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शून्य नाट्य समूह का नमन हिन्दी के बड़े कवि मंगलेश डबराल के नाम l
करोना के इस आपातकाल में मंगलेश डबराल जी का जाना एक बड़ी क्षति है ..एक बहुत बड़ी सादगी का अचानक से चले जाना l मंगलेश जी की सादी कविताओं की ध्वनि दूर तक जाती है l 1970 में लिखी उनकी वसंत कविता के माध्यम से शून्य नाट्य समूह दे रहा है अपने प्रिय कवि को सलामी|
जल्दी से वह पहुँचना चाहती थी
उसके पानी में नहाने जा रहा था
लोगों का इन्तज़ार कर रही थी
हम अपने चेहरे देखते थे हिलते हुए
अपने तटों और पत्थरों को प्यार करती
उस नदी से शुरू होते थे दिन
तमाम खिड़कियों पर सुनाई देती थी
लहरें दरवाज़ों को थपथपाती थीं
यहाँ थी वह नदी इसी रेत में
जहाँ हमारे चेहरे हिलते थे
यहाँ थी वह नाव इंतज़ार करती हुई
सिर्फ़ रात को जब लोग नींद में होते हैं
कभी-कभी एक आवाज़ सुनाई देती है रेत से
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