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संसारवृक्ष का वर्णन किया गया है. भगवतप्राप्त्तिका उपायबताया गया है .और क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम का वर्णन किया गया है .
इस अध्याय में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विवेक और अंतमे ज्ञानी के लक्षण इसके बारे में बताया गया है.
इस अध्यायमे भगवानकी साकार और निराकार उपासकोकी गति ,साधना का स्वरुप और अंत मे भक्त के लक्षण बताये गये है.
भगवानके द्वारा अपने विश्वरुपका वर्णन और विश्वरूप दर्शनकी महिमा इस अध्यायमे है.
गोपनीयअति पवित्र सभी विद्याओकी राजा ऐसी विद्या और जगत कीउत्त्पत्ति के बारेमे चर्चा.
इस अध्याय में अर्जुनके ब्रह्म, अध्यात्मऔर कर्मदिके बारेमे प्नश्नोके उत्तर और भिन्न भिन्न गतियोकी चर्चा है.
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