Listen with Irfan

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By S.M.IrfanArtsPerforming Arts
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Listen with Irfan episodes

  • Kajri 1 | Archive | Songs of Monsoon

    Curated by Irfan . A selection from the vast digitised repository. 

    Kajris featuring

    Rasoolan Bai, 

    Shobha Gurtu, 

    Dr. Anita Sen, 

    Sundarabai, 

    Ram Prasad Mishra, 

    Begum Akhtar, 

    Kundan Lal Saigal, 

    Girija Devi,

    Lakshmi Shankar.

    Purnima Chaudhury

    Chhannulal Mishra, 

    Janaki Bai

    Cover Designed by irfan

    2 hr 43 min
  • Rasoolan Bai | Rare Interviews

    Talking to Naina Devi and Acharya Brihaspati

    Bank Name: State Bank Of India
    Name: SYED MOHD IRFAN
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    Branch: State Bank of India, Sansadiya Saudh, New Delhi
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    Cover Art Irfan

    30 min
  • What is Creativity | Prof Aijaz Ahmad

    The full text of an article published in Kathan 2002 titled Srijanatmakta Hamesha Samajik Hoti Hai. Irfan's Voice "सृजनशीलता केवल कवियों, गायकों, चित्रकारों या किसी और तरह के कलाकारों में ही नहीं, बल्कि सभी मनुष्यों में होती है। और वह कोई व्यक्तिगत गुण नहीं, मनुष्य मात्र का गुण है। आप गोरे हैं या काले, हिंदू है या मुसलमान, ऊंची जाति के हैं या नीची जाति के, एक भाषा बोलते हैं या दूसरी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप भाषा को समाज से लेते हैं और उसे अपने तौर पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन उसका इस्तेमाल आप दूसरों से बात करने या संप्रेषण के लिए करते हैं। यह एक सामाजिक क्रिया है और बड़ी सर्जनात्मक क्रिया है। इसलिए सृजनशीलता के बारे में पहली और बुनियादी बात यह है कि वह हमेशा सामाजिक होती है। भाषा के जरिए आप समाज से अपने संबंध बनाते हैं- प्यार के, नफरत के, घर के, बाहर के, बौद्धिक, भावनात्मक, शारीरिक सब तरह के संबंध। और संबंध बनाना बड़ा ही सृजनात्मक कार्य है। आप मन ही मन किसी से प्रेम करते हैं और कहते नहीं हैं, तो उस व्यक्ति से आपका कोई संबंध नहीं बनता। इसलिए मैं अपने छात्रों से कहता हूं कि जो तुमने किताब में पढ़ा है, उस पर बात करो क्योंकि जो बात तुम कह नहीं सकते वह तुम सोच भी नहीं सकते। अगर तुम्हारा ख्याल है कि तुमने सोचा तो है, पर तुम उसे कह नहीं पा रहे हो, तो तुम्हारा ख्याल गलत है। असल में तुमने सोचा ही नहीं है। जो तुम ने किताब में पढ़ा है, उससे तुम्हारा संबंध बना ही नहीं है।" सृजनशीलता हमेशा सामाजिक होती है। ~प्रो. एजाज़ अहमद साभार कथन Image Courtesy R Ravindran Cover Art Irfan. Bank Name: State Bank Of India Name: SYED MOHD IRFAN Account No: 00000032188719331 Branch: State Bank of India, Sansadiya Saudh, New Delhi IFSC–SBIN0003702 UPI/Gpay ID irfan.rstv@oksbi

    1 hr
  • Aur Sunao Guru | Epi 18 | Priyanka Sharma

    Conceived, Recorded and Produced by Irfan

    Recorded on 19 December 2020 at Silly Souls Studio, Delhi
    Priyanka Sharma is a known actor and director based in Delhi. She also organises worksops and festivals to inculcate interest in theatre and msic among youngs.
    Aur Sunao Guru is a series of cherishable memories and anecdotes from the lives of friends and famous/promising and anonymous people.
    Other episodes in this series are available on the following link.
    Playlist ASG on YouTube https://youtube.com/playlist?list=PLkZc35eAXRloea3aiLn5-_jHjb9rE3OuJ

    Cover Photo and Art: Irfan

    7 min
  • Pramod Singh | Podcast 14 | Sukh Ka Dawai

    Conceived, recorded and produced by Pramod Singh

    Cover Image: Pramod Singh's FB profile

    Cover Art: Irfan

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    6 min
  • Meri Filmi Atmakatha 19 Last Part | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "कामयाबी के बाद मेरी किस्मत में भी अपनी आत्मा के साथ समझौता करना ही लिखा था। बिमल रॉय का व्यंग्य सही था। मगर समय से पहले किया गया था।

    मैंने चार्ली चैप्लिन की आत्मकथा बड़े शौक से पढ़ी है। मुझे लगा कि जहां तक वह महान कलाकार अपनी गरीबी और गुमनामी के दिनों का वर्णन करता है, उसकी जिंदगी की कहानी बेहद दिलचस्प बनी रहती है। पर कामयाबी के दौर की शुरुआत होते ही वह फीकी पड़ने लगती है। तब चैप्लिन व्यक्तिगत समस्याओं और लॉर्ड-लेडियों की दोस्ती में खोया हुआ प्रतीत होता है, जैसे आत्मिक रूप से छोटा होता जा रहा हो, हालांकि उस दौर में उसने ही संसार को 'गोल्डरश' 'मॉडर्न टाइम्स' ग्रेट डिक्टेटर' और 'मोस्यू वर्द' जैसी महान फ़िल्में दीं। अजीब सा विरोधाभास है यह।

    कहां राजा भोज, कहां गंगवा तेली ! कहां चार्ली चैप्लिन, कहां मेरे जैसा अदना आदमी। जितना नगण्य मैं, उतनी मेरी सफलता नगण्य। फिर भी मैं यह कहने का साहस जरूर करूंगा कि कलाकार की जिंदगी विरोधाभासों और विषमताओं से भरी होती है। उसके चरित्र की कमजोरियां और सीमाएं भी कई बार उसके कलात्मक विकास का स्रोत बन जाती हैं।

    अब तक जितनी फिल्मों में मैंने काम किया है उनके नाम गिनाते आया हूं। 10 सालों में 10 फिल्में। पर अगले, यानी कामयाबी के 18 सालों में 100 से ज्यादा फिल्मों में काम कर गया। कश्ती ठहरे हुए पानी में सपने की तरह थिरकती चली गई। निर्माता और नोटों के बंडल हवा-पानी की तरह हो गए, जिन्हें इस्तेमाल करता हुआ आदमी कभी सोचता भी नहीं है।"

    ~बलराज साहनी, मेरी फिल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    16 min
  • Meri Filmi Atmakatha 18 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "दोपहर का समय था। गर्मी बहुत थी। कैमरा एक ट्रक में छिपाकर लगाया गया था। सारी यूनिट उस ट्रक पर सवार थी। रुमाल का इशारा पाते ही मैं रिक्शा लेकर दौड़ पड़ता। कभी सवारी उतारता, कभी नई सवारी लेता। कभी दो सवारियां, कभी तीन। प्यास के मारे बुरी हालत थी लेकिन ट्रकवालों को रोकना संभव नहीं था। एक जगह सड़क के किनारे मैंने एक पंजाबी सरदार का ढाबा देखा तो कुछ क्षणों के लिए रिक्शा एक ओर खड़ा करके भागता हुआ वहां गया और बड़े अपनत्व से पंजाबी में बोला भराजी बहुत सख्त प्यास लगी है, एक गिलास पानी पिलाने की किरपा कीजिए।

    'दफा हो जा तेरी बहन की...' उसने मुझे घूँसा दिखाकर कहा।

    एक पंजाबी आदमी रिक्शा चलाने का घटिया काम करे, यह उसे शायद सहन नहीं हो पाया था।  मेरे मन में आया कि उसे अपनी असलियत बताऊं और दो-चार खरी-खोटी सुनाऊँ पर इतना समय नहीं था।

    एक पानवाले की दुकान पर मैंने गोल्ड फ्लैक सिगरेट का पैकेट मांगा और साथ ही पाँच रुपये  का नोट उसकी ओर बढ़ाया। पानवाले ने कुछ देर मेरा हुलिया देखा, फिर नोट लेकर उसे धूप की ओर उठाकर देखने लगा कि कहीं नकली न हो। आखिर कुछ देर सोचने के बाद उसने मुझे सिगरेट का पैकेट दिया। अगर वह मुझे पुलिस के हवाले भी कर देता तो कोई हैरानी ना होती।  चौरंगी में शूटिंग करते समय भीड़ जमा होने लगी थी। विमल राय ने मुझे और निरूपा रॉय को कुछ देर के लिए किसी होटल में चले जाने को कहा। हम फर्षो रेस्त्रां में दाखिल हुए तो वेटरों ने हमें धक्के देकर बाहर निकाल दिया। हम भारतीय सभ्यता और उसके मानवतावादी मूल्यों की डींगें मारते नहीं थकते, पर हमारे देश में सिर्फ पैसे की क़द्र है, आदमी की क़द्र  नहीं है। यह बात मैंने उस शूटिंग के दौरान साफ तौर पर देख ली थी। हमारे देश में गरीब आदमी के पास पैसा हो तो भी उसे चीज नहीं मिलती यह हमारी सभ्यता की विशेषता है।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा (पॉडकास्ट एपिसोड 18 से अंश)


    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    24 min
  • Meri Filmi Atmakatha 17 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "हेलेन उस समय चौदह पंद्रह साल की बड़ी ही सुंदर लड़की थी। बस, गुड़िया सी लगती थी। वह अपनी मां के साथ बर्मा से नयी नयी आई थी। उस समय उसे न नाचना आता था, न हिंदी बोलनी आती थी। शिक्षा की ओर से भी वह कोरी थी। लेकिन इस सब कुछ के बावजूद, वह फिल्मी भेड़ियों को बहुत जल्द पहचान गई। मां को तो पैसों के लालच में भविष्य उजला  प्रतीत हुआ पर हेलेन को नहीं। वह जल्दी ही अपनी मां से पीछा छुड़ाकर प्रोड्यूसर पीएम अरोड़ा के साथ जुड़ गई। यद्यपि वह उम्र में उसके पिता के बराबर थे। इस प्रकार वह न सिर्फ सुरक्षित होकर जीवन बिताने लगी बल्कि नृत्य कला और अभिनय में भी उसने भरपूर विकास किया। मेरे दिल में हेलेन के व्यक्तित्व के लिए गहरा सम्मान है। अगर वह मां का कहना मानकर पैसा कमाने वाली मशीन बन जाती तो कहीं की न रहती।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Audio Edited by Narendra Singh Dhakad

    Cover Designed by Irfan

    18 min
  • Meri Filmi Atmakatha 16 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "वहां से सेट तक अहाते में कई चमचमाती हुई मोटरें खड़ी थीं। मैंने इधर-उधर देखा और एक दो  पर थूका। फिर बाकी मोटरों पर मन ही मन थूका। जब मैं सेट पर पहुंचा तो अनवर (अभिनेता) की तरफ ऐसी हिकारत से घूरकर देखा जैसे वे सचमुच अपनी बहन (मीना कुमारी) के टुकड़ों पर पलते हैं (आज यह सब सोचकर मन में बड़ी ग्लानि होती है)। और जब अनवर ने मेरी नजर के सामने आंखें झुका लीं तो मैंने जीत का गुरूर महसूस किया।

    (फिल्मों के) इस समाज में हर आदमी दूसरे आदमी का दुश्मन है। इसीलिए तो इस किस्म के फिल्मी मुहावरे सुनाई देते हैं 'वह उसे खा गया' 'वह उस पर छा गया'। आज देखता हूं कि कौन मुझे खाता है और कौन मुझ पर छाता है, मैं अपने मन में बार-बार कह रहा था। अजीब बात थी के पूरे दृश्य के संवाद मुझे अपने आप याद हो आए। रिहर्सल में मैं इस तरह बोला जैसे बाज चिड़िया पर झपटता है। जिया (सरहदी) ने मुझे सीने से लगा लिया। मेरे पास खड़े मेरे गुरु (सरीखे) नागरथ की आंखें चमक रही थीं। उस दिन खुशी भरे वातावरण में शूटिंग हुई। पूरे स्टूडियो में जैसे नया खून दौड़ गया।

    कहावत है ना कि चूहा सोंठ का टुकड़ा पाकर पंसारी बन बैठा था। मैं भी नफरत पाकर कलाकार बन गया। अगर मेरा रोल या वह दृश्य किसी और मूड का होता तो यह नफरत काम न आती। और क्योंकि मुझे वह नफरत रास आ गई थी, इसलिए वह सब रोगों की दवा प्रतीत होने लगी। मैं जिया की उम्मीदों पर कुछ-कुछ पूरा उतरने लगा। मैं जो कुछ कर रहा था वह फिल्म अभिनय की दृष्टि से घटिया था। पर उस पात्र के संदर्भ में वह बहुत अनुकूल और सही था। मेरी कश्ती भंवर में से निकल आई। खुशकिस्मती से संवाद काव्यात्मक और नाटकीय थे।

    छोटी सी हार पर हौसला छोड़ देना और छोटी सी जीत पर फूल कर कुप्पा हो जाना अनाड़ी कलाकार की पहली निशानी है। ज्यों ही मेरी गाड़ी चल पड़ी, मैं दोस्तों-साथियों में बैठकर बढ़- चढ़कर बातें करने लगा।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    26 min
  • Sneak Peak | Pillars of Parallel Cinema

    We invite you to immerse yourself in the world of parallel cinema in India. This series, woven around the book Pillars of Parallel Cinema by the eminent film scholar and filmmaker OP Srivastava, aims to offer 50 episodes, each providing an overview of the 50 path-breaking Hindi movies discussed in the 284-page book. These podcasts are designed to give you a sonic experience of these remarkable films, which have redefined storytelling.


    Narrated, Devised and Produced by Irfan

    4 min

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