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अनु. ३५२-३६० में आपातकाल से संबंधित विवरण दिए गए हैं। यह ३ प्रकार की होती है।
राष्ट्रीय आपातकाल ३५२
राज्यीय आपातकाल ३५६
वित्तीय आपातकाल ३६०
न्यायिक पुनर्विलोकन, आच्छादन का सिद्धांत और प्रथककर्णीयता का सिद्धांत
राष्ट्रपति की नियुक्ति, कार्यक्षेत्र और शक्तियां
राज्यपाल की नियुक्ति, कार्यक्षेत्र और शक्तियां
१. संविधान का पालन, राष्ट्रीय ध्वज और गीत का आदर
२. राष्ट्रीय नायकों का सम्मान
३. एकता अखंडता की रक्षा
४. समरसता और भाई चारे की भावना
५. देश की रक्षा और बुलाये जाने पर सेवा दें
६. गौरवशाली संस्कृति और समृद्ध परंपरा rich heritage बनाये रखें
७. जंगल, झीलों की रक्षा और सफ़ाई
८. वैज्ञानिक , मानववादी, ज्ञान और सुधार की भावना बनाये रखें
९. सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा
१०. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों में उत्तकर्ष की एयर प्रयास करे
११. ६-१४ की आयु के बालकों के माता पिता का बच्चों की शिक्षा के प्रति दायित्व
राज्य के नीति निदेशक तत्व , संविधान का भाग ४ - अनु. ३६-५१ तक
लक्ष्य: सामाजिक न्याय, आर्थिक लोक तंत्र की नीव, राजनैतिक और आर्थिक अधिकारों का सन्तुला , संसाधनों का न्याय संगत वितरण
विशेषता: क़ानूनी रूप से बाध्य नहीं है, संविधान निर्माताओं के आदर्श, लक्ष्य-उन्मुख।
वर्गीकरण: सामाजिक और आर्थिक न्याय से संबंधित, गांधीवादी विचारों से प्रेरित
वैश्विक शांति और सुरक्षा
शिक्षा और समानता से संबंधित तत्व
यह ५ प्रकार की होती हैं।
१: बंदी प्रत्यक्षीकरण - हेबियस कार्पस - शरीर को प्रस्तुत करो
२: परमादेश - मेंडमस - आदेश देना
३: प्रतिषेध - प्रोहिबिशन - रोक लगाना
४: अधिकार-पृच्छा - क्यो वारंटो - तुम किस अधिकार से हो
५: उत्प्रेषण - सर्टियोरेरी - जाँच और सुधार
अनुच्छेद ३२ उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों का सजग प्रहरी बनता है। उच्चतम न्यायालय रिट जारी कर के मूल अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करता है।
अनु.२५ अंतःकरण और धर्म की स्वतंत्रता देता है। लेकिंग इस से सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य प्रभावित नहीं होना चाहिए।
अनु.२६- धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन
अनु. २७: धर्म के प्रचार में छूट
अनु. २८: धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध
अनुच्छेद 21-A, RTE Act के नाम से जाना जाता है। संविधान के 86 वें संशोधन (2002) के तहत इस अधिकार को जोड़ा गया था। यह अधिकार 6-14 साल के बच्चों के अनिवार्य शिक्षा के लिए बनाया गया।
अनुच्छेद २१ में मेनका गांधी के वाद से पहले और बाद की स्थिति ।
पहले व्याख्या विस्तृत नहीं थी।दैहिक विशेषण लगा कर सीमित कर दिया था।
जबकि बाद में कहा गया कि प्राण का अधिकार केवल बैटिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है । इसके अंतर्गत अन्य अधिकार जैसे जीविकोपार्जन, चिकित्सा, शिक्षा, एकांतता, लोक स्वास्थ्य पर्यावरण जैसे अन्य कई अधिकार शामिल किए गए।
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