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By S.M.IrfanArtsPerforming Arts
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  • Meri Filmi Atmakatha 15 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "नाबालिग बच्चे का अकेले काम पर जाना ठीक नहीं समझा जाता। उसके साथ घर के किसी न किसी व्यक्ति का जाना जरूरी है। परीक्षित के साथ स्टूडियो जाने में मेरे स्वाभिमान को चोट पहुंचती थी। इस प्रकार मैं लोगों की नजरों में बच्चे से काम कराने वाला बेरोजगार बाप बन जाता। परीक्षित को तो मैंने मर्द बनने के लिए मना लिया था। लेकिन मैं खुद मर्दानगी से परिस्थितियों का मुकाबला करने लायक न बन सका। मैंने यह सोचकर खुद को तसल्ली दे दी कि नितिन बोस और दिलीप कुमार परीक्षित को अपने बच्चों की तरह समझते हैं और उसका पूरा ख्याल रखते होंगे।

    मैं यह भी देखता था कि स्टूडियो से लौटने पर परीक्षित हमेशा खुश नजर आता था। एक दिन मैं मोटरसाइकिल पर सेंट्रल स्टूडियो के सामने से गुजर रहा था कि परीक्षित से मिलने अंदर चला गया बड़ा। डरावना दृश्य था वह, जिसकी शूटिंग की जा रही थी। एकदम अंधेरी रात, आंधी तूफान, वीरान जंगल और परीक्षित एक बेसहारा मासूम बच्चे के रूप में भटक रहा है। वह चीखता चिल्लाता है, पर कोई उसकी मदद के लिए नहीं आता। एकाएक एक पेड़ की मोटी टहनी उसके सिर पर आकर गिरती है। लालटेन गिरकर बुझ जाती है। यानी बच्चा हमेशा के लिए अंधा हो गया है।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    15 min
  • Meri Filmi Atmakatha 14 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "एक बात और, फिल्मलाइन में सभी एक दूसरे का बुरा सोचते हैं। ऊपर से तो वे बेहद प्यार मोहब्बत से पेश आते हैं, पर मन में दूसरे की पूरी और हमेशा के लिए तबाही की कामना करते हैं। जो व्यक्ति उनकी नजर से दूर हो जाए, वे समझते हैं कि वह खत्म हो गया। इससे उन्हें खुशी और तसल्ली मिलती है। फिल्मों में सफल होने की एक शर्त यह भी है कि दोस्तों-साथियों को यह खुशी और तसल्ली प्राप्त ना होने दी जाए।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    22 min
  • Meri Filmi Atmakatha 13 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "श्याम (a renowned actor and Manto's close friend) ने भी मेरे पड़ोस में अपना बंगला बनवाया था। एक दिन खबर मिली कि आउटडोर शूटिंग करते हुए वे घोड़े से गिरकर मर गए हैं। सुनकर बहुत दुख हुआ।  श्याम जी रावलपिंडी के थे और हमारे परिवारों का आपस में बहुत प्यार था। वह मेरी बहुत इज्जत करते थे।

    मातमपुर्सी के लिए मैं घर से पैदल चल पड़ा। क्योंकि मेरी मोटरसाइकिल का ड्राइवर नहीं आया था। यह भी अपने आप में एक दिलचस्प किस्सा है। मोटर के लिए ड्राइवर रखना आम बात है। पर मोटरसाइकिल के लिए ड्राइवर रखने वाला मैं इतिहास में शायद पहला आदमी था। मैं अपने तजुर्बे से बहुत जल्दी सीख गया था कि किसी फिल्म स्टूडियो के फाटक में पैदल दाखिल होना अपमान की बात है। दरबानों और पहरेदारों को पैदल आनेवाले लोगों से बुरा सुलूक करने में बहुत मजा आता है।

    हास्य अभिनेता दीक्षित अपने बीते अपमानों की याद में स्टूडियो में दाखिल होते समय अपनी मोटर से उतरकर दरबान को प्रणाम किया करते थे। एक दिन मेरे मित्र मामा फसालकर मुझको बताया कि वी शांताराम के छोटे भाई अवधूत के पास एक बिल्कुल नई पांच हॉर्सपावर ए जे एस मोटरसाइकिल है जिसे वे बेचना चाहते हैं ।

    मैंने किसी ना किसी तरह पैसा बटोरकर उसे खरीद लिया। पर उस शैतान के चरखे को चलाएं कौन ? उसे तो देखकर ही मुझे डर लगता था, चलाने की तो बात ही अलग थी। मामा फसालकर को चलानी आती थी और चलाने का शौक भी था। उन दिनों वे थे भी बेकार। एक फिल्म में ख्वाजा अहमद अब्बास के सहायक बनकर वे लाहौर गए थे और वापस आने पर उन्हें कोई काम नहीं मिला था। सो मैंने उन्हें मोटरसाइकिल की ड्राइवरी का काम दे दिया। वह चलाते, मैं पीछे बैठता। बदले में वह मेरे यहां खाते और सो रहते।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फिल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    13 min
  • Meri Filmi Atmakatha 12 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "मेरी सेहत बहुत गिरी हुई थी।  डॉक्टर ने मुझे कश्मीर जाने की सलाह दी।  वहां भी हालात बहुत हंगामी थे लेकिन सांप्रदायिकता का कहीं नामोनिशान तक न था। महाराज हरि सिंह का दमनचक्र जोरों से चल रहा था।  शेख अब्दुल्ला, सादिक, डीपी धर और कई अन्य नेता जेल में थे। जिनके कारण जनता में बहुत बेचैनी थी। कई राजनीतिक कर्मचारी रूपोश होकर बगावत फैला रहे थे और इस नेक काम में पुलिस तक उनकी मददगार थी।

    एक खुफिया अड्डे पर मेरी मुलाकात कश्मीर के महान मजदूर कवि अब्दुससितार 'आसी' से हुई।  रोजी कमाने के लिए वे एक आढ़ती की दुकान पर बोरियां ढोया करते थे। यह भी मेरी एक अमिट  याद है. मैं मुंबई से आया था जहां कम्युनिस्ट पार्टी का केंद्र था। इसीलिए श्रीनगर के कॉमरेड मुझे जरूरत से ज्यादा महत्व दे रहे थे। मैं भी अपनी शान बनाने की कोशिश करता। हालांकि मेरी राजनीतिक सूझबूझ उनके मुकाबले में कम थी।

    घर के वातावरण और गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर की शिक्षा दोनों ने मुझे अंतर्मुखी बना दिया था। बड़ी से बड़ी घटनाओं की ओर से भी आंखें मूंदे रखना मेरी आदत बनी हुई थी। अपने इस रोग का इलाज मैं मार्क्सवादी ज्ञान की सहायता से भी न कर सका। कठिनाइयों में मेरी सोच की शक्ति डांवाडोल हो जाती है। मेरी ज़हनियत उस बंदर जैसी है जो आग से छेड़खानी करने से बाज नहीं आता और हाथ जलने पर भाग भी उठता है।

    काफी हद तक यही कमजोरी मेरे समकालीन साहित्यकारों और कलाकारों की भी कही जा सकती है। सन 1947 की मौत की आंधी हमारे सिर ऊपर से होकर गुजर गई लेकिन उसके आधार पर हम न कोई बढ़िया फिल्म बना सके और न ही उस भावुकता से ऊपर उठकर साहित्य में उसका अमिट चित्रण ही कर पाए।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फिल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    15 min
  • Meri Filmi Atmakatha 11 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "अमीर घरों के लोग भी हमारे साथ दोस्ती करने के लिए बेचैन रहते थे। फिल्म स्टार के साथ उठने बैठने से उनकी इज्जत बढ़ती थी। जब हम उनकी घटिया पार्टियों से उकताकर पीछा छुड़ाते तो वह इप्टा या कम्युनिस्ट पार्टी को चंदा देकर हमें ललचाते।

    अभिनेता और खासकर अभिनेत्री बुर्जुआ समाज के लिए एक खिलौना हैं। बिल्कुल इस तथ्य का हमें बिल्कुल ज्ञान नहीं था। अभिनेत्री को दिए जाने वाले सम्मान में बहुत सा तिरस्कार का भी अंश होता है, यह भी मुझे नहीं पता था। एक दिन जब अखबार में पढ़ा कि रेस में दौड़ने वाली घोड़ियों के नाम बेगमपारा, नरगिस, दमयंती आदि रखे गए हैं तो मुझे बहुत गुस्सा आया।

    मेरा कर्तव्य था कि उस समय अपनी पत्नी की ढाल बनता। उसके कलात्मक जीवन की कद्र करता, रक्षा करता। उसे फिजूल के झमेलों से बचाता और पारिवारिक जीवन की जिम्मेदारियां अपने ऊपर ले लेता।

    पर मैं अपनी संकीर्णता के कारण मन ही मन में दम्मो (मेरी पत्नी दमयंती) की प्रसिद्धि और सफलता से ईर्ष्या करने लगा था। वह स्टूडियो से थकी हारी हुई आती तो मैं उससे ऐसा सुलूक करता जैसे वह कोई गलती करके आई हो। मैं चाहता कि वह आते ही घर के कामकाज में लग जाए, जो कि मेरी नजर में उसका असली काम था। अपने बड़प्पन का दिखावा करने के लिए मैं इप्टा और कम्युनिस्ट पार्टी के अनावश्यक काम भी करने लग जाता।

    मैं मर्द था। जिन संस्कारों में पला था उनके अनुसार मर्द हर हालत में ऊंचा था। और जिन संस्कारों में दम्मो पली थी उनके अनुसार पतिपरायणता उसका पहला कर्तव्य था। बेचारी बिना किसी शिकायत के वह सारा भार उठती गई, जिसे उठाने का उसमें सामर्थ्य नहीं था।

    इन बातों को याद करके मेरे दिल में टीस उठती है। दम्मो एक अमूल्य हीरा था, जो उसके माता-पिता ने एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया था, जिसके दिल में न उसकी कद्र थी न ही कोई कृतज्ञता का भाव था।

    हमारे इर्द-गिर्द एक तूफान सा मचा रहता था।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फिल्मी आत्मकथा

    (प्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी ने अपनी किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' अपनी मृत्यु से एक साल पहले यानी 1972 पूरी की थी। यह सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई। फिर उनके जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    16 min
  • Meri Filmi Atmakatha 10 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "उस दौर में कृश्न चन्दर ने भी एक फिल्म बनाई अपने नाटक 'सराय के बाहर' के आधार पर। खुद ही उसका निर्देशन भी किया। प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के एक उपासक ने 'आजादी' नामक एक आदर्शवादी फिल्म बनाने के लिए अपनी सारी पूंजी उनके कदमों में ला कर रख दी।

    उपर्युक्त उदाहरण से अच्छा सबूत क्या हो सकता है कि फिल्मी इतिहास के उस मोड़ पर हमारे बुद्धिजीवी वर्ग को उच्च स्तर की फिल्में बनाने के लिए सहूलतों की कमी नहीं थी, बल्कि सहूलतें खुद उनके कदमों में आ रही थीं। अगर उनका फायदा उठाने की योग्यता उनमें होती तो आज हिंदी फिल्मों का स्तर कुछ और ही होता।

    पर उस वर्ग ने न फिल्म के माध्यम की विशेष आवश्यकताओं को समझने की कोशिश की और ना ही अपने व्यक्तिगत जीवन को किसी सीमा में रखा। उनकी बनाई हर फिल्म ने जनता की आशाओं पर पानी फेर दिया। सिर्फ यही नहीं, वे लोग अपनी गलत हरकतों के कारण उतने ही बदनाम हुए, जितना कि वे अपनी कहानियों में फिल्मी सेठों को करते थे।

    आज जब भी मैं अपने बुद्धिजीवी मित्रों को जनता के घटिया स्तर और निर्माताओं की जाहिलाना किस्म की मांगों को दोष देते हुए पाता हूं, तो मेरा मन रोष से भर जाता है, क्योंकि मैंने अच्छे से अच्छे अवसरों को बर्बाद होते अपनी आंखों से देखा है।"

    ~ बलराज साहनी (मेरी फ़िल्मी आत्मकथा)

    Narrator, Producer and Cover Designer : Irfan

    19 min
  • Meri Filmi Atmakatha 9 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "पर हम इतनी ज्यादा आत्मग्लानि के शिकार भी नहीं थे। गांधीजी के प्रति हमारी श्रद्धा इतनी गहरी थी कि उसका उल्लेख नहीं किया जा सकता। ख़ासकर दम्मो को तो बापू, कस्तूरबा, आशादी और आर्यन दा से बेहद प्यार मिला था। पर गांधीवाद पर से हमारा विश्वास काफी हद तक उठ गया था। 

    यह ठीक है कि हम अपने देश की आजादी के लिए लड़े नहीं थे, जेलों में नहीं गए थे, पर अनगिनत रातें हमने बमों की बारिश के नीचे गुजारी थीं। हमने मौत के भयानक वातावरण में दिन बिताए थे। हमने चार साल उस यूरोप में गुजारे थे जहां लाखों करोड़ों लोग युद्ध के शिकार हुए थे, और जहां नाजियों ने निर्दोष यहूदियों की चमड़ियों के लैम्पों के सेट बनाकर पैशाचिकता का नया रिकॉर्ड कायम किया था। 

    हमें विश्वास हो गया था कि वर्तमान युग की क्रांतिकारी विचारधारा गांधीवाद के बजाय मार्क्सवाद है। सिर्फ मार्क्सवाद। और यह विश्वास आज तक मजबूत ही होता आया है। 

    कला और साहित्य में यथार्थवाद की शिक्षा मुझे कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन से मिली थी। मैंने उनके इतिहास का अध्ययन करते हुए यह बात जानी थी कि यूरोप में यथार्थवाद से पहले के युग की कला में लंबाई चौड़ाई तो होती थी, पर गहराई नहीं होती थी, जो कला का तीसरा आयाम है। रेनेसां कला में तीसरा आयाम लाया था। 

    यथार्थवाद की विशेषता है कि वह कला में तीसरा आयाम लाता है। मैंने अपने स्टेज और फिल्म के अभिनय में यही तीसरा आयाम लाने का प्रयास किया है। कलाकार के लिए यह सबसे मुश्किल रास्ता है, और इसी में सृजन का असली आनंद अनुभव किया जा सकता है। 

    कलाकार किसी पात्र का रोल करते हुए उसे कुछ इस तरह सजीव ढंग से दर्शकों के सामने पेश करना चाहता है, कि वह पात्र सपाट लगने के बजाय, हर कदम पर गहरा और नया बनता हुआ प्रतीत हो।

    ~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा

    Recorded, Produced and Curated by Irfan

    Cover Art: Irfan

    34 min
  • Meri Filmi Atmakatha 8 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "अचानक एक दिन शूटिंग का बुलावा आ गया।  जीवन में मेरी पहली शूटिंग।  शाम के सात बजे का कारदार स्टूडियो पहुंचना था। IPTA की एक मीटिंग बीच में ही छोड़कर मैंने ठीक समय पर चर्नी रोड स्टेशन से गाड़ी पकड़ी। शूटिंग शब्द सुनकर दोस्तों-साथियों पर ऐसी प्रतिक्रिया हुई जैसे बिजली के तार को हाथ लग जाए। मैं एक क्षण में उनके लिए प्यार के बजाय ईर्ष्या का पात्र बन गया।

    और उस दिन से लेकर आज तक मैंने अपने इर्द-गिर्द घर में भी और घर के बाहर भी हमेशा यही प्रतिक्रिया देखी है। हर किसी की नजर में शूटिंग एक बड़ी अलौकिक चीज है। वह आदमी को दूसरे लोगों से अलग और ऊंचा बना देती है। शूटिंग कर रहे कलाकार का सिंहासन अटल लगता है, और जो न कर रहा हो, उसका डगमगाता हुआ। अगर कोई यूं ही पूछ बैठे 'आज आपकी शूटिंग नहीं है?' तो बड़े से बड़ा अभिनेता भी घबरा जाता है, जैसे उससे कोई कुसूर हो गया हो। इसका कारण यह है कि इस सवाल की कहीं दूर, एक खतरे की घंटी बँधी हुई है जिसकी आवाज फिल्म स्टार के कानों को अच्छी नहीं लगती।"

    ~ बलराज साहनी, मेरी फ़िल्मी आत्मकथा

    Cover Art: Irfan

    29 min
  • Guftagoo with Varun Grover | Writer and Lyricist

    Recorded in Mumbai, 2015 this TV interview was first shown on Rajya Sabha TV.

    Irfan talking to the Writer and Lyricist Varun Grover (born 26 January 1980) in the longest running celebrity talk show Guftagoo

    About Guftagoo

    Guftagoo (Conversations) is India’s only uninterrupted, unscripted and unhurried celebrity talk show. Running since 2011 the show has a rich repository of 400+ TV shows varying from 30 to 160 minutes.

    It’s a unique show interviewing distinguished personalities from various fields of arts and culture. The celebrated anchor Syed Mohd Irfan is host of the show whose distinctive style of conversation forms the essence of the show allowing guests to express their raw emotions. The in-depth interviews provide the viewers an intimate look in the inner worlds of the guests invited to the show. It helps them understand the guest`s life experiences, emotional conflicts, inspirations and struggles that brought out the artist in them and shaped the way they perceive the world.

    This documentation of the life journeys of various artists, also serves as a popular audio-visual archive for anthropological studies.

    Earlier aired on Rajya Sabha TV for a decade by the name of Guftagoo, show presented to its viewers, the journeys of  personalities from various fields, such as Tom Alter, Gulzar, Javed Akhtar, Irrfan Khan, Jaya Bachchan,Naseeruddin Shah, John Abraham, Jackie Shroff, Nandita Sen, Nawazuddin Siddiqui, Milkha Singh, and Shyam Benegal to name a few. Stay tuned.

    Audio bounce of a TV interview.

    The entire Guftagoo playlist on YouTube Link

    Image Courtesy Irfan's Archive

    56 min
  • Meri Filmi Atmakatha 7 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "अब मुझे कॉन्ट्रैक्ट मिल गया था और मैं दावे के साथ अपने आप को फिल्म-अभिनेता कह सकता था।

    आज कॉन्ट्रैक्ट हुआ है, कल काम शुरू हो जाएगा ऐसा मेरा अनुमान था।

    पर दिन पर दिन बीतने लगे। न काम के, न ही पैसे के आसार नजर आए। पर शूटिंग का खयाल मेरे मन पर पूरी तरह छा गया था। नाई से बाल कटवाने के लिए भी मैं  प्रोड्यूसर के दफ्तर जाकर ही इजाजत मांगता, क्योंकि किसी से सुन लिया था कि थोड़ा बहुत फर्क पड़ जाने से 'कांटिन्यूटी' में 'जम्प' आ जाता है।

    कांटिन्यूटी क्या बला थी, और जंप क्या, मुझे पता नहीं था। पर मैं ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहता था, जिससे कला को नुकसान पहुंचे।

    क्या पता किस दिन अचानक शूटिंग निकल आए।

    ऐसी हास्यास्पद हरकतें फिल्मों के नए रंगरूट आमतौर पर करते हैं। वे साबुन से मलमल कर मुंह धोते हैं, क्रीमें थोपते हैं। आईने के सामने तरह तरह के पोज़ बनाते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि अभिनय कला का ज्यादा संबंध चिंतन के साथ है। बाहरी चीजें इतना महत्व नहीं रखतीं।"

    ~ बलराज साहनी, अभिनेता (मेरी फ़िल्मी आत्मकथा)

    Cover Art: Irfan

    27 min

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