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By S.M.IrfanArtsPerforming Arts
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  • Meri Filmi Atmakatha 6 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "पर इसके उलट एक और भी प्रवृत्ति मेरे भीतर से सिर निकाल चुकी थी हार ना मानने की अपने लक्ष्य पर पहुंच कर ही दम लेने की। मेरे इस व्यक्तिवादी रवैये को जीवन में बहुत ही सख्त चोटें भी लगी थीं। ऐसा होना स्वाभाविक था। और जख्मी हालत में जब मैं अपने चारों तरफ देखता था तो पता चलता था कि सारा संसार ही दुखी है।

    मेरे अंदर अपने दुख को दूसरों के दुखों के साथ साझा करने की भावना और मानवता के साथ गहरा रिश्ता जोड़ने की कामना प्रतिदिन प्रबल होती जा रही थी। व्यक्तिवाद और समष्टिवाद का यह द्वंद्व मेरे जीवन में सदा रहा है। इसने मेरी सहायता भी की है और मेरा रास्ता भी रोका है।

    यही विरोध मैंने अपनी पीढ़ी के लगभग सभी साहित्यकारों और कलाकारों में देखा है।

    जब से होश संभाला है मैं जनता के साथ घुलना मिलना भी चाहता हूं पर जनता से शरमाता भी हूं। ना पूरी तरह व्यक्तिवाद में ही सुखी हूं और ना ही समष्टिवाद में। मैं देश कल्याण के कार्यों में भी हिस्सा लेता रहा हूं पर अपने स्वार्थ को भी नहीं छोड़ा। मैं उस बंदर की तरह हूं जो आग से डरता भी है और आग से खेलने से बाज़ भी नहीं आता।"

    -बलराज साहनी, अभिनेता (मेरी फिल्मी आत्मकथा में)

    (बलराज साहनी की किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई।

    बलराज जी के जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Cover Art: Irfan

    21 min
  • Meri Filmi Atmakatha 5 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    "पर मेरी सभी आशाएं ख़ाक में मिल गयीं। ऐसा लगा जैसे किसी ने पहाड़ की चोटी से मुझे नीचे पटक दिया हो। कला की सब क़दरों और क़ीमतों पर जैसे छुरी फेर दी गयी हो। संस्कृत का मुझे बचपन से शौक़ रहा था और अभिज्ञानशाकुंतलम को मैं कोमल अनुभूतियों का ख़ज़ाना मानता हूँ। शांताराम जैसा निर्देशक उसे इतना खुरदुरा और भद्दा बनाकर पेश करेगा, दिल मानने को तैयार नहीं होता था। कहीं यह कोई दूसरा शांताराम तो नहीं है ? मेरी आत्मा व्याकुल हो उठी। गरमी और गंदगी के मारे मैं पहले से परेशान था, अब तो सारी भूख और प्यास भी जाती रही।"

    ~बलराज साहनी ('मेरी फ़िल्मी आत्मकथा')

    (बलराज साहनी की किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई।

    बलराज जी के जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    20 min
  • Meri Filmi Atmakatha 4 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    नंदलाल बोस ने कहा "एक बात हमेशा याद रखना हज़ार रुपये खर्च करके कोई बुद्धू भी नाटक खेल सकता है। कलाकार वही है जो वही नाटक दस रुपये में खेल कर दिखा दे।"

    (बलराज साहनी की किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई।

    बलराज जी के जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथों हाथ लिया।)

    Cover Art: Irfan

    23 min
  • Meri Filmi Atmakatha 3 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    कॉलेज का दौर खत्म हुआ। जीवन के क्षेत्र में उतरने का समय आया। जीवन के अखाड़े में उतरते ही ऐसी चोटें पड़ीं कि कुछ मत पूछिए। नाक से खून बहने लगा, मुंह माथा सूज गया, बांह रूमाल में टांगनी पड़ी।

    कवि ने बड़े सुंदर शब्दों में चित्र खींचा है-

    'इकबाल' मेरे इश्क ने सब बल दिए निकाल

    मुद्दत से आरजू थी सीधा करे कोई।

    (बलराज साहनी की किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई।

    बलराज जी के जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथो हाथ लिया।)

    Cover Art: Irfan

    28 min
  • Meri Filmi Atmakatha 2 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    अपने बचपन में फिल्मों के शुरुआती एनकाउंटर्स और युवावस्था में उनके मोहपाश से गुज़रते हुए अपनी आत्मकथा के इस दूसरे अध्याय में बलराज साहनी कहते है -

    जो विद्वान फिल्मों का नाम सुनते ही उपेक्षा से नाक भौं सिकोड़ लेते हैं, उन्हें सिनेमा के व्यापक स्तर पर होनेवाले व्यापक प्रभावों पर संजीदगी से गौर करना चाहिए।

    (बलराज साहनी की किताब 'मेरी फ़िल्मी आत्मकथा' सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई।

    बलराज जी के जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्म प्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथो हाथ लिया।)

    Cover Art: Irfan

    14 min
  • Meri Filmi Atmakatha 1 | Balraj Sahni | Recited by Irfan

    बलराज साहनी की किताब मेरी फ़िल्मी आत्मकथा सबसे पहले अमृत राय द्वारा सम्पादित पत्रिका 'नई कहानियां' में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई।

    बलराज जी के जीवन काल में ही यह पंजाबी की प्रसिद्ध पत्रिका प्रीतलड़ी में भी यह धारावाहिक ढंग से छपी।

    1974 में जब यह किताब की शक्ल में आई तो फिल्मप्रेमियों और सामान्य पाठकों ने इसे हाथो हाथ लिया।

    मैं पिछले 7 - 8 वर्षों से इसके पॉडकास्ट बनाने की कोशिश में हूँ। बीच में 4-5 अध्याय बनाए भी लेकिन लगकर हो नहीं सका।

    अब इसे नए सिरे से अपने पॉडकास्ट चैनल पर शुरू कर रहा हूँ। यह काफी धीरज, लगन और समय की मांग करता है। इसलिए इस बार भी कितना कर पाऊंगा कह नहीं सकता।

    आपकी राय और समर्थन की प्रतीक्षा रहेगी।

    Cover: Irfan

    19 min
  • Kyon Padhein ? | Prof Krishna Kumar

    Prof Krishna Kumar locates early literacy in larger context of culture, market, education and school / institution. This characteristically engaging talk in Hindi examines multiple dimensions of literacy in the Indian context.

    Audio extract from the Youtube video Keynote Address on Early Literacy by Prof Krishna Kumar. Organised by Sir Ratan Tata Trust and Organisation for Early Literacy Promotion in 2011, New Delhi . Courtesy Amrita Patwardhan's YT

    Curation and Cover Art: Irfan

    1 hr 8 min
  • Suno MF Husain Ki Kahani | Intro | Voice MF Husain

    Maqbool Fida Husain / M. F. Husain's autobiography converted into 5 hours unique audio book. Syed Mohd Irfan aka Irfan a well-known Delhi based Broadcast Journalist. Founder-Producer and Anchor Guftagoo made it possible. A pioneering work came out first time in Indian Sub-continent in 2003.

    “किसी ने कहा- ‘अपनी कहानी लिखो’।

    पूछा ‘क्यों?’
    कहा ‘तुम पर फ़िल्म बनाई जाए।’
    ‘फ़िल्म! ज़रा मेरा हुलिया तो देखिये! क्या कामेडी बनाने का इरादा है?’
    ‘हां, ऐसी कामेडी कि आप हंसते-हंसते रॊ पडॆं।’
    पिछली सदी के आखिरी दहेके में बस यूं ही कागज़ के एक टुकडे पर लिखना शुरू कर दिया- ‘दादा की उंगली पकडे एक लडका।’ इस पुर्ज़े को पढकर न कोई हंसा न कोई रोया। हां लदन में एक साहबे फ़हम माजिद अली अह्ले सुख़न की नज़र इस पुर्ज़ॆ पर लिखी इबारत पर पडी। एमएफ़ से कहा ‘आप ये फ़िल्म स्क्रिप्ट छोडें और अपनी कहानी को किताब की शक्ल दें तो बॆहतर है।’ इस बात पर हिम्मत बंधी, और कहीं नहीं बैठा बस चलते-फिरते लिखता ही गया। चार-पांच साल के बाद पुर्ज़ों का एक ज़ख़ीम पुलिंदा बग़ल में दबाये प्रेस की तरफ़ छपवाने चला कि अचानक रास्ते में किसी ने पूछा ‘हम आपके हैं कौन?’ तो एमएफ़ की बग़ल से वो पुलिंदा फिसल पडा।’
    उसे बीच रास्ता छॊड सात साल तक ग़ायब।
    हम आपके हैं कौन सवाल पर जवाबन गजगामिनी फ़िल्म बना डाली। लौटे तो वो पुलिंदा उसी रास्ते पर पडा मिला। किताब छप गयी। लॊगों ने हिंदी में पढी, अंगरेज़ी में पढी और अब बंग्ला और गुजराती में पढी जायेगी।
    लेकिन फिर किसी ने कहा कि कहानी पढने से ज़्यादा सुनने में अच्छी लगती है। याद हैं वो दादी अम्मा-नानी अम्मा की कहानियां! जिन्हें सुनते-सुनते बचपन मीठी नींद सॊ जाया करता।
    आख़िर में मिलते हैं इरफ़ान साहब, जो मेरी कहानी को ज़बान देते हैं, जिसे आप चलते-फिरते कहीं भी सुन सकते हैं।
    तो, आइये और सुनिये एमएफ़ हुसेन की कहानी।”

    Text and Voice M.F. Husain

    Conceived, Produced and Presented by Irfan


    3 min

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