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Hindi Cafe episodes

  • "भोर"-Nida Fazli's Hindi Kavita Kavita | Hindi Poetry| Hindi Kavita| Kavitaen

    #HindiKavita#Kavita#HindiPoetry#Hindipoem#

    Shoonya Theatre group presents Nida Fazli's Kavita/ hindi Kavita  "भोर", in this unique and creative art project we try to explore possibilities of Hindi poem through sound ,music and power of narration.


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    1 min
  • कमरे में धूप - Kunwar Narayan's Hindi Kavita by Shoonya Theatre | Recorded Live

    शून्य थियेटर , थियेटर की दुनिया में एक नया प्रयोग कर रहा है शून्य  की टीम अपने दर्शक , श्रोताओं तक घर बैठे पहुँच रही है l आज आपके लिए हिन्दी के बड़े कवि कुंवर नारायण की कविता कमरे में धूप लेकर आए हैं जिसका निर्देशन किया है रमा यादव ने l इस कविता में बहुत सा अभिनय है ..उस अभिनय के लिए आवाज़ दी है सनी ने और उसे संयोजित किया है मयंक ने l कविता का रंगमंच शून्य की अपनी पहचान है ..आपके सामने उसी की एक नयी कड़ी कमरे में धूप ....आइये देखते हैं |



            कमरे में धूप 


    हवा और दरवाजों में बहस होती रही,

    दीवारें सुनती रहीं।

    धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी

    किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।


    सहसा किसी बात पर बिगड़ कर

    हवा ने दरवाजे को तड़ से

    एक थप्पड़ जड़ दिया !


    खिड़कियाँ गरज उठीं,

    अखबार उठ कर खड़ा हो गया,

    किताबें मुँह बाये देखती रहीं,

    पानी से भरी सुराही फर्श पर टूट पड़ी,

    मेज के हाथ से कलम छूट पड़ी।


    धूप उठी और बिना कुछ कहे

    कमरे से बाहर चली गई।


    शाम को लौटी तो देखा

    एक कुहराम के बाद घर में खामोशी थी।

    अँगड़ाई लेकर पलंग पर पड़ गई,

    पड़े-पड़े कुछ सोचती रही,

    सोचते-सोचते न जाने कब सो गई,

    आँख खुली तो देखा सुबह हो गई।




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    5 min
  • "हैरत है"-Nida Fazli's Hindi Kavita Kavita | Hindi Poetry| Hindi Kavita| Kavitaen

    #HindiKavita​#Kavita​#HindiPoetry​#Hindipoem​#

    Shoonya Theatre group presents Nida Fazli's Kavita/ hindi Kavita  "हैरत है", in this unique and creative art project we try to explore possibilities of Hindi poem through sound ,music and power of narration.


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    2 min
  • Feedback - आप सबके सुझाव आमंत्रित हैं

    सभी दर्शकों का पूरे शून्य नाट्य समहू की तरफ से शुक्रिया।  अपने सुझाव अवश्य हमसे साझा करें।



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    4 min
  • "वर्णमाला"-Manglesh Dabral's Hindi Kavita by Dr. Kavita Bhatia

    #HindiKavita​#Kavita​#HindiPoetry​#Hindipoem​#

    मंगलेश डबडाल की कविता का वाचन इस बार डॉ कविता भाटिया द्वारा |


            वर्णमाला


    एक भाषा में अ लिखना चाहता हूँ

    अ से अनार अ से अमरूद

    लेकिन लिखने लगता हूँ अ से अनर्थ अ से अत्याचार

    कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ

    लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से क्रूरता क से कुटिलता

    अभी तक ख से खरगोश लिखता आया हूँ

    लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है

    मैं सोचता था फ से फूल ही लिखा जाता होगा

    बहुत सारे फूल

    घरो के बाहर घरों के भीतर मनुष्यों के भीतर

    लेकिन मैंने देखा तमाम फूल जा रहे थे

    ज़ालिमों के गले में माला बन कर डाले जाने के लिए


    कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है

    भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है

    द दमन का और प पतन का सँकेत है

    आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला

    वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं

    समाज की हिंसा

    ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है

    हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें

    वे ह से हत्या लिखते रहते हैं हर समय ।


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    4 min
  • "कमरा"-Manglesh Dabral's Hindi Kavita Kavita | Hindi Poetry| Hindi Kavita| Kavitaen

    #HindiKavita​#Kavita​#HindiPoetry​#Hindipoem​#

    शून्य नाट्य समूह का नमन हिन्दी के बड़े कवि मंगलेश डबराल के नाम l 


    करोना के इस आपातकाल में मंगलेश डबराल जी का जाना एक बड़ी क्षति है ..एक बहुत बड़ी सादगी का अचानक से चले जाना l मंगलेश जी की सादी कविताओं की ध्वनि दूर तक जाती है l सोते-जागते कविता के माध्यम से शून्य नाट्य समूह दे रहा है अपने प्रिय कवि को सलामी|


    कमरा


    इस कमरे में सपने आते हैं

    आदमी पहुँच जाता है

    दस या बारह साल की उम्र में


    यहाँ फ़र्श पर बारिश गिरती है

    सोये हुओं पर बादल मंडराते हैं


    रोज़ एक पहाड़ धीरे-धीरे

    इस पर टूटता है

    एक जंगल यहाँ अपने पत्ते गिराता है

    एक नदी यहाँ का कुछ सामान

    अपने साथ बहाकर ले जाती है


    यहाँ देवता और मनुष्य दिखते हैं

    नंगे पैर

    फटे कपड़ों में घूमते

    साथ-साथ घर छोड़ने की सोचते


    (1989 में रचित)


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    2 min
  • "तानाशाह"-Manglesh Dabral's Hindi Kavita Kavita | Hindi Poetry| Hindi Kavita| Kavitaen

    #HindiKavita​#Kavita​#HindiPoetry​#Hindipoem​#

    शून्य नाट्य समूह का नमन हिन्दी के बड़े कवि मंगलेश डबराल के नाम l 


    करोना के इस आपातकाल में मंगलेश डबराल जी का जाना एक बड़ी क्षति है ..एक बहुत बड़ी सादगी का अचानक से चले जाना l मंगलेश जी की सादी कविताओं की ध्वनि दूर तक जाती है l सोते-जागते कविता के माध्यम से शून्य नाट्य समूह दे रहा है अपने प्रिय कवि को सलामी|


    तानाशाह


    तानाशाहों को अपने पूर्वजों के जीवन का अध्ययन नहीं करना पड़ता। वे उनकी पुरानी तस्वीरों को जेब में नहीं रखते या उनके दिल का एक्स-रे नहीं देखते। यह स्वत:स्फूर्त तरीके से होता है कि हवा में बन्दूक की तरह उठे उनके हाथ या बँधी हुई मुठ्ठी के साथ पिस्तौल की नोक की तरह उठी हुई अँगुली से कुछ पुराने तानाशाहों की याद आ जाती है या एक काली गुफ़ा जैसा खुला हुआ उनका मुँह इतिहास में किसी ऐसे ही खुले हुए मुँह की नकल बन जाता है। वे अपनी आँखों में काफ़ी कोमलता और मासूमियत लाने की कोशिश करते हैं लेकिन क्रूरता एक झिल्ली को भेदती हुई बाहर आती है और इतिहास की सबसे क्रूर आँखों में तब्दील हो जाती है। तानाशाह मुस्कराते हैं, भाषण देते हैं और भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि वे मनुष्य है, लेकिन इस कोशिश में उनकी भंगिमाएँ जिन प्राणियों से मिलती-जुलती हैं वे मनुष्य नहीं होते। तानाशाह सुन्दर दिखने की कोशिश करते हैं, आकर्षक कपड़े पहनते हैं, बार-बार सज-धज बदलते हैं, लेकिन यह सब अन्तत: तानाशाहों का मेकअप बनकर रह जाता है।

    इतिहास में कई बार तानाशाहों का अन्त हो चुका है, लेकिन इससे उन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें लगता है वे पहली बार हुए हैं।



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    4 min
  • "माँ की तस्वीर"-Manglesh Dabral's Hindi Kavita by Dr. Nisha Nag Purohit

    मंगलेश डबडाल की कविता का वाचन इस बार डॉ निशा नाग द्वारा जो की शून्य नाट्य समूह की एक सुधी दर्शक तो हैं ही साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हिन्दी की प्रवक्ता हैं ।


            माँ की तस्वीर


    घर में माँ की कोई तस्वीर नहीं

    जब भी तस्वीर खिंचवाने का मौक़ा आता है

    माँ घर में खोई हुई किसी चीज़ को ढूंढ रही होती है

    या लकड़ी घास और पानी लेने गई होती है

    जंगल में उसे एक बार बाघ भी मिला

    पर वह डरी नहीं

    उसने बाघ को भगाया घास काटी घर आकर

    आग जलाई और सबके लिए खाना पकाया


    मैं कभी घास या लकड़ी लाने जंगल नहीं गया

    कभी आग नहीं जलाई

    मैं अक्सर एक ज़माने से चली आ रही

    पुरानी नक़्क़ाशीदार कुर्सी पर बैठा रहा

    जिस पर बैठकर तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं

    माँ के चहरे पर मुझे दिखाई देती है

    एक जंगल की तस्वीर लकड़ी घास और

    पानी की तस्वीर खोई हुई एक चीज़ की तस्वीर


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    2 min
  • "सोते-जागते"-Manglesh Dabral's Hindi Kavita Kavita | Hindi Poetry| Hindi Kavita| Kavitaen

    #HindiKavita#Kavita#HindiPoetry#Hindipoem#

    शून्य नाट्य समूह का नमन हिन्दी के बड़े कवि मंगलेश डबराल के नाम l 


    करोना के इस आपातकाल में मंगलेश डबराल जी का जाना एक बड़ी क्षति है ..एक बहुत बड़ी सादगी का अचानक से चले जाना l मंगलेश जी की सादी कविताओं की ध्वनि दूर तक जाती है l सोते-जागते कविता के माध्यम से शून्य नाट्य समूह दे रहा है अपने प्रिय कवि को सलामी|


    सोते-जागते


    जागते हुए मैं जिनसे दूर भागता रहता हूँ

    वे अक्सर मेरी नीन्द में प्रवेश करते हैं


    एक दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने से बचता हूँ

    लेकिन वह मेरे सपने में प्रकट होता है

    जिस पर कुछ दूर तक चढ़ने के बाद कोई रास्ता नहीं है

    और सिर्फ़ नीचे एक अथाह खाई है


    जागते हुए मैं एक समुद्र में तैरने से बचता हूँ

    सोते हुए मैं देखता हूँ रात का एक अपार समुद्र

    कहीं कोई नाव नहीं है और मैं डूब रहा हूँ

    और डूबने का कोई अन्त नहीं है


    जागते हुए मैं अपने घाव दिखलाने से बचता हूँ

    ख़ुद से भी कहता रहता हूँ — नहीं, कोई दर्द नहीं है

    लेकिन नीन्द में आँसुओं का एक सैलाब आता है

    और मेरी आँखों को

    अपने रास्ते की तरह इस्तेमाल करता है


    दिन भर मेरे सर पर

    बहुत से लोगों का बहुत सा सामान लदा होता है

    उसे पहुँचाने के लिए सफ़र पर निकलता हूँ

    नीन्द में पता चलता है, सारा सामान खो गया है

    और मुझे ख़ाली हाथ जाना होगा


    दिन में एक अत्याचारी-अन्यायी से दूर भागता हूँ

    उससे हाथ नहीं मिलाना चाहता

    उसे चिमटे से भी नहीं छूना चाहता

    लेकन वह मेरी नीन्द में सेन्ध लगाता है

    मुझे बाँहों में भरने के लिए हाथ बढ़ाता है

    और इनकार करने पर कहता है

    इस घर से निकाल दूँगा, इस देश से निकाल दूँगा


    कुछ ख़राब कवि जिनसे बचने की कोशश करता हूँ

    मेरे सपने में आते हैं

    और इतनी देर तक बड़बड़ाते हैं

    कि मैं जाग पड़ता हूँ घायल की तरह ।



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