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पू स्वामिनी समतानंदजी से एक छोटी और सुन्दर सी छोटी प्रेरक कहानी सुनें - इसका शीर्षक है - शांति की पेंटिंग।
पू स्वामिनी पूर्णानन्दजी द्वारा एक लघु कथा - रेती में पैरों के निशान। ईश्वर सदैव हम सबके साथ रहते हैं।
पू स्वामिनी अमितानन्द जी एक सुन्दर सी कथा सुना रही हैं - एक बच्चा अपनी परछाईं को कूदना चाहता था - तो क्या हुआ आप खुद ही सुनिए।
दिनांक १ मई २०२१ के मुण्डकोपनिषद प्रवचन से पूर्व पिछले दिन के प्रवचन का सार बताते हुए पू स्वामिनी अमितानन्द जी ने बताया की भाष्य में सम्प्राप्य का अर्थ बताते हुए भगवान् शंकराचार्य जी बताते हैं की ब्रह्म की सम्यक प्राप्ति ज्ञान मात्र से ही होती है। समस्त क्रियाएँ अर्थात कुछ न कुछ करने की चेष्टाओं को विराम देते हुए मात्र विचार पूर्वक यथार्थ दर्शी बनें। सम्प्राप्ति अर्थात समवगति।
वेदांत आश्रम, इंदौर में आजकल मुण्डकोपनिषद की तीसरी वल्ली पर प्रवचन चल रहे हैं। प्रसंग यह चल रहा है की अपने छोटेपन की धारणा ही हमारी समस्त शोक और पीड़ाओं का कारण होती है। इस छोटेपने से मुक्त होना ही आत्मा-ज्ञान का प्रयोजन होता है। जब ' मैं ' छोटा होता है तभी ' मेरा ' भी छोटा होता है। सीधे मैं का ज्ञान नहीं होता है, पहले हमें मेरे को व्यापक, उदात्त एवं बड़ा बनाना चाहिए। इसी को समष्टि दृष्टी से युक्त होना कहते हैं, यह ही धार्मिक जीवन का भी प्रयोजन होता है। जिसकी दुनियाँ बड़ी होती है उसका मैं भी विशाल होने लगता है - और जीवन में यज्ञ, दान और तप रुपी चित्तशोधक साधानाएं संभव हो पाती हैं। छोटेपन की बुद्धि और अस्मिता से युक्त व्यक्ति यज्ञ, दान और तप रुपी साधनाएं ठीक से कर भी नहीं पाते हैं, और इसी लिए उन्हें ब्रह्म-ज्ञान भी कभी प्राप्त नहीं हो पाता है। अतः पहले प्रत्येक व्यक्ति को मेरे का दायरा बढ़ाना चाहिए और नित्यप्रति अपनी प्रार्थना में सबके कल्याण की भी प्रार्थना जोड़नी चाहिए।
यह प्रवचन का सार पू स्वामिनी समतानन्द जी ने बताया।
वेदांत आश्रम, इंदौर में आजकल मुण्डकोपनिषद की तीसरी वल्ली पर प्रवचन चल रहे हैं। प्रसंग यह चल रहा है की अपने छोटेपन की धारणा ही हमारी समस्त शोक और पीड़ाओं का कारण होती है। इस छोटेपने से मुक्त होना ही आत्मा-ज्ञान का प्रयोजन होता है। जब ' मैं ' छोटा होता है तभी ' मेरा ' भी छोटा होता है। सीधे मैं का ज्ञान नहीं होता है, पहले हमें मेरे को व्यापक, उदात्त एवं बड़ा बनाना चाहिए। इसी को समष्टि दृष्टी से युक्त होना कहते हैं, यह ही धार्मिक जीवन का भी प्रयोजन होता है। जिसकी दुनियाँ बड़ी होती है उसका मैं भी विशाल होने लगता है - और जीवन में यज्ञ, दान और तप रुपी चित्तशोधक साधानाएं संभव हो पाती हैं। छोटेपन की बुद्धि और अस्मिता से युक्त व्यक्ति यज्ञ, दान और तप रुपी साधनाएं ठीक से कर भी नहीं पाते हैं, और इसी लिए उन्हें ब्रह्म-ज्ञान भी कभी प्राप्त नहीं हो पाता है। अतः पहले प्रत्येक व्यक्ति को मेरे का दायरा बढ़ाना चाहिए और नित्यप्रति अपनी प्रार्थना में सबके कल्याण की भी प्रार्थना जोड़नी चाहिए।
यह प्रवचन का सार पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी ने बताया।
पू स्वामिनी समतानन्दजी २७/४ के पू गुरूजी स्वामी आत्मानन्द जी द्वारा दिए गए प्रवचन का सार बता रही हैं।
होलिका दहन की क्या वास्तविक कथा है। अनेको लोग जो होलिका को अपने सगे भाई हिरण्यकश्यपु के षड्यंत्र का हिस्सा समझते हैं - वे सत्य जानते नहीं हैं। होलिका को तो वस्तुतः डरा-धमका कर अग्नि में प्रह्लाद को लेकर बैठने के लिए के मजबूर किया गया था। होलिका अग्नि देवता की बहुत महान उपासक थी तथा उसको अग्नि देवता ने प्रसन्न होकर एक विशिष्ट चद्दर का उपहार दिया, जिसको ओढ़ कर वो बगैर अग्नि से जले देर तक अपनी उपासना कर सके। इस बात को जानते हुए हिरण्यकश्यपु ने उसको प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठने के लिए मजबूर किया था। उसी दिन होलिका का विवाह एक इलोजी नामक राजकुमार से होने वाला था, ये बात उसके भाई को पता लग गयी थी। उसने यह भी धमकी दी थी की अगर उसने उसका साथ नहीं दिया तो वो उसकी शादी नहीं होने देगा और साथ-साथ उसके प्रेमी को बंदी भी बना लेगा। होलिका की पूरी कहानी और रहस्य क्या है? ये सब पूज्य स्वामीजी की इस कथा में सुने।
वेदान्त आश्रम, इंदौर के अन्तेवासी महात्माओं के द्वारा शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ।
गीता महायज्ञ में श्रीमद्भगवद गीता के अंतिम अर्थात समापन प्रवचन में वेदांत आश्रम, इंदौर के आचार्य परं पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने मोक्ष-सन्यास योग नामक १८वें अध्याय के दूसरे भाग में आगे बताते हुए कहा की गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को न केवल जीवन का परम लक्ष्य बताते हैं लेकिन उसके लिए साधन भी स्पष्टता से बताते हैं। लक्ष्य अपनी वास्तविकता को जानना और उसमे जगना होता है, और इसके लिए मन को सन्यस्त करना होता है, सन्यस्त मन के लिए पहले त्यागी बनना चाहिए। त्यागी होने के लिए कर्म अथवा किसी भी अन्य बाहरी चीज़ का त्याग आपेक्षित नहीं है, बल्कि कर्म में अपेक्षा एवं अभिमान आदि आतंरिक विकारों को छोड़ना होता है। ये पूरी बात भगवान् ने अनेकानेक तरीके से बताई। अंत में गीता की महिमा बताई और अर्जुन से उसके मन की स्थिति पूछी। अर्जुन ने अत्यंत धन्यता से कहा की उसका मोह नष्ट हो गया है। ग्रन्थ का समापन संजय के वचनों से हुआ, वो भी अपनी धन्यता व्यक्त करता है।
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