Poetry World Podcasts

Poetry World Podcasts

By POETRY WORLDArtsBooks
Download on the App Store

Poetry World Podcasts episodes

  • Hamesha der kar deta hun mai - Munir Niazi
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
    ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो
    उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं
    मदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना हो
    बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं
    बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
    किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं
    किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
    हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....
    2 min
  • Aa gyi yaad shaam dhalte hi - Munir Niazi
    आ गई याद शाम ढलते ही
    बुझ गया दिल चराग़ जलते ही
    खुल गए शहर-ए-ग़म के दरवाज़े
    इक ज़रा सी हवा के चलते ही
    कौन था तू कि फिर न देखा तुझे
    मिट गया ख़्वाब आँख मलते ही
    ख़ौफ़ आता है अपने ही घर से
    माह-ए-शब-ताब के निकलते ही
    तू भी जैसे बदल सा जाता है
    अक्स-ए-दीवार के बदलते ही
    ख़ून सा लग गया है हाथों में
    चढ़ गया ज़हर गुल मसलते ही
    1 min
  • Kuch ishq kiya kuch kaam kiya - Faiz Ahmad Faiz | कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
    कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
    वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
    जो इश्क़ को काम समझते थे
    या काम से आशिक़ी करते थे
    हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
    कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
    काम इश्क़ के आड़े आता रहा
    और इश्क़ से काम उलझता रहा
    फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
    दोनों को अधूरा छोड़ दिया
    1 min
  • आवारा - असरार-उल-हक़ मजाज़ (ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ)
    शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ
    जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ
    ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
    रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
    मेरे सीने पर मगर रखी हुई शमशीर सी
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    ये रुपहली छाँव ये आकाश पर तारों का जाल
    जैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़याल
    आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    फिर वो टूटा इक सितारा फिर वो छूटी फुल-जड़ी
    जाने किस की गोद में आई ये मोती की लड़ी
    हूक सी सीने में उठ्ठी चोट सी दिल पर पड़ी
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
    फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल
    ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    हर तरफ़ बिखरी हुई रंगीनियाँ रानाइयाँ
    हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगड़ाइयाँ
    बढ़ रही हैं गोद फैलाए हुए रुस्वाइयाँ
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहीं
    लौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहीं
    और कोई हम-नवा मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    मुंतज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिए
    अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
    पर मुसीबत है मिरा अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    जी में आता है कि अब अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
    उन को पा सकता हूँ मैं ये आसरा भी तोड़ दूँ
    हाँ मुनासिब है ये ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
    जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
    जैसे मुफ़्लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    दिल में इक शोला भड़क उट्ठा है आख़िर क्या करूँ
    मेरा पैमाना छलक उट्ठा है आख़िर क्या करूँ
    ज़ख़्म सीने का महक उट्ठा है आख़िर क्या करूँ
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    जी में आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ
    इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ
    एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
    सैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामने
    सैकड़ों चंगेज़ ओ नादिर हैं नज़र के सामने
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूँ
    ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ
    कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़ कर तोड़ दूँ
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ
    उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
    तख़्त-ए-सुल्ताँ क्या मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
    ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
    6 min

About Poetry World Podcasts

From the publisher's feed

PWO - A platform for creative minds