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वेदान्त श्रवण माला के अंतर्गत एकश्लोकी ज्ञान यज्ञ के छठे और अंतिम प्रवचन में पूज्य गुरूजी स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने बताया की परम ज्योति की खोज की यात्रा के अंतिम पड़ाव में हम लोग मन रुपी ज्योति से परम ज्योति तक कैसे पहुंचते हैं उसके लिए हम मन रुपी ज्योति पर पहले चिंतन करना चाहिए। मन रुपी ज्योति अत्यंत समर्थ होती है - वो केवल प्रकाशक ही नहीं बल्कि सृष्टा भी होती है। मन की संकल्प शक्ति दुनिया की सबसे शक्तिशाली शक्ति होती है। हम तीव्रता से कुछ भी करना चाहें हम कर सकते हैं। इसमें कर्तृत्व का अद्धभुत सामर्थ्य होता है। प्रत्येक कर्तृत्व के पीछे हमें कुछ न कुछ अनुभूति की प्राप्ति की इच्छा होती है - इसे भोक्तृत्व कहते हैं। मन की ज्योति इन कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व से युक्त होती है। ये दोनों ज्योति के धर्म नहीं होते हैं बल्कि मन की उपज होते हैं। जब हम इन दो का रहस्य जान जाते हैं तब ज्योति इन अध्यारोप से मुक्त हो जाती है। उस ज्योति को ही ब्रह्म कहते हैं। अतः इस विवेक की कृपा से हम आत्मा को परम ज्योति स्वरुप ब्रह्म जान जाते हैं।
इस श्रवण माला के सभी छः प्रवचनों के वीडियो प्रवचन भी उपलब्ध हैं। जो भी इन्हें देखना अथवा सुनना चाहे वो निचे दिए गए प्लेलिस्ट की लिंक में जाकर सभी प्रवचनों के लिंक देख सकता है। https://www.youtube.com/watch?v=Q-apWIcTmfg&list=PLVT0gU53weD3dIaeovrN10ZGGWFHWA04r
वेदान्त श्रवण माला के अंतर्गत एकश्लोकी ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन पूज्य गुरूजी स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने बताया की इस परम ज्योति की खोज की यात्रा में जैसे-जैसे हम किसी दिव्य ज्योति की अपार कृपा और आशीर्वाद का ज्ञान प्राप्त करते हैं उसके अनुरूप हमारी भावना की उचित अभिव्यक्ति भी करने लगते हैं। हम लोग सूर्य देवता को अर्ग्य देने के द्वारा उनके अपार आशीर्वाद के प्रति अपनी कृज्ञता अभिव्यक्त करने लगते हैं। उसी तरह से जब हम सबने सूर्य को भी आलोकित करने वाली चक्षु की ज्योति का ज्ञान प्राप्त किया, तब भी इस ज्योति की ज्योति को उचित प्रकार से आदर प्रदान करें। भावना की अभिव्यक्ति किसी की महिमा दिल से जानने का परिणाम होती है। फिर चक्षु को विश्राम देते हुए हम यह देखे की ऐसे समय हमारी अनुभूतियाँ किस प्रकाश में प्रकाशित हो रही हैं। वह प्रकाश हमारा मन होता है। मन के ही प्रकाश में हम लोग अपने मनोराज्य की दुनियां देखते हैं। मन एक दिव्य प्रकाशक है। इस बात को भी गहराई से देखनी चाहिए।
वेदान्त श्रवण माला के अंतर्गत "एकश्लोकि" नामक प्रकरण पर चर्चा करते हुए ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने आगे बताया की अपनी इन्द्रियों को प्रकाश का स्रोत जानने से एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है, और वो यह है की हम चेतना को भी प्रकाश देखने लगते हैं। हमारी ज्योति की खोज हमें अपने अंदर मोड़ने लगाती है। एक एक इन्द्रियों के स्तर पर हमें यह अभ्यास करना चाहिए जिससे यह निश्चय दृढ़ हो जाये की हम सब एक ऐसा घड़ा है जो की पांच प्रकार की ज्योतियाँ निःसृत कर रहा है। इसके बाद ग्रंथाचार्य ने विचार आगे बढ़ाया और पूछा की यह ढीक है, अब यह बताओ की जब हमारी इन्द्रियाँ शांत या बंद हो जाती हैं तब हमें अनुभूतियाँ कैसे प्राप्त होती हैं - शिष्य ने विचार करके बताया की महाराज जब हम आँख बंद कर लेते हैं तब हमारा मन ही सब चीज़ों को प्रकाशित करता है। अतः अपने मन को ज्योति स्वरुप देखना चाहिए।
इस प्रवचन का वीडियो भी यूट्यूब पर विद्यमान है। जिसे आप नीचे दिए हुए लिंक पर देख सकते हैं : https://youtu.be/QOmgTS6E0WA
वेदान्त श्रवण माला के अंतर्गत "एकश्लोकि" नामक प्रकरण पर चर्चा करते हुए ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने अभी तक के प्रसंग का निचोड़ बताया की जब एक जिज्ञासु किसी महात्माजी से पूछता है की हे प्रभु हमें आत्म-ज्ञान का सीधा और सरल रास्ता बताएं तो उन्होंने उसे मात्र एक प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने की सलाह दी - कि हम सब किस ज्योति के प्रकाश में अपने जीवन की विविध अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं? तो पहले उत्तर मिला - सूर्य, फिर रात को दीपक आदि, और आगे चलते हुए पता चला की हमारी इन्द्रियाँ भी प्रकाश स्वरुप होती हैं। अगर आखें न खुली हों तो हम ये सूर्य और दीपक आदि भी नहीं जान पायेंगें। मूल रूप से हमें यह पता चला की चेतना एक दिव्य एवं अलौकिक प्रकाश की तरह से होती है। हम सब के पास पांच ज्ञान-इन्द्रियाँ होती हैं। इन सब से एक विशिष्ट प्रकाश निकलता है और तब ही हम लोग शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध रुपी पांच विषयों को देख पाते हैं। दुनियां जरूर देखें लेकिन यह भी देखें की हम सब अनेकों प्रकाश के स्रोतों से युक्त हैं। यह ज्ञान ही यहाँ दिया जा रहा है। एक बार ये बात समझ में आ जाये उसके बाद गुरूजी हमें आगे ले चलेंगें।
इस प्रवचन का वीडियो भी यूट्यूब पर विद्यमान है। जिसे आप नीचे दिए हुए लिंक पर देख सकते हैं : https://youtu.be/NRFP5LEjYTo
श्रवण माला कार्यक्रम के अंतर्गत "एकश्लोकि" नामक प्रकरण पर चर्चा करते हुए इस ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने आत्म-ज्ञान की जिज्ञासा से युक्त व्यक्ति को सीधी एवं सरल साधना बताते के इच्छा से युक्त आचार्य कहते हैं की यह तुम जानते हो की प्रत्येक अनुभूति में किसी न किसी इष्ट विषय को जानने, प्राप्त करने और अनुभव करने का प्रयास होता है। विषय जड़ होते हैं अतः सभी अनुभूतियों में हमें किसी न किसी प्रकाशक की जरूरत पड़ती है। तुम केवल उस प्रकाशक का ज्ञान प्राप्त करो। हम सब विषयों में इतना खो जाते हैं की जो प्रकाशक हमें ये सब अनुभूतियाँ करा रहा है उसे ही भूल जाते हैं। इस प्रहण के उत्तर में शिष्य कहता है की हे महाराज - हम दिन में सूर्य के प्रकाश में दुनियां देखते हैं और रात को अन्य दीपक आदि के प्रकाश में विषय ज्ञान प्राप्त करते हैं। गुरु ने कहा की यह ठीक है, लेकिन अब हमें यह बताओ की तुम सूर्य अथवा दीपक किस प्रकाश में देखते हो - तो वो कहता है की हम हमारी चक्षु आदि से उनको जानते हैं। इस चर्चा के सूक्ष्म अर्थ पूज्य स्वामीजी ने बताये।
इस प्रवचन का वीडियो भी यूट्यूब पर विद्यमान है। जिसे आप नीचे दिए हुए लिंक पर देख सकते हैं : https://youtu.be/qYLHlGot6zo
एकश्लोकि श्रवण माला का शुभारम्भ करते हुए पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने एकश्लोकि नामक प्रकरण के रचयिता / विषय / अधिकारी एवं प्रयोजन के बारे में चर्चा करी। इसके रचयिता भगवान श्री आदि शंकराचार्य जी महाराज हैं। यह रचना केवल एक श्लोक मात्र की है, लेकिन इसमें गुरु और शिष्य का पूरा संवाद विराजमान है। एक जिज्ञासु किसी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ विद्वान् के पास जाता है और उनसे यह जानना चाहता है की - भगवन हमें आत्म-ज्ञान के लिए सीधा एवं सरल मार्ग बताएं? इसी प्रश्न के उत्तर की तरह से पूरा प्रकरण है। ऐसा प्रश्न आना और इतनी तीव्रता से आना की सब कुछ किनारे करके गुरु की तलाश में निकल जाना - यह सब उस जिज्ञासु के विशिष्ट मनःस्तिथि को दिखता है। गुरुदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए उसे मात्र एक प्रश्न का उत्तर ढूढ़ने को कहा। वह प्रहण है की हम सब किस ज्योति के प्रकाश में अपनी विविध अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं? यहाँ से इस रचना का प्रारम्भ होता है, और अंततः उस जिज्ञासु को अपने प्रश्न का उत्तर प्राप्त हो जाता है।
इस प्रवचन का वीडियो भी यूट्यूब पर विद्यमान है। जिसे आप नीचे दिए हुए लिंक पर देख सकते हैं : https://youtu.be/5ixYpXUXq9c
एकश्लोकि श्री आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित है। इसमें एक श्लोक में ही आत्मज्ञान के बारे में गुरु और शिष्य का संवाद विराजमान है। पूरा प्रकरण एक श्लोक मात्र में। इस श्लोक का पाठ वेदांत आश्रम के अंतेवासियों ने किया है।
त्याग और संन्यास की व्याख्या ,तीनों गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म , कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के अलग अलग भेद और अंत में श्री गीताजी का माहात्म्य.
सात्त्विक, राजसी , तामसी श्रद्धा का परिचय किया गया है . आहार, यज्ञ, तप और दान के श्रद्धा अनुसार वर्गीकरण और ॐ तत्सत का प्रयोग .
दैवी और आसुरी गुणोंका वर्णन, आसुरी सम्पदावालोंके लक्षण और उसके अधोगतिके बारेमे बताया गया है . और शास्त्र अनुकूल आचरण के लिये प्रेरणा दी गयी .
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