बुलाती है. राजपूत मुसलमान थे वो. उनके पैदा होने से चार महीने पहले ही उनके दादा संदल भट्टी और बाप को हुमायूं ने मरवा दिया था. खाल में भूसा भरवा के गांव के बाहर लटकवा दिया था. वजह ये कि मुगलों को लगान देने से मना कर दिया था. संदल भट्टी वो जिनके नाम पर नाम पड़ा था, संदल बार. संदल बार जिसका जिक्र मिर्जा-साहिबा के किस्सों में आता है, पंजाब के लोकगीतों में आता है. दुल्ला भट्टी उस जमाने के रॉबिनहुड थे. अकबर उन्हें डकैत मानता था. वो अमीरों से, अकबर के जमींदारों से, सिपाहियों से सामान लूटते. गरीबों में बांटते. अकबर की आंख की किरकिरी थे. इतना सताया कि अकबर को आगरे से राजधानी लाहौर शिफ्ट करनी पड़ी.
    3 min
  • 5 जनवरी 1592 को उस मुगल बादशाह का जन्म, जिसने दुनिया के लिए प्रेम का प्रतीक "TajMahal" बनाया - Ali
    पांच जनवरी 1592 को जुमेरात (गुरुवार) के दिन जहांगीर की बेगम ने एक बेटे को जन्म दिया। जहांगीर ने अपने पिता अकबर से उसके बेटे का नाम रखने की इच्छा जताई। अकबर ने उसे खुर्रम बुलाया। फारसी में खुर्रम का मतलब होता है खुशी। पैदाइश के छठवें दिन खुर्रम को अकबर की बेगम रुकैया के हवाले कर दिया गया। क्योंकि बेगम रुकैया की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उसने खुर्रम को गोद ले लिया।
    अकबर खुर्रम के दादा थे। खुद अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने खुर्रम को तालीम दिलवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही बढ़िया उस्तादों से उसे जंग के सबक भी सिखवाए। अकबर का खुर्रम से इतना लगाव हो गया था कि वो जंग में खुर्रम को भी साथ ले जाने लगे। यहीं से सफर शुरू हुआ खुर्रम के 'शाहजहां' बनने का।
    4 min
  • Fatima Sheikh: फ़ातिमा शेख़, सावित्री बाई फुले के साथ वंचितों को शिक्षित करने वाली सहयोगी शिक्षिका!
    Fatima Sheikh: फ़ातिमा शेख़, सावित्री बाई फुले के साथ वंचितों को शिक्षित करने वाली सबसे मज़बूत सहयोगी और साथी शिक्षिका! आमतौर पर हम अपने पुरखों यानी मर्दों के काम और समाजी योगदान के बारे में ख़ूब जानते हैं. चाहे घर हो या समाज या फिर देश… सदियों से मर्दों के किए गए को ही असली काम और योगदान माना गया. घर में संकटों से बेड़ा पार लगाने वाली महिलाओं को कोई याद नहीं करता. ठीक उसी तरह समाज और देश को बनाने में अपने को आहूत कर देने वाली ज़्यादातर महिलाएं भी गुमनाम रह जाती हैं. हम उदाहरण के तौर पर कुछ महिलाओं के नाम ज़रूर गिना सकते हैं. मगर ये कुछ नाम ही होंगे. हज़ारों के बारे में हमें बस बेनाम ज़िक्र ही मिलता है. कई के बारे में तो बेनामी ज़िक्र भी नहीं मिलता है. कुछ के नाम पता हैं लेकिन उनके काम का कोई लेखा-जोखा नहीं मिलता है.
    यही नहीं, कई मामलों में स्त्री ने ख़ुद अपने या अपनी साथी महिलाओं के बारे में न लिखा होता तो अनेक पुरखिनों के तो नामोनिशान भी न मिलते.
    जी, बतौर भारतीय मर्दाना समाज, हम ऐसे ही हैं.
    इतिहास में जहां पहला स्कूल खोलने का श्रेय ज्योतिबा फुले को दिया जाता है तो पहली शिक्षिका में नाम सावित्री बाई फुले और उनकी सहयोगी फ़ातिमा शेख़ को भी याद किया जाता है.
    फ़ातिमा शेख़ ने तकरीबन 175 साल पहले समाज के सबसे दबे-कुचले लोगों और ख़ासकर महिलाओं की तालीम के लिए सावित्री बाई फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया.
    एक जनवरी सन् 1848 में पुणे के बुधवार पेठ में जब पहला स्कूल खोला गया तो सावित्री बाई के साथ फ़ातिमा शेख़ भी वहाँ पढ़ाती थीं हालांकि फ़ातिमा शेख़ के बारे में लोग कम ही जानते हैं. फ़ातिमा शेख़. के बारे में कुछ फुटकर सूचनाएँ मिलती हैं।
    7 min

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