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Poetry World Podcasts episodes

  • Hamara dil savere ka sunehra jaam ho jae - Bashir Bhadr
    हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए
    चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए
    कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
    तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए
    अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
    मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए
    समुंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दे हम को
    हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए
    मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा
    परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए
    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
    न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
    ~ बशीर भद्र
    3 min
  • Kaun aaya hai yahan koi na aaya hoga - Kaif Bhopali
    कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा
    मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा
    दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क
    कोई ख़त ले के पड़ोसी के घर आया होगा
    इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल
    तू ने जिस फूल को पाला वो पराया होगा
    दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद
    वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा
    गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो
    आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा
    खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे
    चाँद अब उस की गली में उतर आया होगा
    'कैफ़' परदेस में मत याद करो अपना मकाँ
    अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा
    ~ कैफ़ भोपाली
    3 min
  • Ranjish hi sahi - रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ | Ghazal by Ahmad Faraz | Poetry World Org
    रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
    आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
    कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
    तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
    पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
    रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ
    किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
    तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
    इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम
    ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ
    अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
    ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ - Ahmad Faraz
    3 min

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