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दिल्ली विश्वविद्यालय अपने छात्र संघ चुनाव के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यह छात्रों के बीच त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। बड़े ही उत्साह और उमंग के साथ, छात्र इसमें भाग लेते हैं। परंतु, इन चुनावों में बहुत सी कमियाँ हैं। चुनाव के समय के वातावरण और पूरे साल के वातावरण में ज़मीन आसमान का फ़र्क होता है। जहाँ एक ओर, पूरे साल हर तरह की मुश्किलें छात्रों को सताती हैं, दूसरी ओर, वही मुश्किलें चुनाव के वक्त वोट माँगने का मुद्दा बन जाती हैं।
हमारे पॉडकास्ट – खिड़की, के अंदर ऐसे ही कुछ विषयों पर चर्चा करने आप सभी के समक्ष आ रहे हैं हर्ष एवं शुभांगी।
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कुछ किस्से सामने आ जाते हैं और कुछ हमेशा के लिए दफ़्न हो जाते हैं। कुछ ऐसी ही दशा हो गयी है हमारे समाज में महिलाओं की। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि ऐसे तत्वों का भारतीय समाज पर क्या प्रभाव होता है? समझिये बलात्कारियों की मानसिकता, समाज की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया का महत्व। श्रिया और तुषार के साथ जुड़ें इस चर्चा में जो आपको अपने आस-पास की स्थितियों पर गौर करने पर मजबूर कर देगी।
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जानिए भारत में खेलों के बदलते परिदृश्य के बारे में 'खिड़की - खेलों का बदलता महत्त्व' के नए एपिसोड में। क्रिकेट की बढ़ती लोकप्रियता से लेकर उभरते खेलों तक, हम चर्चा करेंगे कि कैसे खेलों के प्रति देश की दीवानगी समय के साथ बदल गई है। सुनिए ऐतिहासिक जीत, नए खेलों की पहचान, और बेहतर सुविधाओं के प्रभाव के बारे में। सुयश और सुमित के साथ जुड़ें इस रोचक बातचीत के लिए, जो दिखाएंगे कि खेल भविष्य को कैसे आकार दे रहे हैं।
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शिक्षा मनुष्य के जीवन में प्रकाश की तरह होती है, जो अज्ञानता के अंधकार को दूर करती है। यह व्यक्ति को आत्मनिर्भर और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाती है। देश की शिक्षा व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि देश का भविष्य कैसा होगा? वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बहुत-सी कमियाँ हैं, जिनको पूरा करने के लिए हमारी सरकार एक ठोस कदम पर पहुँची है। नई शिक्षा नीति। नई नीति, नई योजना, नया विकास। इसी विषय पर चर्चा करने आप सभी के समक्ष आ रहे हैं - गरिमा, जाह्नवी एवं शुभांगी।
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"हमारे समाज में इंसान को इंसान बाद में पहले स्त्री या पुरुष समझा जाता है।" प्राचीन काल से ही इस समाज में एक स्त्री व पुरुष के लिए अलग-अलग मानदंड स्थापित हैं। खिलौनों से लेकर बड़े होकर लिए जाने वाले फैसलों तक सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप लड़का हैं या लड़की ।
आज इस पॉडकास्ट के माध्यम से दिव्या व समीक्षा इन्हीं जेंडर स्पेसिफिक नॉर्म्स पर चर्चा कर हमें बताएँगें कि किस तरह ये जेंडर स्पेसिफिक नॉर्म्स बचपन से लेकर बड़े होने तक एक इंसान की जिंदगी को सिर्फ प्रभावित ही नहीं करते बल्कि तबाह करके रख देते हैं |
आइए विचारों की इस खिड़की से झाँकें हमारे समाज की असलियत!
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प्रवेश परीक्षाओं का मूल उद्देश्य योग्य छात्रों का निष्पक्ष चयन करना है, लेकिन आज के दौर में यह उद्देश्य कहीं खो-सा गया है। एक तरफ जहाँ छात्र दिन-रात मेहनत कर देश की कठिन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वहीं दूसरी ओर हमें आए दिन घोटालों की खबरें सुनने को मिलती हैं। जब लगातार मेहनत के बावज़ूद भी सफलता हाथ नहीं लगती, तो छात्रों पर इसका क्या असर पड़ता है? प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन में ऊँच-नीच, कैसे हमारे देश को कमज़ोर कर सकती है? ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब देने आपके समक्ष आ रहे हैं, हर्षिता, सृष्टि और शुभांगी।
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क्या आपको भी युवावस्था बहुत आकर्षक लगती थी? परंतु युवावस्था में आने के बाद क्या आपके विचार अभिन्न रहे हैं? हमें पूरा विश्वास है कि आपके विचारों में बदलाव ज़रूर आया होगा। मानसिक तनाव को झेलने से लेकर माता-पिता की उम्मीदों पर खरा उतरना, हर मुसीबत का सामना करना पड़ता है एक युवा को। तो चलिए लेकर चलते हैं आपको हमारे पॉडकास्ट के एक नए एपिसोड में, जहाँ कृतिका, श्रिया और भरत आपको इन्हीं उलझनों से मिलाकर उसे सुलझाने के लिए हमारे ग्रंथों में छिपे ज्ञान के मोतियों को चुनेंगें।
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आज हम जो ये आज़ादी की ज़िंदगी जी रहे है, बेख़ौफ़ होकर खुली हवा में साँस ले रहे है, इसके पीछे है वो सभी स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने भारत की इस पावन धरा को अंग्रेज़ो की बेड़ियों से आज़ाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। लेकिन आज इसी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए, भारत की सरहदों पर हमारे सैनिक सीना तान कर खड़े है, और जब भी बात देश की होती है, वो अपना बलिदान देने में संकोच नहीं करते। आज राजीव और शिवेन आपको रूबरू कराएंगें कुछ ऐसे ही योद्धाओं से जिन्होंने वीरता की ऐसी मिसाल रची जो ये देश कभी नहीं भूल सकता, हम सभी उनके ऋणी है और सदा रहेंगे।
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संसार के सभी व्यक्तियों का एक समान ख्वाब जरूर होता है, और वह यह, कि उनके द्वारा किए गए संघर्ष को पहचान मिले, उनके काम की सराहना हो व समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा मिले। और इसी ख्वाब को मुकम्मल करने के लिए दिन-रात वे प्रयत्न करते हैं।
मगर क्या सभी को उनके संघर्षों का फल प्राप्त होता है? क्या हर व्यक्ति के काम को समान दृष्टि से देखा जाता है? क्या हर किसी को उसकी भागीदारी के लिए याद किया जाता है? तो उत्तर है नहीं। कई संघर्ष ऐसे भी हैं, जिन्हें किताबों में नहीं लिखा गया है, जिनका जिक्र टेलीविजन पर नहीं हुआ है, और जिन्हें अखबार के कॉलम में प्रकाशित नहीं किया गया है। ऐसे संघर्ष जो आजीवन संघर्ष बनकर रह गए।
आज पूर्णिमा, खुशम, हिमांशु एवं अनुष्का यादव ऐसे ही एक वर्ग की बात करने वाले हैं, जिनका संघर्ष आज भी अंदेखा और अनकहा है। जिन्होंने विभिन्न प्रकार से समाज की प्रगति में अपना योगदान दिया है मगर फिर भी उन्हें अपने हितों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
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यह कहानी उन दर्दनाक परिस्थितियों को उजागर करती है, जिनमें पूरे परिवार दहेज की वजह से उजड़ जाते हैं। लाडो, एक मासूम और खुशहाल लड़की, इस कहानी की नायिका है, जिसके सपने दहेज की काली छाया से धुँधले हो जाते हैं। लाडो का परिवार, जो कि एक छोटे से गाँव में रहता है, अपनी बेटी की शादी के लिए बड़ी उम्मीदों के साथ तैयारियाँ करता है। लेकिन जैसे-जैसे शादी की तारीख नज़दीक आती है, दहेज की माँगें उनके जीवन पर काले बादल की तरह मँडराने लगती हैं। इस कहानी में देवराज कुमार, लाल बहादुर मौसम , तृप्ति सिंह, तेजस , प्रकृति प्रिया, और आर्यन कुमार साथ मिलकर एक प्रश्न उठाते हैं - क्या हम इस अन्याय को सहते रहेंगें, या इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाएंगें?
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