आश्रमोपनिषद्, बड़ी ही महत्वपूर्ण है। यह अथर्ववेद से सम्बद्ध है। इसमें आश्रम व्यवस्था-ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ एवं संन्यास, इन चारों आश्रमों के विभिन्न पक्षों एवं उनके अनुशासनों का संक्षिप्त वर्णन किया गया है।
आरुण्युपनिषद, सामवेदीय मानी जाती है।इसे आरुणिकोपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है। इसमें आरुणि की वैराग्य जिज्ञासा के उत्तर में ब्रह्मा जी ने संन्यास में दीक्षित होने के सूत्र समझाये हैं।
गंगा स्तोत्र, श्रीमत देवी भागवते, नवमस्कन्धे द्वादश अध्याये १८-४४ श्लोके भीष्माष्टमी के अवसर पर आज दिनांक 08.01.2022को स्वामी सिद्धिप्रदानन्द द्वारा पाठ किया गया।