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ए मेरे आश्नाओं! तीन दिन पहले, मेरा एक मित्र इस जहॉं से चला गया !😢
मेरे पाक रेहनुमाओं, आज मैं अपनी डायरी के चौदहव्वें पन्ने को खोल कर बैठा हूं📜
जिंदगी इतनी खूबसूरत है की हर एक पल में दो पहलू होते हैं!💕
आजकल कुछ मुल्क़ और कुछ इंसान अपनी बादशाहियत बनाए रखने के लिए, इस दुनिया को अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं😲
अगर किसी एक दिन, वो नूर किसीको बिना बतायें कहीं चला जाए, तो उस मोहल्ले के बाशिंदे क्या सोचते और करते होंगे?😜
कभी ऐसा हुआ है आपके साथ, की जब ग़म-ए-जुदाई इतनी ज्यादा हो गई हो, की आपको, जमीन के दो टुकड़े करने का दिल करे!😇
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-दूर हैं वो, ना जाने अब किस हाल में होंगे,
गर पास होते तो उन्हें, सीने से लगा लेता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-कब्र ने मुझसे कहा, कि माफ़ कर देना मुझे,
गर बस में होता मेरे, तो दोनों को जगह देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-बस कसक सी, दौर-ए-जाम, और एक तन्हा रात है,
ऐसे आलम में मुझे, और क्या खुदा देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-पूछता हूं, हर किसी से, क्या इश्क यही है,
ऐसा सुरूर है जो, क्या खाक नशा देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
-वो ना जाने मुझसे जुदा होकर भी क्यों चुप हैं 'ए दर्द',
मैं जो होता जगह उनकी, जहाँ में आग लगा देता!
-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,
मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,
न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,
न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!
मुकद्दर है ऐसा हसी़न, की कब क्या कर दे, कुछ पता ही नहीं!🥰
-कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई,
चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई,
वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं,
जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई!
-मुझको यक़ीं था हर गज़र, पर मेरे मुकद्दर को नहीं,
मैंने छूने की कोशिश जो की, मेरी सारी क़ायनात हो गई!
-कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई,
चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई,
वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं,
जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई!
-जुगनूओं के बीच में रहोगे तो खत्म हो जाओगे,
फिर न कहना, मेरी क्या औकात हो गई!
-कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई,
चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई,
वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं,
जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई!
-जब शगुन के पन्ने पलटे, कुछ सूखे से पत्ते मिले,
न जाने कब ज़िल्द उसकी, वारदात हो गई!
-कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई,
चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई,
वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं,
जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई!
-ऐ दर्द' नक़्श उलझे, अक्स सुलझे, कैसी कयामत, कैसा सफ़र,
एक अरसा गुज़र चुका क्या? सरकार की क्या जात हो गई!
-कल मेरी मेरे मुक़द्दर से मुलाकात हो गई,
चमचमती सुबह से, स्याह रात हो गई,
वो चल रहा था साथ मेरे, पर क्यूँ पता नहीं,
जैसे ही मैं जल गया पूरा, बरसात हो गई!
हर रोज़ हम अपने अपने घर से निकलते हैं, जिंदगी की उस जंग में शामिल होने!😀
-जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के,
जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के,
आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए,
अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के!
-ख़ाक में मिल जाए, या सर क़लम हो जाए चाहे,
कुछ तो कर गुजरेंगे हम, बिना सिपहसालार के!
-जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के,
जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के,
आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए,
अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के!
-ताज मेरे दुश्मनों का, सज नहीं सकता है क्या?
न सोच ग़ुरबत दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के!
-जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के,
जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के,
आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए,
अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के!
-क्यूँ है हसरत सर्द तेरी, क्यूँ कलेजा गर्द है,
होता है ये गर तू निकले, बिना सिपहसालार के!
-जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के,
जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के,
आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए,
अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के!
-हुक्मरानों ने कहा, तू चीज़ क्या, औकात क्या,
सोचा कह दूं, पर नहीं, बिना सिपहसालार के!
-जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के,
जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के,
आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए,
अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के!
-'ऐ दर्द', शर्बत में मिला कर अम्ल दे देते हैं लोग,
बर्बाद हैं जो लड़ पड़ें, बिना सिपहसालार के!
-जंग में निकले अकेले, बिना सिपहसालार के,
जान ले ली दुश्मनों की, बिना सिपहसालार के,
आखिरी जंग काश ये हो, बस यही सोचा किए,
अब नहीं होता गुज़र, बिना सिपहसालार के!
ये पूरी कायनात, एक ऐसे फरेब़ पर चल रही है की जिसे, समझना तो दूर, गिरफ़्त में लाने को कोई कायदा ही नहीं है!👌
-ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह,
ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह,
न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां,
ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह!
-अश्क बहते ही चले, कोई तो रोको इन्हें,
ईज़ाद-ए-हसीं करने वाले, बदगुज़ारी के शहंशाह!
-ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह,
ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह,
न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां,
ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह!
-उस्तादों से जब हम मिले, रश्क़ था अपने ऊपर,
ईज़ाद-ए-कुश्ती करने वाले, बदहवासी के शहंशाह!
-ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह,
ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह,
न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां,
ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह!
-आदाब, सलाम, अर्ज है, हुजूर, बेगम, कमजर्फ़,
ईज़ाद-ए-तमीज करने वाले, बदतमीज़ी के शहंशाह!
-ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह,
ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह,
न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां,
ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह!
-आगे, पीछे और आज लगता है सब एक सा,
ईज़ाद-ए-तारीख़ करने वाले, बदशुमारी के शहंशाह!
-ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह,
ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह,
न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां,
ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह!
-'ऐ दर्द' ये कैसा जूलूस है, देख कैसा है हुजूम,
ईज़ाद-ए-हमाम करने वाले, बदनहाने के शहंशाह!
-ईज़ाद-ए-तहज़ीब करने वाले, बदज़ुबानी के शहंशाह,
ईज़ाद-ए-ज़मीं करने वाले, बदगुमानी के शहंशाह,
न जिक्र है, न फ़िक्र है, कुछ खास मेहमानों की यहां,
ईज़ाद-ए-नवाज़ी करने वाले, बदनवाज़ी के शहंशाह!
क्या आपको चारों तरफ गुरब़त ही गुरब़त नज़र आती है दोस्तों? क्या आप भी ऐसी गुरब़त में रहना चाहते हैं?🤞
-इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है,
पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है,
क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को,
हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!
-देखते ही देखते, दिल में हुए कई छेद,
उस पर भी दिल का कसमसाना, हुनर है!
-इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है,
पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है,
क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को,
हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!
-जो रात में हुई, वो बात नाबात थी,
सुबह हुई, फिर वही बात बताना, हुनर है!
इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है,
पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है,
क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को,
हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!
-आपसे मुख़र हुए, जो इतनी उमर के बाद,
वो नजरों का अब भी झुक जाना, हुनर है!
इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है,
पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है,
क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को,
हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!
-वादा करना, मुस्कुरा के, फिर नज़र आना नहीं,
उसपर भी छोड़ देना ठिकाना, हुनर है!
इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है,
पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है,
क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को,
हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!
-नामचीनों में शुमार, आपका ख़ानाख़ाना,
नजर न आए ख़ानसामा, हुनर है!
इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है,
पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है,
क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को,
हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!
-'ऐ दर्द' तूने अपने पास, रखी थी जो रहगुज़र,
उसपर अकेले ही चलते जाना, हुनर है!
इतनी ग़ुरबत में मुस्कुराना, हुनर है,
पास हो तुम, फिर भी बुलाना, हुनर है,
क़त्ल करके, साफ़ करके दीवारों को,
हर सुबह अदालत को जाना, हुनर है!
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