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शून्य नाट्य समूह का नमन हिन्दी के बड़े कवि मंगलेश डबराल के नाम l
करोना के इस आपातकाल में मंगलेश डबराल जी का जाना एक बड़ी क्षति है ..एक बहुत बड़ी सादगी का अचानक से चले जाना l मंगलेश जी की सादी कविताओं की ध्वनि दूर तक जाती है l सोते-जागते कविता के माध्यम से शून्य नाट्य समूह दे रहा है अपने प्रिय कवि को सलामी|
जागते हुए मैं जिनसे दूर भागता रहता हूँ
वे अक्सर मेरी नीन्द में प्रवेश करते हैं
एक दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने से बचता हूँ
लेकिन वह मेरे सपने में प्रकट होता है
जिस पर कुछ दूर तक चढ़ने के बाद कोई रास्ता नहीं है
और सिर्फ़ नीचे एक अथाह खाई है
जागते हुए मैं एक समुद्र में तैरने से बचता हूँ
सोते हुए मैं देखता हूँ रात का एक अपार समुद्र
कहीं कोई नाव नहीं है और मैं डूब रहा हूँ
और डूबने का कोई अन्त नहीं है
जागते हुए मैं अपने घाव दिखलाने से बचता हूँ
ख़ुद से भी कहता रहता हूँ — नहीं, कोई दर्द नहीं है
लेकिन नीन्द में आँसुओं का एक सैलाब आता है
अपने रास्ते की तरह इस्तेमाल करता है
बहुत से लोगों का बहुत सा सामान लदा होता है
उसे पहुँचाने के लिए सफ़र पर निकलता हूँ
नीन्द में पता चलता है, सारा सामान खो गया है
और मुझे ख़ाली हाथ जाना होगा
दिन में एक अत्याचारी-अन्यायी से दूर भागता हूँ
उससे हाथ नहीं मिलाना चाहता
उसे चिमटे से भी नहीं छूना चाहता
लेकन वह मेरी नीन्द में सेन्ध लगाता है
मुझे बाँहों में भरने के लिए हाथ बढ़ाता है
इस घर से निकाल दूँगा, इस देश से निकाल दूँगा
कुछ ख़राब कवि जिनसे बचने की कोशश करता हूँ
और इतनी देर तक बड़बड़ाते हैं
कि मैं जाग पड़ता हूँ घायल की तरह ।
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