Vedic Broadcast

Vedic Broadcast

By This podcast is brought to you by Gaurashtra.comReligion & SpiritualitySpirituality
Download on the App Store

Vedic Broadcast episodes

  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 18. मंत्र 7

    यस्मा॑दृ॒ते न सिध्य॑ति य॒ज्ञो वि॑प॒श्चित॑श्च॒न। स धी॒नां योग॑मिन्वति॥ - ऋग्वेद (1.18.7)


    पदार्थ -

    हे मनुष्यो ! (यस्मात्) जिस (विपश्चितः) अनन्त विद्यावाले सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर के (ऋते) विना (यज्ञः) जो कि दृष्टिगोचर संसार है, सो (चन) कभी (न सिध्यति) सिद्ध नहीं हो सकता, (सः) वह जगदीश्वर सब मनुष्यों की (धीनाम्) बुद्धि और कर्मों के (योगम्) संयोग को (इन्वति) व्याप्त होता वा जानता है॥७॥


    भावार्थ -

    व्यापक सब में रहनेवाले ईश्वर और व्याप्य जगत् का नित्य सम्बन्ध है। वही सब संसार को रचकर तथा धारण करके सब की बुद्धि और कर्मों को अच्छी प्रकार जानकर सब प्राणियों के लिये उनके शुभ अशुभ कर्मों के अनुसार सुख दुःखरूप फल को देता है। कभी ईश्वर को छोड़ के अपने आप स्वभावमात्र से सिद्ध होनेवाला अर्थात् जिसका कोई स्वामी न हो, ऐसा संसार नहीं हो सकता, क्योंकि जड़ पदार्थों के अचेतन होने से यथायोग्य नियम के साथ उत्पन्न होने की योग्यता कभी नहीं होती॥७॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj

    हमारी website: www.agnidhwaj.in

    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    6 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 18. मंत्र 6

    सद॑स॒स्पति॒मद्भु॑तं प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्। स॒निं मे॒धाम॑यासिषम्॥ - ऋग्वेद (1.18.6)


    पदार्थ -

    मैं (इन्द्रस्य) जो सब प्राणियों को ऐश्वर्य्य देने (काम्यम्) उत्तम (सनिम्) पाप-पुण्य कर्मों के यथायोग्य फल देने और (प्रियम्) प्राणियों को प्रसन्न करानेवाले (अद्भुतम्) आश्चर्य्यमय गुण और स्वभाव स्वरूप (सदसस्पतिम्) और जिसमें विद्वान् धार्मिक न्याय करनेवाले स्थित हों, उस सभा के स्वामी परमेश्वर की उपासना और सब उत्तम गुण स्वभाव परोपकारी सभापति को प्राप्त होके (मेधाम्) उत्तम ज्ञान को धारण करनेवाली बुद्धि को (अयासिषम्) प्राप्त होऊँ॥६॥


    भावार्थ -

    जो मनुष्य सर्वशक्तिमान् सबके अधिष्ठाता और सब आनन्द के देनेवाले परमेश्वर की उपासना करते और उत्कृष्ट न्यायाधीश को प्राप्त होते हैं, वे ही सब शास्त्रों के बोध से प्रसिद्ध क्रियाओं से युक्त बुद्धियों को प्राप्त और पुरुषार्थी होकर विद्वान् होते हैं॥६॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj

    हमारी website: www.agnidhwaj.in

    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    4 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 18. मंत्र 5

    त्वं तं ब्र॑ह्मणस्पते॒ सोम॒ इन्द्र॑श्च॒ मर्त्य॑म्। दक्षि॑णा पा॒त्वंह॑सः॥ - ऋग्वेद (1.18.5)


    पदार्थ -

    हे (ब्रह्मणस्पते) ब्रह्माण्ड के पालन करनेवाले जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (अहंसः) पापों से जिसकी (पातु) रक्षा करते हैं, (तम्) उस धर्मात्मा यज्ञ करनेवाले (मर्त्यम्) विद्वान् मनुष्य की (सोमः) सोमलता आदि ओषधियों के रस (इन्द्रः) वायु और (दक्षिणा) जिससे वृद्धि को प्राप्त होते हैं, ये सब (पातु) रक्षा करते हैं॥५॥


    भावार्थ -

    जो मनुष्य अधर्म से दूर रहकर अपने सुखों के बढ़ाने की इच्छा करते हैं, वे ही परमेश्वर के सेवक और उक्त सोम, इन्द्र और दक्षिणा इन पदार्थों को युक्ति के साथ सेवन कर सकते हैं॥५॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj

    हमारी website: www.agnidhwaj.in

    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    4 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 18. मंत्र 4

    स घा॑ वी॒रो न रि॑ष्यति॒ यमिन्द्रो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑। सोमो॑ हि॒नोति॒ मर्त्य॑म्॥ - ऋग्वेद (1.18.4)


    पदार्थ -

    उक्त इन्द्र (ब्रह्मणस्पतिः) ब्रह्माण्ड का पालन करनेवाला जगदीश्वर और (सोमः) सोमलता आदि ओषधियों का रससमूह (यम्) जिस (मर्त्यम्) मनुष्य आदि प्राणी को (हिनोति) उन्नतियुक्त करते हैं, (सः) वह (वीरः) शत्रुओं का जीतनेवाला वीर पुरुष (न घ रिष्यति) निश्चय है कि वह विनाश को प्राप्त कभी नहीं होता॥४॥


    भावार्थ -

    जो मनुष्य वायु, विद्युत्, सूर्य्य और सोम आदि ओषधियों के गुणों को ग्रहण करके अपने कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे कभी दुखी नहीं होते॥४॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj

    हमारी website: www.agnidhwaj.in

    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    4 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 18. मंत्र 3

    मा नः॒ शंसो॒ अर॑रुषो धू॒र्तिः प्रण॒ङ्मर्त्य॑स्य। रक्षा॑ णो ब्रह्मणस्पते॥ - ऋग्वेद (1.18.3)


    पदार्थ -

    हे (ब्रह्मणस्पते) वेद वा ब्रह्माण्ड के स्वामी जगदीश्वर ! आप (अररुषः) जो दान आदि धर्मरहित मनुष्य है, उस (मर्त्यस्य) मनुष्य के सम्बन्ध से (नः) हमारी (रक्ष) रक्षा कीजिये, जिससे कि वह (नः) हम लोगों के बीच में कोई मनुष्य (धूर्त्तिः) विनाश करनेवाला न हो और आपकी कृपा से जो (नः) हमारा (शंसः) प्रशंसनीय यज्ञ अर्थात् व्यवहार है, वह (मा पृणक्) कभी नष्ट न होवे॥३॥


    भावार्थ -

    किसी मनुष्य को धूर्त्त अर्थात् छल कपट करनेवाले मनुष्य का संग न करना तथा अन्याय से किसी की हिंसा न करनी चाहिये, किन्तु सब को सब की न्याय ही से रक्षा करनी चाहिये॥३॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj


    हमारी website: www.agnidhwaj.in


    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    12 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 18. मंत्र 2

    यो रे॒वान्यो अ॑मीव॒हा व॑सु॒वित्पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः। स नः॑ सिषक्तु॒ यस्तु॒रः॥ - ऋग्वेद (1.18.2)


    पदार्थ -

    (यः) जो जगदीश्वर (रेवान्) विद्या आदि अनन्त धनवाला, (यः) जो (पुष्टिवर्धनः) शरीर और आत्मा की पुष्टि बढ़ाने तथा (वसुवित्) सब पदार्थों का जानने (अमीवहा) अविद्या आदि रोगों का नाश करने तथा (यः) जो (तुरः) शीघ्र सुख करनेवाला वेद का स्वामी जगदीश्वर है, (सः) सो (नः) हम लोगों को विद्या आदि धनों के साथ (सिषक्तु) अच्छी प्रकार संयुक्त करे॥२॥


    भावार्थ -

    जो मनुष्य सत्यभाषण आदि नियमों से संयुक्त ईश्वर की आज्ञा का अनुष्ठान करते हैं, वे अविद्या आदि रोगों से रहित और शरीर वा आत्मा की पुष्टिवाले होकर चक्रवर्त्ति राज्य आदि धन तथा सब रोगों की हरनेवाली ओषधियों को प्राप्त होते हैं॥२॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj


    हमारी website: www.agnidhwaj.in


    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    10 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 18. मंत्र 1

    सो॒मानं॒ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्मणस्पते। क॒क्षीव॑न्तं॒ य औ॑शि॒जः॥ - ऋग्वेद (1.18.1)


    पदार्थ -

    (ब्रह्मणस्पते) वेद के स्वामी ईश्वर ! (यः) जो मैं (औशिजः) विद्या के प्रकाश में संसार को विदित होनेवाला और विद्वानों के पुत्र के समान हूँ, उस मुझको (सोमानम्) ऐश्वर्य्य सिद्ध करनेवाले यज्ञ का कर्त्ता (स्वरणम्) शब्द अर्थ के सम्बन्ध का उपदेशक और (कक्षीवन्तम्) कक्षा अर्थात् हाथ वा अङ्गुलियों की क्रियाओं में होनेवाली प्रशंसनीय शिल्पविद्या का कृपा से सम्पादन करनेवाला (कृणुहि) कीजिये॥१॥


    भावार्थ -

    जो कोई विद्या के प्रकाश में प्रसिद्ध मनुष्य है, वही पढ़ानेवाला और सम्पूर्ण शिल्पविद्या के प्रसिद्ध करने योग्य है। क्योंकि ईश्वर भी ऐसे ही मनुष्य को अपने अनुग्रह से चाहता है। इस मन्त्र का अर्थ सायणाचार्य्य ने कल्पित पुराण ग्रन्थ भ्रान्ति से कुछ का कुछ ही वर्णन किया है॥१॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj


    हमारी website: www.agnidhwaj.in


    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    5 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 17. मंत्र 9

    प्र वा॑मश्नोतु सुष्टु॒तिरिन्द्रा॑वरुण॒ यां हु॒वे। यामृ॒धाथे॑ स॒धस्तु॑तिम्॥ - ऋग्वेद (1.17.9)


    पदार्थ -

    मैं जिस प्रकार से इस संसार में जिन इन्द्र और वरुण के गुणों की यह (सुष्टुतिः) अच्छी स्तुति (प्राश्नोतु) अच्छी प्रकार व्याप्त होवे, उसको (हुवे) ग्रहण करता हूँ, और (याम्) जिस (सधस्तुतिम्) कीर्त्ति के साथ शिल्पविद्या को (वाम्) जो (इन्द्रावरुणौ) इन्द्र और वरुण (ऋधाथे) बढ़ाते हैं, उस शिल्पविद्या को (हुवे) ग्रहण करता हूँ॥९॥


    भावार्थ -

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जिस पदार्थ के जैसे गुण हैं, उनको वैसे ही जानकर और उनसे सदैव उपकार ग्रहण करना चाहिये, इस प्रकार ईश्वर का उपदेश है॥९॥पूर्वोक्त सोलहवें सूक्त के अनुयोगी मित्र और वरुण के अर्थ का इस सूक्त में प्रतिपादन करने से इस सत्रहवें सूक्त के अर्थ के साथ सोलहवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति करनी चाहिये।इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने कुछ का कुछ ही वर्णन किया है॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj

    हमारी website: www.agnidhwaj.in

    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    13 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 17. मंत्र 8

    इन्द्रा॑वरुण॒ नू नु वां॒ सिषा॑सन्तीषु धी॒ष्वा। अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ यच्छतम्॥ - ऋग्वेद (1.17.8)


    पदार्थ -

    (नु) जिस कारण से (इन्द्रावरुणा) इन्द्र और वरुण (सिषासन्तीषु) उत्तम कर्म करने को चाहने और (धीषु) शुभ अशुभ वृत्तान्त धारण करनेवाली बुद्धियों में (नु) शीघ्र (अस्मभ्यम्) हम पुरुषार्थी विद्वानों के लिये (शर्म) दुःखविनाश करनेवाले उत्तम सुख का (आयच्छतम्) अच्छी प्रकार विस्तार करते हैं, इससे (वाम्) उन को कार्य्यों की सिद्धि के लिये मैं निरन्तर (हुवे) ग्रहण करता हूँ॥८॥


    भावार्थ -

    इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से हुवे इस पद का ग्रहण किया है। जो मनुष्य शास्त्र से उत्तमता को प्राप्त हुई बुद्धियों से शिल्प आदि उत्तम व्यवहारों में उक्त इन्द्र और वरुण को अच्छी रीति से युक्त करते हैं, वे ही इस संसार में सुखों को फैलाते हैं॥८॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj

    हमारी website: www.agnidhwaj.in

    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    5 min
  • ऋग्वेद - मण्डल 1. सूक्त 17. मंत्र 7

    इन्द्रा॑वरुण वाम॒हं हु॒वे चि॒त्राय॒ राध॑से। अ॒स्मान्त्सु जि॒ग्युष॑स्कृतम्॥ - ऋग्वेद (1.17.7)


    पदार्थ -

    जो (इन्द्रावरुणा) पूर्वोक्त इन्द्र और वरुण अच्छी प्रकार क्रिया कुशलता में प्रयोग किये हुए (अस्मान्) हम लोगों को (सुजिग्युषः) उत्तम विजययुक्त (कृतम्) करते हैं, (वाम्) उन इन्द्र और वरुण को (चित्राय) जो कि आश्चर्य्यरूप राज्य, सेना, नौकर, पुत्र, मित्र, सोना, रत्न, हाथी, घोड़े आदि पदार्थों से भरा हुआ (राधसे) जिससे उत्तम-उत्तम सुखों को सिद्ध करते हैं, उस सुख के लिये (अहम्) मैं मनुष्य (हुवे) ग्रहण करता हूँ॥७॥


    भावार्थ -

    जो मनुष्य अच्छी प्रकार साधन किये हुए मित्र और वरुण को कामों में युक्त करते हैं, वे नाना प्रकार के धन आदि पदार्थ वा विजय आदि सुखों को प्राप्त होकर आप सुखसंयुक्त होते तथा औरों को भी सुखसंयुक्त करते हैं॥७॥


    --------------------------------------------------------------------------------------

    पॉडकास्ट पर इस एपिसोड को सुनें:

    Spotify - https://spoti.fi/3sCWtJw

    Google podcast - https://bit.ly/3dU7jXO

    Apple podcast - https://apple.co/3dStOfy

    --------------------------------------------------------------------------------------

    Whatsapp पर वेद मंत्र प्राप्त करें: https://bit.ly/3srBbPu

    हमसे facebook पर जुड़ें: https://bit.ly/3uDUAhJ

    हमारे Youtube चैनल से जुड़ें: https://bit.ly/3q1DTt4

    हमें Instagram पर फॉलो करें: https://www.instagram.com/agnidhwaj

    हमारी website: www.agnidhwaj.in

    (भाष्यकार - स्वामी दयानंद सरस्वती जी)

    (सविनय आभार: www.vedicscriptures.in)

    #ved #ॐ #ईश्वर #परमात्मा #वेद #अध्यात्म #om #वेदज्ञान #spirituality

    ---
    Send in a voice message: https://anchor.fm/daily-one-ved-mantra/message
    5 min

About Vedic Broadcast

From the publisher's feed

Namaste!