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  • Sahir Ludhiyanvi - Taj Mahal | ताज महल - साहिर लुधियानवी
    ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही
    तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही
    मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से
    बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मअ'नी
    सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
    उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी
    मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा
    तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
    मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
    अपने तारीक मकानों को तो देखा होता
    अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है
    कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के
    लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं
    क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे
    ये इमारात ओ मक़ाबिर ये फ़सीलें ये हिसार
    मुतलक़-उल-हुक्म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूँ
    सीना-ए-दहर के नासूर हैं कोहना नासूर
    जज़्ब है उन में तिरे और मिरे अज्दाद का ख़ूँ
    मेरी महबूब उन्हें भी तो मोहब्बत होगी
    जिन की सन्नाई ने बख़्शी है उसे शक्ल-ए-जमील
    उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नुमूद
    आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़िंदील
    ये चमन-ज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
    ये मुनक़्क़श दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक़
    इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
    हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
    मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से
    3 min
  • Aadminama | आदमी नामा - नज़ीर अकबराबादी
    दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी
    और मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी
    ज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमी
    नेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी
    टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी
    अब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुए
    मुंकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरे
    क्या क्या करिश्मे कश्फ़-ओ-करामात के लिए
    हत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर से
    ख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमी
    फ़िरऔन ने किया था जो दावा ख़ुदाई का
    शद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदा
    नमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमला
    ये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्या
    याँ तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमी
    कुल आदमी का हुस्न ओ क़ुबह में है याँ ज़ुहूर
    शैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोर
    और हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमी
    मस्जिद भी आदमी ने बनाई है याँ मियाँ
    बनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा-ख़्वाँ
    पढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँ
    और आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँ
    जो उन को ताड़ता है सो है वो भी आदमी
    याँ आदमी पे जान को वारे है आदमी
    और आदमी पे तेग़ को मारे है आदमी
    पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
    चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
    और सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमी
    चलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के माल
    और आदमी ही मारे है फाँसी गले में डाल
    याँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जाल
    सच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लाल
    और झूट का भरा है सो है वो भी आदमी
    याँ आदमी ही शादी है और आदमी बियाह
    क़ाज़ी वकील आदमी और आदमी गवाह
    ताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह-मख़ाह
    दौड़े हैं आदमी ही तो मशअ'ल जला के राह
    और ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमी
    याँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बार
    और आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवार
    हुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मार
    काँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहार
    और उस में जो पड़ा है सो है वो भी आदमी
    बैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगा
    और आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़ूनचा
    कहता है कोई लो कोई कहता है ला रे ला
    किस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बना
    और मोल ले रहा है सो है वो आदमी
    तबले मजीरे दाएरे सारंगियाँ बजा
    गाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जा
    रंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगा
    और आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ा
    जो नाच देखता है सो है वो भी आदमी
    याँ आदमी ही लाल-ओ-जवाहर में बे-बहा
    और आदमी ही ख़ाक से बद-तर है हो गया
    काला भी आदमी है कि उल्टा है जूँ तवा
    गोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चाँद-सा
    बद-शक्ल बद-नुमा है सो है वो भी आदमी
    इक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैं
    रूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैं
    झमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैं
    कम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैं
    और चीथडों लगा है सो है वो भी आदमी
    हैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग है
    और आदमी ही चोर है और आपी थांग है
    है छीना झपटी और बाँग ताँग है
    देखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग है
    फ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमी
    मरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तयार
    नहला-धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवार
    कलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ार
    सब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबार
    और वो जो मर गया है सो है वो भी आदमी
    अशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीर
    ये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीर
    याँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर
    अच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'
    और सब में जो बुरा है सो है वो भी आदमी
    7 min
  • Gopaldas Neeraj - Famous lines
    हर धर्म के आदेश को माना मैंने
    दर्शन के हर एक सूत्र को जाना मैंने
    जब जान लिया सब कुछ तो ए मेरे नीरज
    मैं कुछ भी नहीं जानता ये जाना मैंने
    हमें यारों ने क्या क्या समझा
    किसी ने कतरा,किसी ने हमें दरिया समझा
    सब समझते रहे,जैसा उसे जैसा भाया
    किन्तु हम जो थे वही तो न ज़माना समझा
    समय ने जब भी अँधेरों से दोस्ती की है
    जला के अपना ही घर हमनें रोशनी की है
    सुबूत हैं मेरे घर में धुँए के ये धब्बे
    कभी यहाँ पे उजालों ने खुदखुशी की है
    ज़िन्दगी मैंने गुजारी नहीं सभी की तरह
    मैंने हर पल को जिया पूरी इक सदी की तरह
    किसी भी आँख का आँसू जो गिरा दामन पर
    मैं उसमें डूबा समुंदर में इक नदी की तरह
    फौलाद की मूरत भी पिघल सकती है
    पत्थर से भी रसधार निकल सकती है
    इंसान अगर अपनी पे आ जाये तो
    कैसी भी हो तकदीर बदल सकती है
    इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में
    तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में
    Written And Recites By- Gopal Das Neeraj
    3 min
  • हमेशा देर कर देता हूँ मैं - नज़्म
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
    ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो
    उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं
    मदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना हो
    बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं
    बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
    किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं
    किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
    हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....— मुनीर नियाज़ी
    1 min
  • Aahat si koi aae to lagta hai ki tum ho - Jaa Nisaar Akhtar
    आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
    साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
    जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
    शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
    संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
    झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो
    ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
    नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो
    जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
    चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो
    2 min
  • Seena me jalan, aankhon me toofan sa kyun hai - Sheheryaar
    सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
    इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है
    दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँडे
    पत्थर की तरह बे-हिस ओ बे-जान सा क्यूँ है
    तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ो
    ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है
    हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
    वो ज़ूद-पशेमान पशेमान सा क्यूँ है
    क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
    आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है
    2 min

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