नैनीताल में रहने की बात ही कुछ अलग है. अभी मैं वहां के कॉलेज और स्कूल की बातें नहीं कर रही हूँ, वह सब एक अलग दुनिया है. उसका वर्णन मुझे निश्चित ही किसी अलग दिशा में ले जाएगा. वह अनुभव भी एक अच्छा अनुभव था जो अकसर मेरी उम्र के लोगों को हुआ ही होगा. मैं उन किस्सों की पात्र कभी नहीं रही लेकिन लिखने का शौक है, तो मस्तिष्क स्वयं ही उस उधेड़ बुन में घुस कर किस्से निकाल ही लाता है.खैर, नैनीताल का मौसम और वहां के पहाड़ और दीवारों पर लगे सफेद फूल, ये तीनों को मैं अपने विचारों से हटा नहीं सकती. उन सफेद फूलों का नाम तो मुझे आज भी नहीं पता, लेकिन वो मेरे 3 साल के सफर के सबसे अच्छे साथी थे. जब भी कहीं अकेले जाना हुआ तो नैनीताल की सड़कों ने एक हमसफ़र की भूमिका निभाने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी और उस समय मेरे हमसफ़र बने नैनीताल की सड़कों किनारे, दीवारों पर लगे सफेद और गुलाबी छोटे-छोटे फूल.7मैं जब भी कहीं जाती थी, तो कुछ फूलों को साथ तोड़कर ले जाया करती थी और वापस आकर उन्हें अपनी कॉपी किताबों की अलमारी के ऊपर खिड़की के किनारे रख दिया करती थी. वे फूल हमेशा मेरे साथ रहे हैं, चाहे मैं खुद के साथ अकेली थी या अपने दोस्तों के साथ. उन्होंने मेरा साथ मेरे हर अकेलेपन में दिया है. जब मैं अपनी पढ़ाई खत्म करके घर आ रही थी, तो भी मैं उन सूखे हुए फूलों को अपने साथ एक कागज़ में बाँध कर लेकर आई. जब भी मैं उन फूलों को अपने पास रखा देखती थी, एक अपना सा एहसास होता था. साथ ही ये भी याद रहता था कि घर से कहीं दूर रहने पर, कैसे किसी सजीव साथी का मिलना किसी निर्जीव वस्तु से ज्यादा पर्याप्त है. काश इसी तरह मैं उन पहाड़ों को भी अपने साथ ला पाती.ऊँचे शिखर वाले बड़े-बड़े पहाड़ और उनके बीच से निकलता सूरज. ऐसा प्रतीत होता है जैसे सूर्यदेव स्वयं ही अपने दर्शन देते हों और साथ में चिड़ियों की आवाज़ मानो जैसे संगीत से सुरीले-सुर कानों को मोहित करती हो. वे सुहावने दृश्य तो आज भी मेरी आँखों के सामने बिल्कुल वैसे ही सजीव हैं. ऐसे ही दृश्यों के आनंद लेने लोग टिफिन-टॉप, नैना-पीक, हिमालय दर्शन या कभी-कभी झील के किनारे भी जाया करते हैं.पास में ही बन नंदा सुनंदा का मंदिर, नैना देवी मंदिर और गुरुद्वारा इन दृश्यों को एक पवित्रिक माहौल देता है.नैनीताल की ठंडी सड़क और मॉल रोड जो अपने अंदर कई किस्से समेटे हुए हैं, मुझे बहुत याद आती है. बहुत याद आता है बड़ा बाजार से नमकीन वाले दाज्यू के यहाँ से नमकीन लेते हुए हंसी ठिठोली करना और चाइनीज किचन के मोमोज़ का स्वाद. नेगी दाज्यू के यहाँ की दही–जलेबी सब कुछ वाक़इ बहुत याद आता है. इसी तरह, इन सभी यादों को समेटकर ,नैनीताल को मैंने अपने अंदर संजोया हुआ है.