मेरठ के जायके
मेरठ की चाट काफी पहले से मशहूर है। 1965 से 1975 के बीच मेरठ शहर में लाला बाजार के निकट कागजी बाजार की ओर लच्छो जी नमकीन वालों की चाट की दुकान थी, जो बाद में जयभगवान उर्फ नन्हे जी ने संचालित की। नमकीन चाट ऐसी कि जो एक बार खाए , बार बार आए। दुकान पर गोलगप्पे, पालक के पत्तों की पकौड़ी, दालसेब, रस, टिक्की, आलू के लच्छे मिलाकर चाट बिका करती थी। पत्तों से बने बड़े बड़े दोनों में चाट के शौकीन दूर दूर से चाट खाने आते थे, दुकान के भीतर भी चाट खाने की व्यवस्था थी, जिस समय सामान्य ठेलों पर 10 पैसे में 2 टिक्कियां आती थी, उस समय लच्छो जी की दुकान पर अनेक नमकीनों से युक्त बड़ा दौना पचास पैसे का मिलता था। चाट के शौकीनों ने उस समय कुछ खास ठिकाने ढूंढ रखे थे। सुभाष बाजार पहले सिपट बाजार के नाम से विख्यात था। वहां अशोक की लाट के निकट सिंघवाल जी बैठते थे, छोटी सी मटकी में मसालेदार पानी साथ मे गोलगप्पे खिलाते थे। अपने दाएं बाएं छोटी छोटी बेंच डाली हुई थी, चारों ओर ग्राहकों को बिठाकर गोलगप्पे खिलाया करते थे। अब उनके परिवार की उस स्थल के आसपास दो दुकानें हैं। ऐसे ही एक ठिकाना अनाज मंडी में डीसीएम क्लॉथ हाउस के निकट हुआ करता था, जिस पर पहले टेना बैठा करते थे, उनके बाद में छिद्दा ने इस ठिकाने को संभाला। यह ठिकाना गोलगप्पे, टिक्की और पहले से ही तैयार किए गए समोसों के लिए प्रसिद्ध था। गाँव से शहर में खरीदारी करने वालों की यह प्रिय जगह थी। इस ठिकाने के दक्षिण में एक इमली का पेड़ हुआ करता था, जिसके नीचे सिन्धी जी मटर की चाट का खोमचा लगाया करते थे। चाट इतनी स्वादिष्ट होती थी, कि दूरदराज से लोग चाट खाने आया करते थे। अनाज मण्डी में प्याऊ के निकट बेगराम जी आलू की सब्जी की परात भरकर लाते थे। मजदूरी पेशा लोगों व दोपहर भोज के लिए घर से रोटी लाने वाले व्यापारियों के लिए यह दोपहर भोज में रोटी का साथ निभाया करती थी। ऐसे में मेरठ की गलियों में रेहड़ी लगाकर चाट व गोलगप्पे वालों की संख्या कम ही हुआ करती थी। मोहल्ले वाले अक्सर घरों में बैठकर ही ख़ास रेहड़ी वाले की प्रतीक्षा किया करते थे। खान पान के लिए प्रसिद्द मेरठ में व्यंजनों की विविधता कभी भी कम नहीं रही। 1970-75 के दौर में मोहल्ले में आलू पानी वाले आया करते थे। छोटी सी पोटली में बहुत छोटे छोटे उबले हुए आलू, जलजीरे की छोटी सी मटकी, एक छोटी मटकी में मीठी सोंठ हुआ करती थी। किसी भी घर के चबूतरे पर बैठकर पांच पैसे में पांच आलू क्रमानुसार खिलाते थे, पत्ते को दौने का आकार देकर एक आलू डालते थे,फिर पानी, पानी एक बार में ही समाप्त हो जाता था, अंत में जो आलू बच जाते थे, उसमें मीठी सोंठ डाल देते थे,इस प्रकार पांच रूपये में ही खट्टा मीठा दोनों प्रकार का स्वाद बन जाता था। गर्मियों में खास गलियों में दही बड़े व् पानी के बड़ों की रेहड़ी मोहल्लों में आती थी। मीठा खाना हो तो दही सौंठ के बड़े और खट्टा मीठा खाना हो, तो कांजी के बड़े बहुत बिका करते थे। कुछ रेहड़ी वाले बड़े बड़े मटकनों में जलजीरा भरकर फेरी लगाया करते थे, बच्चों को लुभाने के लिए वे खास अंदाज में बोला करते थे - अरे भैया ..कहना मान जा, मटकना पी ले। वह दौर शायद कभी लौट कर न आए। मेरठ के सदर में गंज बाजार के निकट तिराहे पर परमानन्द राठौर कांजी का बड़े, मूँग की दाल की पकौड़ी व उड़द मूंग मिश्रित काजू बादाम से भरी गुंजियों का ठेला लगाया करते थे, ठेले का स्थान सुनिश्चित था। कद काठी से मजबूत लंबे और हल्के मोटे, सफेद कमीज और पजामा पहना करते थे। उनके बड़ों का जायका ऐसा कि दूर दूर से लोग उन के ठेले पर कभी अकेले, कभी परिवार संग आया करते थे, मीठे और खट्टे बड़ों के लिए अलग अलग प्रकार की चटनियाँ होती थी। अपने सामान की गुणवत्ता पर उन्हें इतना गर्व था कि ग्राहकों की कभी कभी एक न सुनते थे, यदि ग्राहक कहे कि पानी के बड़े मांगे तो शर्त लगा देते थे, कि पहले गुंजियाँ का पत्ता उसके बाद बड़े। स्वादिष्ट, जायकेदार और हाज़मेदार बड़े व गुंजियाँ ग्राहकों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर नहीं डालते थे। उस समय मिलावटी मसालों की जगह घर में तैयार किये गए मसालों का ही प्रयोग अधिक हुआ करता था। उनके उपरांत उनके संबंधी तथा अन्य लोग उस स्थान के निकट ठेले लगाते हैं, किन्तु जो स्वाद परमानंद राठौर जी द्वारा बनाए गए बड़े व पकोड़ियों में आता था, वैसा स्वाद अब नहीं आता।
दूध और दूध से बने पदार्थो की एक समय खासी मांग थी। 1965 - 70 के बीच खैरनगर में दूध की बड़ी कड़ाही में दूध पकता रहता था। आमने सामने दो दुकानें थी, सूरजभान चौरासिया जी के शिव मिष्ठान्न भंडार पर गर्म दूध को फेंटने का कार्य पंडित लक्ष्मण सिंह किया करते थे। उससे थोड़ा आगे चलने पर अलीगढ़ वालों का आंखों का अस्पताल हुआ करता था, उसकी दक्षिणी दीवार में गली की तरफ चबूतरे पर एक