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Vedanta Ashram Podcasts episodes

  • गीता महायज्ञ - अध्याय-8

    गीता महायज्ञ के १०वें दिन गीता के अक्षरब्रह्म योग नामक ८वें अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के कुछ प्रश्नो से होता है - की ब्रह्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, अध्यात्म क्या होते हैं? उसका अंतिम प्रश्न है की अंतिम समय में व्यक्ति आपका समरण कैसे कर सकता है? भगवान् ने इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्रदान करे। अंतिम प्रश्न का उत्तर ज्यादा विस्तार से दिया। उसके अंतर्गत उन्होंने अंतिम समय की एक विशेष ध्यान की प्रक्रिया बताई, विविध प्रकार की मरणोपरांत गतियाँ बताई और ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति का आशय भी बताया - जब सब आवागमन समाप्त हो जाता है।

    1 hr 34 min
  • गीता महायज्ञ - अध्याय-7

    गीता महायज्ञ के ९वें दिन गीता के ज्ञान-विज्ञान योग नामक ७वें अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय में भगवान् अपने वास्तविक तत्व का परिचय देते हैं। वे कहते हैं की वे अपने परिचय के अलावा अपने साक्षात्कार का तरीका भी बताएँगे जिस ज्ञान से मनुष्य सभी चीज़ों का मूल राशि जान जायेगा। इसके लिए वे अपनी दो प्रकार की प्रकृति के ज्ञान से प्रारम्भ करते हुए बताते हैं की एक है अपरा और दूसरी है परा प्रकृति। वे खुद इन दोनों प्रकृति के आधार हैं। अपने इस तत्त्व को बता कर वे विज्ञानं के तरीके में मूल रूप से भक्ति की चर्चा करते हैं।

    1 hr 31 min
  • गीता महायज्ञ - अध्याय-6

    गीता महायज्ञ के आठवें दिन गीता के ध्यान-योग नामक छठे अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय में भगवान योग की अंतरंग साधना अर्थात ध्यान के समस्त पहलु बताते हैं। पिछले अध्यायों में उन्होंने कर्म-योग रुपी बहिरंग साधना बताई और अब हमें और अंदर की गहराईयों में ले चल रहे हैं। इस अध्याय में भी पहले वे कर्मफल के ऊपर आश्रित हुए बगैर कर्म करने का पुनः महत्त्व बताते हैं। योगी होना सन्यासी होने की तरफ कदम है। योग में आरूढ़ होने के लिए हम ही अपने मित्र या दुश्मन होते हैं। आगे ध्यान के लिए विविध प्रारंभिक बातें बताते हैं और फिर कहते हैं की ध्यान में मूल रूप से अपने आत्मा का ज्ञान ही प्रधान होता है। अगर मन कभी इधर-उधर जाये तो भी धीरज से पुनः मन को आत्माभिमुख करें। अभ्यास और वैराग्य से कैसा भी चंचल मन शांत और अन्तर्मुख किया जा सकता है। अध्य के अंत में अच्छे योगी के लक्षण भी बताये और अर्जुन के मन के कुछ संशय भी दूर करे।

    1 hr 29 min
  • गीता महायज्ञ - अध्याय-5

    गीता महायज्ञ के सातवें दिन गीता के कर्मसन्यास योग नामक पांचवें अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के एक प्रश्न से होता है। वो पूँछता है की हे कृष्ण, हमने देखा की आप कभी कर्म से सन्यास की स्तुति करते हैं और कभी कर्मा योग की - कृपया हमें इन दोनों में से जो भी श्रेयस्कर है उसका निश्चय करके बताएं। भगवाब ने कहा की अर्जुन ये दोनों - कर्म-सन्यास और कर्म-योग, दोनों ही व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान के लिए ही होते हैं। इन दोनों में पहले व्यक्ति को कर्म-योग का आश्रय लेना चाहिए, ये हमें कर्म-सन्यास के लिए पात्र बना देता है, और जब कोई सभी कर्मों के प्रति कर्तव्यता छोड़ पूरी ऊर्जा ज्ञान के लिए लगाता है, तभी कोई भी अपने आत्मा-तत्त्व में जगने में पात्र बन पाता हैै। इसी विषय को भगवान् ने पूरे अध्याय में भगवान् ने विस्तार से समझाकर बताया।

    1 hr 20 min
  • गीता महायज्ञ - अध्याय-4

    गीता महायज्ञ के छठे दिन गीता के ज्ञानकर्मसन्यास योग नामक चौथे अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय का प्रारम्भ भगवान् के वचनो से होता है। वे स्वतः कर्म योग की स्तुति करते हैं। वे कहते हैं की हमने ये योग सबसे पहले सूर्य देवता को दिया था - इसी के कारन वे इतने अध्भुत प्रकार से कभी न थकते हुए सबके ऊपर कृपा की वृष्टि करते हुए कार्य करते रहते हैं। सूर्य देवता ने यह ज्ञान मनुजी को प्रदान किया और इस तरह से अनेकानेक राजर्षि इस ज्ञान से युक्त होकर महातनता को प्राप्त हुए।  लेकिन यह ज्ञान परंपरा से धीमे-धीमे नष्ट हो गया, इसलिए वे आज यह ही ज्ञान अर्जुन को दे रहे हैं, क्यूंकि अर्जुन उनका सखा होने के साथ साथ उनका भक्त भी है। अर्जुन से जब ये पूछा की उनका जन्म तो अभी कुछ वर्ष पूर्व ही हुआ है तो उन्होंने सृष्टि के पूर्व सूर्य देवता को कैसे दिया, तब भगवान् ने अर्जुन को अवतार का रहस्य बताया। इससे जुड़े अनेकानेक रहस्य बताये और कहा की हमारे जन्म और कर्म से जो उचित शिक्षा लेता है वो भी पहले निर्मल होता है और फिर अपने मूल तत्व का ज्ञान प्राप्त कर मुक्त हो जाता है। इसके लिए उन्होंने यज्ञ भाव को अपने अंदर समाविष्ट करने की प्रेरणा दी, और फिर निर्मल और सन्यस्त मन से ज्ञान के लिए किसी गुरु के पास जाने को कहा।

    1 hr 27 min
  • गीता महायज्ञ - अध्याय-3

    गीता महायज्ञ के पांचवें दिन गीता के कर्म योग नामक तीसरे अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि इस अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के एक प्रश्न से होता है। वो पूँछता है की हे जनार्दन, अगर ज्ञान, कर्म से श्रेष्ठ होता है तो आप हमें इस कर्म में क्यों प्रेरित कर रहे हैं। हे केशव ! अभी हम इन सभी बातों का समझ नहीं पा रहे हैं, कृपया हमें एक निश्चित बात बताने की कृपा करें। इसके बाद भगवान् कहते हैं की अर्जुन हम ज्ञान और कर्म दोनों की बातें इसलिए बता रहे हैं क्यों की जीवन की सर्वोत्कृष्ट अन्तर्जागृति रुपी लक्ष्य के लिए ज्ञान और कर्म दोनों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह सत्य है की जीवन की सर्वोत्कृष्ट सिद्धि तो जानने से ही प्राप्त होती हैं, लेकिन यह भी सत्य है की उस दिव्य ज्ञान के लिए पात्रता कर्म से ही प्राप्त करी जाती है। इसके बाद भगवान् ने कर्म के अनेकानेक पहलु पूरे अध्याय में बताये - जो की पूज्य स्वामीजी ने अपने उद्बोधन में अत्यंत सुन्दर और सरल तरीके से बताये।

    1 hr 17 min
  • गीता महायज्ञ - अध्याय-2

    गीता महायज्ञ के चौथे दिन गीता के दूसरे अध्याय का सार बताते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने कहा कि यह सांख्य योग नामक अध्याय पूरी गीता का सार है। इनके ७२ श्लोकों में गीताचार्य हमें बताते हैं एक जीव की पूरी आध्यात्मिक यात्रा भले अल्पता जनित शोक से प्रारम्भ हो, लेकिन यह स्थित-प्रज्ञ की मुक्ति में समाप्त होनी चाहिए। यह ही इस अध्याय का खाका है। इस अध्याय को हम चार भागों में विभाजित कर सकते हैं। १. अर्जुन की शरणागति, २. जीवन के सबसे उत्कृष्ट आत्मा-ज्ञान रुपी लक्ष्य की चर्चा, ३. ज्ञान के लिए मन को तैयार करने हेतु कर्म का योगदान, और ४. स्थित-प्रज्ञ के लक्षणों की चर्चा। इन सभी के बारे में पूज्य स्वामीजी ने संक्षेप में चर्चा करी।

    1 hr 6 min
  • गीता महायज्ञ - अध्याय-1

    गीता महायज्ञ के तीसरे दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी ने बताया की गीता के प्रथम अध्याय में ४७ श्लोक हैं - जिनमे १ धृतराष्ट्र, २५ संजय, एवं २१ अर्जुन के द्वारा कहे गएँ हैं। भगवन श्री कृष्ण के द्वारा एक भी श्लोक नहीं है। मात्र दो शब्द हैं। इसका नाम अर्जुन विषाद योग रखा गया है, क्यूंकि इसमें अर्जुन के विषाद जनित जिज्ञासा का उदय है। सबका विषाद योग नहीं बन पता है। इसलिए अनेकानेक लोगों में शोक के बावजूद जिज्ञासा का उदय जल्दी-जल्दी नहीं देखा जाता है, केवल पीड़ा मात्र होती है। पक्षपाती धृतराष्ट्र के वचनों से गीता का प्रारम्भ दिखता है की अर्जुन का द्वन्द जायज था। इस अध्याय को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए पूज्य स्वामीजी ने बताया की यह अध्याय हमें अर्जुन की समस्या को समझने में मदद करता है। लड़ाई के पूर्व तक अर्जुन जानता था की मतभेद मूल रूप से धर्म और अधर्म से प्रेरित नीतियों का है लेकिन जब उसने दोनों सेनाओं को निकता से देखा तो उसने मूल मुद्दे से भटककर अपने-पराए की नज़रों से देखने लगा, और तत्क्षण उसके हाथ-पैर कापने लगे। जब भी किसी को मोह हो जाता है, इसका अंजाम सदैव शोक में होता है - जो की इंसान को तोड़ के रख देता है। यह ही इस अध्याय में दिखाया गया है।

    1 hr 13 min
  • गीता महायज्ञ - भूमिका-2

    सम्पूर्ण भगवद-गीता के महायज्ञ की प्रवचन श्रंखला के दूसरे दिन वेदान्त आश्रम, इंदौर के पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने अपनी भूमिका के दूसरे प्रवचन में बताया कि भगवद गीता धर्म के निर्णय में असमर्थ अर्जुन के लिए उपदेश था। उसके साथ-साथ जो भी अर्जुन स्थानीय जीव हैं उन सबको अपने अनिर्णय के संकट से उभरने हेतु उपदेश है। इस लिए यह समस्त मानव मात्र के लिए उपयोगी और प्रासंगिक है। महाभारत की भूमिका बताते हुए पूज्य श्री ने हस्तिनापुर के परिवार की स्थिति बताई और किस तरह से यह युद्ध पांडवों पर थोप दिया गया था। इस परिस्थिति में लड़ने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। लेकिन अर्जुन एक धर्म-प्रिय और निष्ठ व्यक्ति था इसलिए उसके मन में एक व्यथा उत्पन्न हुई - जिसको निमित्त बनाकर गीतोपदेश प्रदान किया गया।

    1 hr 2 min
  • गीता महायज्ञ - भूमिका-1

    सम्पूर्ण भगवद-गीता के महायज्ञ की प्रवचन श्रंखला का प्रारम्भ करते हुए वेदान्त आश्रम, इंदौर के पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने अपनी भूमिका में बताया कि महाभारत युद्ध एक धर्म युद्ध था। इसमें पांडव लोग धर्म के पक्ष वाले थे और कौरव अधर्म के। धर्म, पूरी दुनियाँ को सर्वज्ञ, सर्व-शक्ति के धाम, करुणानिधान ईश्वर को मध्य में रखकर जीवन जीने की कला है, एवं अधर्म एक छोटे, असुरक्षित, अपूर्ण व्यक्ति को मध्य में रखकर जीवन जीने का तरीका है। धर्ममय व्यक्ति उद्दात, धन्य, और सब के कल्याण के लिए जीने वाला होता है, तथा अधर्म के पथ पे चलने वाला व्यक्ति असुरक्षित और सदैव अपने स्वार्थ की पूर्ती के लिए प्रेरित होता है। ये दो प्रकार की जीवन जीने की कलाएँ होती हैं। जब तक ईश्वरीय सत्ता का ज्ञान नहीं होता है तब तक प्रत्येक मनुष्य स्वार्थ से ही प्रेरित होता है एवं अधर्म के पथ का ही अनुसरण करता है। जो भी अधर्म के पथ पर चलता है उसको सदैव चिंता एवं शोक का सामना करना पड़ता है। गीता मूल रूप से मनुष्य को शोक के मुक्ति का पथ बताती है। यह ही भगवद गीता का विषय और प्रयोजन है।

    1 hr 9 min

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