'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!'

'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!'

By Mahesh Vallabh Pandey 'ऐ दर्द!'ArtsPerforming Arts
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'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!' episodes

  • 5. S01 - E05 ना हो परेशां, इस शहर से नादां! 🙏

    इंसान कुदरती, परेशानियों में रहने का आदी है; परेशानियां ना हों, तो लगता है, जिंदगी ठहर सी गई है!🙏

    -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

    ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

    न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

    या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

    -वो तेरा शहर पुराना, भीड़ में भी है अकेला,

    क्या पता तेरी पनाहों को यहाँ, महफ़िल मिल जाए!

    -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

    ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

    न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

    या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

    -जिंदगी के चंद लम्हे, दे दे इस मांजर को भी,

    कि जब कभी गुजरे यहाँ से, सांस तेरी मिल जाए!

    -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

    ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

    न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

    या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

    -मत सोच क्यूँ कमजर्फ़ हैं सब, क्यूं सभी बेनूर हैं,

    वक्त इतना है कहाँ, कि सबके जवाब मिल जाएं!

    -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

    ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

    न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

    या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

    -मत सोच खुद को अजनबी, इस शहर में तब तलक,

    जब तलक कोई दूजा, अजनबी न मिल जाए!

    -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

    ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

    न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

    या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

    -इंसान जो कुछ चाहता है 'ऐ दर्द', मिलता है किसको कहां,

    इसलि ऐ आशना, सब ठीक है जो मिल जाए!

    -न हो परेशॉं, इस शहर से नादां,

    ना जाने कहां सुकूं मिल जाए,

    न जाने कहां मंजिल हो तेरी,

    या तुझमें किसी को मंजिल मिल जाए!

    6 min
  • 4. S01 - E04 दोस्तों, आपका स्वागत, एहतराम है मेरे इस नए घर में! 🥰

    आई कुछ बातें करते हैं; कुछ एक-दूसरे की सुनते, और कुछ अपनी सुनाते हैं!🤗

    -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात,

    एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात,

    यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों,

    पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात!

    -छोड़ दें कुछ देर को, अपनी बेईमानी लतें,

    मुस्कुरा कर ढायें क़हर, हर किसी पर, तो है बात!

    -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात,

    एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात,

    यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों,

    पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात!

    -तालीम है, वक़्त है और हुनर भी साथ है,

    इस आशियां को बनाएं हम शहर, तो है बात!

    -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात,

    एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात,

    यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों,

    पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात!

    -गम नहीं गर ख्वाब पूरे नहीं हो सकते तो क्या,

    मंजिल-ए-हासिल में छोड़ें, न कोई कसर तो है बात!

    -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात,

    एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात,

    यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों,

    पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात!

    -है यक़ीन, ना था यकीन, कि यूं ही मिल जाओगे तुम,

    खैर, मिलते जो रहो दोबारा, तो है बात!

    -हमसफ़र हैं, हमकदम हैं, हमनज़र हों, तो है बात,

    एक दूजे की पनाहों का असर हो, तो है बात,

    यूं तो हम मिलते हैं, जब नसें गुलजार हों,

    पर ख़िज़ाँ में साथ हों हम अगर, तो है बात!

    6 min
  • 3. S01 - E03 लगभग तीस साल की होने जा रहीं थीं मेरी डायरियॉं!🥰

    इ्न्हें पाल-पोस के बड़ा करना कोई मज़ाक की बात नहीं थी; अपने डैडी, मम्मी, भाईयों और बहनों से छुपते-छुपाते लिखी गईं थीं ये डाएरियॉं!🥰

    -मेरी हर किताब का मसला एक है,

    आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है!

    -ग़म नहीं मुझे, मिले हर दौर में सज़ा,

    जानता हूं मैं कि मेरा काम नेक है!

    -मेरी हर किताब का मसला एक है,

    आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है!

    -सोचता रहा हमेशा, कभी तो वक्त आएगा,

    और कहेगा, कि लिजिये, हालात पेश है!

    -मेरी हर किताब का मसला एक है,

    ​​आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है!

    -सिसकिओं से भर लिया कूचा-ए-दिल तमाम,

    समझे वो कि दीवानों की, यही एक जेब है!

    -मेरी हर किताब का मसला एक है,

    आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है!

    -हम फ़ना होते ही समझे जिंदगी है क्या,

    हर समंदर के तले होती रेत है!

    -मेरी हर किताब का मसला एक है,

    आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है!

    -मैं क्यूँ डरता हूं जमाने से, समझ में आ गया,

    मैं अकेला हूं खड़ा, पर वो एक है!

    -मेरी हर किताब का मसला एक है,

    आख़िर में लिखा मिलेगा, खुदा एक है!

    6 min
  • 2. S01 - E02 आज मैंने अपनी ऐसी ही कुछ डायरियॉं निकालीं आलमारी से! 😊

    जब मैं उनको निकालने गया, तो एक शेल्फ में सारी की सारी आराम से सो रहीं थीं; दराज़ के खुलने की आवाज़ सुनते ही, दो तीन डायरियों ने तो करवट बदल के मुझे देखा और मुस्कुराईं!😊

    -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है,

    न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    -मुझको भी हंसी आती है, जब देखता हूँ आईना,

    न चेहरा बना, न चेहरा छुपा, कि मैं भी तेरे जैसा हूं!

    -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है,

    न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    -इस रंगदारी में कई, कितने हुनर सीखे नहीं,

    इंसान हूं, मौला नहीं, कि मैं भी तेरे जैसा हूं!

    -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है,

    न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    -कई शामें मैंने काटीं हैं, अपने उन जज़्बातों के साथ,

    फ़क्र हुआ ये जान के, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है,

    न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    -हासिल नहीं, तो दर-ब-दर, जाता रहा मैं हर गज़र,

    हासिल नहीं, मुमकिन नहीं, कि मैं भी तेरे जैसा हूं!

    -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है,

    न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    -'ऐ दर्द' उठते बैठते, कोई गिला तो कर जिंदगी से,

    बंद कर दे वर्ना ये कहना, कि मैं भी तेरे जैसा हूं!

    -आ पास आ, न दूर जा, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    न तोड़ कर, न फोड़ कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ,

    मेरे भी अंदर आग है, मेरा लहू भी लाल है,

    न रंग कर, न भंग कर, कि मैं भी तेरे जैसा हूँ!

    9 min
  • 1. S01 - E01 यादें सिमटतीं हैं ऐसे, कि जैसे झुलसीं हुईं हैं!🤗

    🤗क्या आपने कभी डायरी लिखी है दोस्तों? क्या आपने कभी अपनी यादों को किसी डायरी के पन्नों में छुपा के रखा है?

    -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है,

    किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है,

    खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने,

    मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है!

    -हमें न उससे कोई गिला, न एहतराम कोई,

    वो भी हमसे नाखुश, और न कोई खुशी सी है!

    -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है,

    किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है,

    खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने,

    मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है!

    -आग़ाज़ न कर पाए, तो एक ख़लिश सी रही,

    न मेहमां ही मिला, और ख़ुश्क ज़मीन सी है!

    -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है,

    किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है,

    खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने,

    मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है!

    -फ़रोख़्त का हिसाब क्या रखना, जब की उनकी बाबत,

    ना बाज़ार में दिखी, ना नज़र में वो ही है!

    -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है,

    किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है,

    खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने,

    मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है!

    -उम्दा फासाना, उम्दी जुबान, उम्दा तराना,

    मेरी जवानी बे-आबरू, बहुत बड़ी सी है!

    -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है,

    किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है,

    खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने,

    मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है!

    -'ऐ दर्द', मुनव्वर सा है तेरा ठिकाना.

    बस कमी इसमें, कुछ चांद सितारों की है!

    -यादें पन्ने जैसी, ज़िल्द वक़्त सी है,

    किताबें अरमां जैसी, सिलाई सख़्त सी है,

    खुले न खुले ये साफ़ा, कौन जाने,

    मुसन्निस दिलचस्प सा, कहानी मस्त सी है!

    10 min

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'Wah! Ye Diariyaan' 'वाह! ये डायरियॉं' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!